Wednesday, May 13, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....24

 ज्ञान उदय जब होत है …..24

         सुतीक्ष्ण नाम का एक ब्राह्मण था । एक बार उसके मन में संशय हुआ कि कर्म महत्वपूर्ण है अथवा ज्ञान । वे अपनी शंका का समाधान करने के लिए ऋषि अगस्त्य के आश्रम गए । उन्होंने ऋषि अगस्त्यजी को पूछा - ‘भगवन ! आप धर्म के तत्त्व को जानते हैं । आपको समस्त शास्त्रों और धर्म के सिद्धांतों का सुनिश्चित ज्ञान है । मेरे मन में एक संशय है, उसका समाधान कीजिए । मैं जानना चाहता हूँ कि मोक्ष का साधन कर्म है, ज्ञान है अथवा दोनों ही हैं ? इन तीन पक्षों में से जो वास्तव में मोक्ष का कारण हो, उसको स्पष्ट कीजिए ।’

        महर्षि अगस्त्यजी ने कहा - ‘इनमें तीसरा पक्ष सही है अर्थात् निष्काम कर्म और ज्ञान दोनों के एक साथ होने से ही परमपद की प्राप्ति होती है ।’ वे कहते हैं -

              उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः।

              तथैव ज्ञानकर्माभ्यां जायते परमं पदम्।। योगवासिष्ठ -1/1/7।।

        जैसे पक्षी आकाश में दोनों पंखों से ही उड़ते हैं, वैसे ही ज्ञान और कर्म दोनों के योग से ही परम पद की प्राप्ति होती है ।

          जिस प्रकार पक्षी एक पंख से उड़ नहीं सकता वैसे ही अकेले ज्ञान अथवा कर्म से आध्यात्मिक राह कठिन हो जाती है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के सहयोगी है । अतः परमपद तक पहुंचने के लिए दोनों को एक दूसरे का सहयोग लेना ही उचित है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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