ज्ञान उदय जब होत है …..26
ज्ञान और कर्म, दोनों का सामंजस्य हो तो आत्म-बोध की अवस्था को शीघ्र ही प्राप्त किया जा सकता है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी । प्रायः लोग दोनों साधनों को अलग अलग मानते हैं परंतु ऐसा कहना सत्य नहीं है । हां, यह सत्य है कि मनुष्य इन दोनों में से एक को अपने स्वभावानुसार वरीयता देता है । जिसकी कुछ न कुछ करते रहने में रुचि होती है, वह कर्म मार्ग पर आगे बढ़ता है और जिसकी जानने में रुचि होती है वह ज्ञान को प्रमुखता देता है ।
भगवान कर्म और ज्ञानयोग, दोनों का फल एक ही बता रहे हैं -
सांख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता: ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।। गीता - 5/4 ।।
बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोग को अलग अलग कहते हैं, न कि पण्डितजन ; क्योंकि इन दोनों में से एक साधन में भी अच्छी तरह से स्थित मनुष्य दोनों के फल (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है अर्थात् आत्म-साक्षात्कार कर लेता है ।
दोनों (ज्ञान और कर्म) का परिणाम एक ही है - आत्म-बोध को उपलब्ध होना । इसका अर्थ है कि कर्मयोग और ज्ञान योग दोनों समकक्ष हैं । दोनों के समकक्ष होने और एक दूसरे के पूरक होने के कारण शीघ्र ही सिद्धि मिल जाती है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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