ज्ञान उदय जब होत है …..23
ज्ञान होने पर मनुष्य की फल में आसक्ति मिट जाती है जिससे उसे कर्मफल से मुक्ति मिल जाती है । इस प्रकार उसका संसार से आवागमन मिट जाता है । कर्म और फल में आसक्ति ही उसे पुनर्जन्म की ओर ले जाती है ।
प्रश्न उठता है कि जब कर्मों में आसक्ति को ही मिटाना है तो कर्मों में सुधार करके भी तो यह काम हो सकता है । हाँ, बिलकुल हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता परन्तु कर्मों में सुधार के लिए भी तो थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है । बिना ज्ञान के तो सब मनुष्य कर्मों की भेड़-चाल में उलझकर एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं ।
दैनिक क्रियाओं को औपचारिकतावश पूरी कर देना, न तो परमात्मा का स्मरण है और न ही निष्काम कर्म । होशपूर्वक की जाने वाली प्रत्येक क्रिया ही भीतर भाव उत्पन्न कर सकती है अन्यथा भजन तो कैसेट प्लेयर भी सुनाता है और तोता भी राम-राम बोलता है । होशपूर्वक कर्म करने से आशय है, ज्ञानपूर्वक कर्म करना । इस प्रकार ज्ञान और कर्म का सीधा सम्बन्ध है, यह सिद्ध होता है ।
केवल कर्म में रत रहना कर्मयोग नहीं है बल्कि ज्ञानपूर्वक निष्काम होकर कर्म करना ही कर्मयोग है, जहां अपने लिए कुछ भी नहीं किया जाता है और न ही किए जाने की स्मृति ही रहती है । केवल कर्म के बारे में ज्ञान होने से ही ऐसा सम्भव हो सकता है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के सहयोगी होते हैं, तभी कर्मयोग होता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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