ज्ञान उदय जब होत है …..22
इतने विवेचन से स्पष्ट है कि कर्म-रहस्य को स्पष्ट करने में ज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण है । कर्म के माध्यम से मनुष्य का जीवन सुखद और शान्तिमय बनता है । प्रत्येक जीव में जन्मजात ज्ञान होता है परन्तु ये ज्ञान उसके आहार, निद्रा, भय और मैथुन तक ही सीमित है । मनुष्य में इससे आगे भी कुछ करने का ज्ञान है परन्तु उसका यह ज्ञान अज्ञान के अन्धकार तले दबा हुआ रहता है । प्रश्न उठता है कि उस ज्ञान को प्रकाशित कैसे किया जा सकता है ? इसका उत्तर श्रीकृष्ण के इस कथन से स्पष्ट होता है -
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।। गीता - 4/39 ।।
जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।
इस श्लोक में भगवान ने ज्ञान प्राप्ति के तीन मुख्य आधार बताए हैं - जिसने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर लिया है, जो साधन-पारायण है अर्थात् जो ज्ञान प्राप्त करने के प्रति गंभीर है तथा जो श्रद्धापूर्वक अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त करने का इच्छुक है । ऐसे तीन गुणों से युक्त मनुष्य ही ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी है ।
ज्ञान प्राप्त होते ही मनुष्य तत्काल ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है । मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसका जीवनभर अशान्त बने रहना है । इस अशान्ति का कारण है, उसकी फल और कर्म के प्रति आसक्ति । ज्ञान ही उन आसक्तियों को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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