Thursday, May 14, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....25

 ज्ञान उदय जब होत है …..25

         स्पष्ट है कि न तो अकेले कर्म से मोक्ष मिलना सम्भव है और न ही अकेले ज्ञान से । दोनों का संतुलन और आपसी तालमेल ही मनुष्य को परमात्मा के द्वार तक सुगमता पूर्वक ले जाते हैं । इसलिए न तो कर्म का त्याग करना चाहिए और न ही ज्ञान को हेय दृष्टि से देखना चाहिए ।

        गीता में भगवान श्रीकृष्ण सम्पूर्ण यज्ञों को स्पष्ट करने के पश्चात् कहते हैं कि द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान (तत्त्वज्ञान) में लीन हो जाते हैं । (4/33) । स्वामीजी कहते हैं कि ज्ञान होने से सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थों से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, जिससे स्वार्थवश सकाम कर्म नहीं होते । द्रव्यमय यज्ञ में क्रिया और पदार्थ की मुख्यता है जबकि ज्ञानयज्ञ में विवेक-विचार की मुख्यता है ।

         ज्ञानपूर्वक किए जाने वाले कर्मों से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होना सरल है । गीता में भगवान कहते हैं कि -

    न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।

    तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कलेनात्मनि विन्दति ।। गीता - 4/38 ।।

      इस मनुष्य लोक में ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला नि:सन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है । जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञान को अवश्य ही अपने में पा लेता है ।

       इस प्रकार कर्मयोग और तत्त्व-ज्ञान प्राप्ति में ज्ञान की भूमिका सिद्ध होती है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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