ज्ञान उदय जब होत है …..21
ज्ञान को उपलब्ध हुए मनुष्य के सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं फिर प्रारब्ध की ओर उसकी दृष्टि जाएगी ही नहीं । दृष्टि न जाने से आशय है कि फिर वह पूर्व के कर्मों से बने प्रारब्ध को भोगने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है, उनसे व्यथित नहीं होता ।
कर्म के मूल में कामना है और कामना का कारण मनुष्य का संकल्प करना है । ‘मुझे जो चाहिए, उसको मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ’?’ इसकी जो योजना मस्तिष्क में बनती है उसका नाम ही संकल्प है । इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए मन में कामना पैदा होती है । जब तक व्यक्ति किसी वस्तु/व्यक्ति को प्राप्त करने का संकल्प नहीं करेगा, तब तक उसमें कामना पैदा नहीं होगी ।
संकल्प और कामना रहित मनुष्य से कर्म तो होंगे परन्तु वे कर्म भूने हुए बीज के समान होते हैं जो कोई परिणाम नहीं देते । परमात्मा ने ऐसे व्यक्तियों को बुद्धिमान कहा है ।
गीता में भगवान कहते हैं -
यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता: ।
ज्ञानाग्निद्ग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा: ।। 4/19 ।।
अर्थात् जिसके सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ संकल्प और कामना से रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्नि से जल गए हैं, उसको ज्ञानीज़न भी पण्डित अर्थात् बुद्धिमान कहते हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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