Tuesday, May 12, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....23

 ज्ञान उदय जब होत है …..23

          ज्ञान होने पर मनुष्य की फल में आसक्ति मिट जाती है जिससे उसे कर्मफल से मुक्ति मिल जाती है । इस प्रकार उसका संसार से आवागमन मिट जाता है । कर्म और फल में आसक्ति ही उसे पुनर्जन्म की ओर ले जाती है ।

         प्रश्न उठता है कि जब कर्मों में आसक्ति को ही मिटाना है तो कर्मों में सुधार करके भी तो यह काम हो सकता है । हाँ, बिलकुल हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता परन्तु कर्मों में सुधार के लिए भी तो थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है । बिना ज्ञान के तो सब मनुष्य कर्मों की भेड़-चाल में उलझकर एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं ।

           दैनिक क्रियाओं को औपचारिकतावश पूरी कर देना, न तो परमात्मा का स्मरण है और न ही निष्काम कर्म । होशपूर्वक की जाने वाली प्रत्येक क्रिया ही भीतर भाव उत्पन्न कर सकती है अन्यथा भजन तो कैसेट प्लेयर भी सुनाता है और तोता भी राम-राम बोलता है । होशपूर्वक कर्म करने से आशय है, ज्ञानपूर्वक कर्म करना । इस प्रकार ज्ञान और कर्म का सीधा सम्बन्ध है, यह सिद्ध होता है ।

             केवल कर्म में रत रहना कर्मयोग नहीं है बल्कि ज्ञानपूर्वक निष्काम होकर कर्म करना ही कर्मयोग है, जहां अपने लिए कुछ भी नहीं किया जाता है और न ही किए जाने की स्मृति ही रहती है । केवल कर्म के बारे में ज्ञान होने से ही ऐसा सम्भव हो सकता है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के सहयोगी होते हैं, तभी कर्मयोग होता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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