Friday, January 28, 2022

मा शुचः

 मा शुचः 

            संसार में प्राणियों की कुल 84 लाख प्रजातियाँ है | मनुष्य नाम का एक प्राणी उन 84 लाख प्राणियों की गिनती से अलग है | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणी जीवन में केवल विषय-भोग को भोगने के लिए ही उत्पन्न होते हैं और भोगते-भोगते ही शरीर को त्याग देते हैं | उन्हें अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं होता | उनके भीतर किसी भी बात पर मनन, चिंतन, विचार, शोक आदि करने की क्षमता ही नहीं होती, इसीलिए वे बेचारों की श्रेणी में आते हैं | बेचारा, वह प्राणी होता है, जिसके भीतर कभी कोई विचार उठता ही नहीं है इसलिए उनके लिए किसी कार्य के परिणाम के बारे में मनन करने के लिए कोई सोच ही पैदा नहीं होती | उनकी बेचारगी इसी से जाहिर होती है कि उनके सामने निरुद्देश्य जीवन जीते रहने के अतिरिक्त अन्य कोई चारा नहीं होता |

        क्या मनुष्य नाम का जीव भी बेचारा हो सकता है ? भगवान् ने उसे बेचारा बनाया नहीं है बल्कि वह स्वयं के कारण बेचारा बना हुआ रह सकता है | जिसमें किसी कार्य के प्रति विचार पैदा कर उस पर मनन करने की क्षमता ही नहीं होती, भला ऐसा मनुष्य एक पशु से भिन्न कैसे हो सकता है ? ऐसे मनुष्य को आप बेचारा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ?

            स्पष्ट है कि मानव अन्य सभी प्राणियों से भिन्नता रखते हुए एक मननशील प्राणी है क्योंकि उसके भीतर मनन करने के लिए विचार उठते रहते हैं | मनुष्य के जीवन को विचित्र जीवन कहा जा सकता क्योंकि जहाँ संसार के विभिन्न प्राणियों को अपने जीवन में कुछ भी चिंता करनी नहीं पड़ती वहीँ इसके विपरीत मनुष्य को संसार भर की चिंताएं सताती रहती है | इस प्रकार विभिन्न चिंताएं ही उसके शोक का कारण बनती है |

        जीवन भर मनुष्य शोक ग्रस्त बना रहता है और लाखों चिंताओं से घिरा दुखी होता रहता है | चिंताओं के कारण उसके मन में हर समय बड़ी उथलपुथल मची रहती है | दिन-रात चिंताग्रस्त रहकर विभिन्न विषयों के बारे में वह सोच विचार करता रहता है | क्या आपने अब तक किसी गधे अथवा घोड़े को किसी बात के बारे में सोचते, विचारते, चिंता, शोक आदि करते देखा है ? नहीं न | अब मुझे इस संसार में एक भी ऐसा मनुष्य बता दीजिये जो चिंताग्रस्त नहीं हो, जो किसी प्रकार की सोच, शोक से परे हो | नहीं है न ! ऐसा एक भी मनुष्य आपको जीवन में कभी मिलेगा भी नहीं |

       मनुष्य का मस्तिष्क परमात्मा ने बनाया ही इसी प्रकार है कि वह किसी भी बात पर गंभीरता से विचार कर सके | विचार की उसे आवश्यकता ही इसलिए है क्योंकि वह अपने जीवन में सब कुछ सही प्रकार से करना चाहता है | वह सही होगा अथवा गलत, यह उसके उस कार्य से पूर्व किए जाने वाले विचारों पर निर्भर करता है | उसी सोच-विचार के आधार पर वह अपने जीवन में सुखी-दुखी होता रहता है | उसके द्वारा किये जाने वाले सोच-विचार के कारण ही वह विषादग्रस्त हो जाता है जोकि उसके शोक का कारण बनता है | मनुष्य की मुक्ति प्रत्येक विषाद और शोक से परे निकल जाने में ही है और इसके लिए प्रत्येक प्रकार की सोच और विचार पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है |

           विचारों पर अंकुश लगाने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि किसी भी कार्य से पूर्व उसके परिणाम पर विचार ही नहीं किया जाए | विचार करने की क्षमता मनुष्य को नैसर्गिक रूप से मिली है, इसलिए इस क्षमता का उपयोग करना उसका अधिकार है | परन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब वह किसी एक बात पर अत्यधिक विचार करते हुए शोकग्रस्त हो जाता है | हमें सर्वप्रथम यह जानना होगा कि कौन सी बातें विचार करने योग्य है और कौन सी नहीं |

           स्पष्ट है कि मनुष्य की सोच ही शोक का कारण बनती है | अपनी सोच पर नियंत्रण रख कर ही मनुष्य शोकमुक्त हो सकता है | आइये ! सर्वप्रथम यह जानते हैं कि किस किस विषय पर सोच-विचार करना एक सीमा तक उचित है | श्रीरामचरितमानस में इसी बात को वसिष्ठ मुनि ने भरतजी को  स्पष्ट किया है | वे कहते हैं कि -  

          सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना | तजि निज धरमु बिषय लयलीना ||

              सोच तो उस ब्राहमण का करना चाहिए जो वेद नहीं जानता और अपना धर्म छोड़कर विषय-भोग में रत रहता है | विप्र ज्ञान का वाहक होता है | अगर एक ब्राह्मण ज्ञान प्राप्त ही नहीं करेगा तो फिर ज्ञान को बांटेगा कैसे ? सभी वर्णों में ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह समाज को अपने ज्ञान के माध्यम से निर्देशित करता रहता है | अगर एक ब्राह्मण अपना धर्म छोड़कर केवल विषय-भोग प्राप्त करने में ही लगा रहेगा तो फिर समाज का पतन होना निश्चित है | धर्म-ध्वजा के वाहक ब्राह्मण को अपने जीवन में मर्यादित आचरण करना होता है जिससे अन्य व्यक्ति उसको देखकर, उसका अनुसरण कर सके | इसलिए धर्म-मार्ग पर न चलने वाले ब्राह्मण के बारे में सोच-विचार करना उचित है |

        ब्राह्मण के बारे में कहने के बाद वसिष्ठ मुनि एक राजा के बारे में भरतजी को बता रहे हैं कि -

            सोचिअ नृपति जो नीति न जाना |

            जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ||

                उस राजा का सोच करना चाहिए जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है | एक क्षत्रिय का धर्म होता है, नीति अनुसार अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए उसका उचित प्रकार से पालन-पोषण करना | जो राजा इस नीति के अनुसार नहीं चलता वह शोक करने योग्य ही है | आज संसार में प्रायः देशों में लोकतंत्र होने के कारण बहुमत के आधार पर राजा चुना जाता है | अगर चयनित राजा नीति अनुसार नहीं चलता, अपनी प्रजा को समान दृष्टि से नहीं देखता, अपनी प्रजा के हित की नहीं सोचता तो उसका भविष्य में पतन होना निश्चित है |

           क्षत्रिय का कार्य प्रजा की रक्षा और भलाई करना है | आजकल जनतंत्र में राजा वंशानुगत नहीं होता बल्कि प्रजा के द्वारा चुना जाता है, उस कारण से कुछ विकार भी आ गए हैं | प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति का राज्य करने का काल केवल कुछ वर्ष ही होता है, ऐसे में वे प्रजा के स्थान पर स्वयं का ध्यान अधिक रखने लगे हैं | प्रजा चाहे संकट झेल रही हो आज के प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति राजा शिवि जैसा उदाहरण प्रस्तुत करने में विफल रहे है।

               एक बार राजा शिवि जब यज्ञ कर रहे थे तब उनकी गोद में एक कबूतर आकर छुप गया | उसके पीछे उसका शिकार करने के लिए एक बाज पड़ा था | बाज ने राजा शिवि से अपने भोजन कबूतर को लौटने का कहा | तब राजा ने शरण में आये कबूतर की रक्षा करते हुए उसे सौंपने से मना कर दिया था |

        इधर कबूतर के जीवन का प्रश्न और उधर बाज की क्षुधापूर्ति का सवाल | ऐसे में एक राजा का कर्तव्य क्या हो सकता है ? राजा शिवि ने सोच-विचार कर उचित निर्णय लिया |

        शिवि ने बाज के समक्ष उस कबूतर के वजन जितना अपना मांस देने का प्रस्ताव रखा | तत्काल ही तराजू की व्यवस्था की गयी | एक पलड़े में कबूतर को बिठाया गया और दूसरे पलड़े में राजा शिवि अपने शरीर से काट-काट कर मांस रखते गए | परन्तु राजा के मांस से भी पलड़े बराबर नहीं हुए तो अंततः स्वयं शिवि उस पलड़े में बैठ गए | यह होता है, एक राजा का अपनी प्रजा के प्रति कर्तव्य |

       इंद्र ने राजा शिवि की परीक्षा लेने के लिए यह सब किया था | इस परीक्षा में राजा शिवि खरे उतरे | सही में राज-धर्म ऐसा ही होता है, जिसका पालन करना एक आदर्श राजा के लिए महत्वपूर्ण है |   

        एक वैश्य का धर्म क्या होता है ? जो वैश्य अपने धर्म का अनुसरण नहीं करता, वह वैश्य सोच करने योग्य होता है | वसिष्ठजी कहते हैं कि -

         सोचिअ बयसु कृपन धनवानू | 

      जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ||

      वसिष्ठ मुनि कहते हैं कि उस वैश्य का सोच करना चाहिए जो धनवान होकर भी कंजूस है, जो आये अतिथि का सत्कार नहीं करता और जो शिव की भक्ति करने में कुशल नहीं है |   

      संसार में वैश्य वर्ण ही ऐसा वर्ण है जो धनोपार्जन में रत रहता है | वह बात और है कि आजकल सभी वर्ण के लोग धनोपार्जन में लगे हुए हैं। संचित धन की तीन गतियाँ बतलाई गयी है – दान, भोग और नाश | कंजूस वैश्य के धन की तीसरी गति होती है क्योंकि वह अपनी कृपण प्रवृति के कारण न तो धन का दान ही करता है और न ही उसका भोग कर पाता है | कंजूस धनवान को घर आया अतिथि भी एक बोझ लगता है | वह उसका यथायोग्य सत्कार इसी भय से नहीं करता कि कहीं धन में कमी न आ जाये | न ही वह परमात्मा की भक्ति में लग पाता है क्योंकि उसकी दृष्टि केवल धन के अर्जन और उसके संग्रह पर ही रहती है |

           धन आप चाहे जितना संग्रहित कर लें, वह आपके पास सदैव के लिए नहीं रह सकता | इसीलिए रहीमजी कहते हैं-

          पानी बाढे नाव में, घर में बाढे दाम |

          दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम ||

       जिस प्रकार नाव में यात्रा की अवधि में पानी भरने लगे तो दोनों हाथों से भरकर पानी को नाव से बाहर उलीच देना चाहिए अन्यथा नाव का डूबना निश्चित है | इसी प्रकार अगर धन की वर्षा हो रही हो तो दोनों हाथों से उसका दान करते रहना चाहिए अन्यथा उसका एक दिन नाश होना निश्चित है |  दान धन की सर्वोत्तम गति है और भोग मध्यम गति है | धन को अगर दान में न दिया जाये और भोगा भी न जाये तो फिर एक न एक दिन उस धन का नाश होना निश्चित है |

    सोचनीय शूद्र कौन है ? वसिष्ठजी कहते हैं -

           सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी | 

          मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ||

      उस शूद्र का सोच करना चाहिए जो ब्राह्मणों का अपमान करता है, बहुत बोलता है और जिसे ज्ञान का अभिमान है |

         शूद्र वर्ण का कर्तव्य सेवा करना है | सेवा करने वाले व्यक्ति को अपने ज्ञान का घमंड कभी भी नहीं होना चाहिए | अभिमान सेवा करने में सबसे बड़ी बाधा है | इस संसार में ज्ञान सभी को है | वह बात और है कि यह ज्ञान किसी किसी में ही परिलक्षित होता है | ज्ञान का दिखावा करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि ज्ञान तो व्यक्ति के आचरण से स्वतः ही दिखलाई पड़ जाता है |

        शूद्र वही विचार करने योग्य है जो किसी ज्ञानी व्यक्ति का अपमान करता है | किसी के सामने अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना ही ज्ञान का अभिमान है | ज्ञान के माध्यम से दूसरे को नीचा दिखाना, उसका अपमान करना है | बहुत अधिक बोलने का अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति ज्ञानी है | ज्ञान कभी गुप्त रह ही नहीं सकता | वह तो आपके आचरण से सबके सामने स्वतः ही प्रकट हो जाता है | इसलिए कोई शूद्र अगर ज्ञानी हो और साथ ही साथ सेवाभावी भी हो तो ऐसा शूद्र प्रशंसनीय है |

       कौन सी नारी शोक करने योग्य है, इसको स्पष्ट करते हुए वसिष्ठजी कहते हैं-

         सोचिअ पुनि पति बंचक नारी | 

         कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ||

             उस स्त्री का सोच करना चाहिए जो पति को छलने वाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है |

          एक पतिव्रता स्त्री पति की विश्वासपात्र, प्रिय, शांत स्वभाव वाली और पति की आज्ञानुसार आचरण करने वाली होती है | जिस स्त्री में इन चारों में से एक भी गुण का अभाव होता है तो फिर ऐसी स्त्री शोक करने योग्य ही है | ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज कहते हैं कि आज नारी स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री अपने पति की अवहेलना करने लग गयी है | गृहस्थी को सम्हालने के स्थान पर तथा आत्मनिर्भर होने के नाम पर वह नौकरी कर रही है | एक गृहस्थ के रूप में नारी केवल अपने पति के अधीन होते हुए भी स्वाधीन जीवन जीती है परन्तु कामकाजी स्त्री अपने कार्यस्थल पर बहुत से जनों के अधीन कार्य करते हुए अपनी वास्तविक स्वतंत्रता को खो रही है | इसको नारी स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता | कहा जाता है कि एक सुशील स्त्री के कारण दो घर सुधर जाते हैं परन्तु आधुनिक युग में तो नारी स्वतंत्रता के नाम पर प्रायः सभी घर उजड़ रहे हैं | ऐसी स्त्री वास्तव में सोच करने योग्य ही है |

       स्वामीजी की सोच उस समय की सोच है, जब स्त्रियों के घर से निकलने तक का विरोध किया जाता था। कहने का अर्थ है कि आज अगर सुसंस्कारित नारी बाहर नौकरी भी करती है तो उसके लिए ऐसा कहना उचित नहीं है।समस्या संस्कार के पालन न करने से होती है अन्यथा नारी तो अपने पति की प्रत्येक क्षेत्र में सहयोगिनी मानी गई है।

     नारी अगर धनोपार्जन हेतु नौकरी करते हुए भी स्वेच्छाचारी नहीं है अर्थात संस्कारों के विपरीत कोई कार्य नहीं करती है, तो वैसी नारी सोचनीय की श्रेणी में नहीं आती। पति परायण रहना और गृहस्थी को सम्हालना नारी के संस्कार है। स्वाभाविक लज्जा उसके आभूषण है। संस्कारों के अभाव से ही कलियुग में नारी की सोचनीय दशा होती जा रही है। अतः नारी का संस्कारित होना आवश्यक है ।

   ब्रह्मचारी की ओर संकेत करते हुए वसिष्ठ मुनि कह रहे हैं-

          सोचिअ बटु निज ब्रत परिहरई | 

          जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ||

          उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिए जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञानुसार नहीं चलता |

         ब्रह्मचर्य जीवन की वह अवस्था है जब एक ब्रह्मचारी संयमित जीवन जीते हुए अपने गुरु के अधीन रहकर शिक्षा ग्रहण करता है | ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म जैसा आचरण। जीवन की इस प्रथम अवस्था में बचपन से ही ब्रह्म जैसा आचरण करना सिखाया जाता है।जो ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य व्रत को तोड़ देता है अर्थात असंयमित जीवन जीने लगता है वह जीवन में कभी भी ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकता | उसको ज्ञान प्राप्त होता है, अपने गुरु के माध्यम से | इसलिए गुरु का सम्मान करना उसका प्रथम कर्तव्य बनता है | 

        काकभुशुण्डिजी गुरु के आगमन पर भी अपने आसन पर बैठे रहे थे, उनके सम्मान में उठ खड़े नहीं हुए थे, इस बात का शंकर भगवान् को बुरा लगा था | काकभुशुण्डि का यह आचरण शंकर भगवान् से देखा नहीं गया और उन्होंने तत्काल ही उसे श्राप दे दिया था |  

        ऐसा ब्रह्मचारी जो गुरु का सम्मान नहीं करता और उनके आदेशों की भी अवहेलना करने लग जाता है वह अंततः पतन को ही प्राप्त होता है | वास्तव में ऐसे ब्रह्मचारी की दशा सोचनीय है |

    नारी और ब्रह्मचारी के बाद एक गृहस्थ पुरुष के बारे में भी वसिष्ठ जी का मत जान लीजिए -

             सोचिअ गृही जो मोह बस 

            करइ करम पथ त्याग |

            सोचिअ जती प्रपंच रत 

            बिगत बिबेक बिराग ||मानस-2/172||

           उस गृहस्थ का सोच करना चाहिए जो मोहवश अपने कर्म का त्याग कर देता है |  जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है, उसके कुछ कर्तव्य होते है, जिन्हें उसे निभाना पड़ता है | जीवन में गृहस्थी अपनाई है तो ऐसे में संसार का विस्तार होना भी स्वाभाविक है | अपनी पत्नी की सुरक्षा, अपने बच्चों का पालन-पोषण और उनकी शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करना आदि एक गृहस्थ के कर्तव्य-कर्म हैं | कर्तव्य-कर्म को बोझ समझना मोह है | जो अपने कर्तव्य-कर्म से विमुख हो जाता है ऐसा गृहस्थ विचार करने योग्य है |

          कर्म-मार्ग का त्याग करना किसी भी गृहस्थ के लिए उचित नहीं है | हाँ, कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो जाने के बाद वह अपने जीवन में संन्यास का मार्ग अपना सकता है | जो व्यक्ति अपने गृहस्थ जीवन के कर्तव्य-कर्म से पलायन कर जाता है,वह भले ही कहीं पर भी चला जाये, अशांत ही रहेगा | ऐसा गृहस्थ सोचनीय है |

             आगे वसिष्ठ मुनि कहते हैं कि उस संन्यासी का सोच करना चाहिए जो संसार के प्रपंच में अभी भी फंसा हुआ है और ज्ञान तथा वैराग्य से हीन है | संन्यास का अर्थ है, संसार से मुक्त हो जाना और परमात्मा से जुड़ जाना | ऐसे में एक संन्यासी के लिए अपने जीवन में किसी भी प्रकार का कोई कर्तव्य नहीं रह जाता है | जिसने एक बार संन्यास मार्ग पर चलने का निर्णय कर लिया, फिर भी संसार के प्रपंच में लगा हुआ है, ऐसे संन्यासी का कल्याण नहीं हो सकता | संन्यासी के लिए महत्वपूर्ण दो बातें ही है - एक तो ज्ञान प्राप्त करना और दूसरा वैराग्यपूर्ण जीवन जीना | इसलिए एक संन्यासी को संसार में किसी भी प्रकार का राग नहीं रखना चाहिए |

          एक संन्यासी का जीवन सांसारिक जीवन से बिलकुल भिन्न होता है | उसको अपने पूर्व सांसारिक जीवन में किसी भी प्रकार की रुचि नहीं रखनी चाहिए | प्रायः देखा जाता है कि घर-बार छोड़कर व्यक्ति संन्यास तो ले लेता है परन्तु अपने पूर्व जीवन का चिंतन करते हुए अपने परिवार पर भी एक दृष्टि बनाये रखता है | ऐसा सन्यासी सोच करने योग्य है क्योंकि फिर उसकी दशा ‘माया मिली न राम’ वाली हो जाती है |

    गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ अवस्था को प्राप्त हुए व्यक्ति के बारे में वसिष्ठ मुनि कह रहे हैं-

           बैखानस सोई सोचै जोगू | 

           तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ||

              वही वानप्रस्थी सोच करने योग्य है, जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं | गृहस्थ जीवन के कर्तव्य से निवृत हो जाने पर वानप्रस्थ की अवस्था आती है | यह अवस्था तप करने की अवस्था है | जिसमें सभी प्रकार के विषय-भोग छोड़ देने होते हैं | परन्तु आज के युग में ऐसा प्रतीत होता है जैसे व्यक्ति के जीवन में वानप्रस्थ अवस्था कभी आती ही नहीं है | गृहस्थ जीवन के भोगों में ही व्यक्ति लगा रहता है और जीवन का संध्याकाल आ जाता है | फिर वह तपस्या ही क्या, कुछ भी करने योग्य नहीं रहता |

          सोचिअ पिसुन अकारण क्रोधी |

          जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ||

             सोच उसका करना चाहिए जो चुगलखोर है, अकारण क्रोध करता है तथा माता-पिता,गुरु एवं भाई बंधुओं से विरोध रखता है | चुगलखोर वह व्यक्ति होता है जो एक दूसरे के विरुद्ध बात करते हुए आपस में लड़ा तक देता है | इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करने का उसका स्वभाव होता है | चुगलखोरी संसार में सर्वाधिक निंदनीय कार्य है |

        आज छोटी-छोटी बात पर व्यक्ति क्रोधित हो जाता है | क्रोध सामने वाले को तो किसी प्रकार की कोई हानि नहीं पहुंचा सकता पर क्रोधी को अवश्य इससे शारीरिक और मानसिक संताप उठाना पड़ता है | वसिष्ठ मुनि ने ऐसे ही क्रोधी व्यक्ति को शोक करने योग्य बताया है | इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने माता-पिता, गुरु और भाई-बंधू को प्रेम नहीं करता, उनका विरोध और अपमान करता है, वे भी सोच के योग्य हैं |

           सब बिधि सोचिअ पर अपकारी |

           निज तनु पोषक निरदय भरी ||

         सब प्रकार से उनका सोच करना चाहिए जो दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने शरीर का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है | दूसरे को हानि पहुँचाना जिस व्यक्ति का उद्देश्य बन जाता है, वह व्यक्ति अपने जीवन में कभी भी प्रगति नहीं कर सकता | जो केवल अपने शरीर के ही पोषण में लगा रहता है वह बड़ा ही निर्दयी है | ऐसे व्यक्ति का कल्याण कैसे होगा? यह बात विचारणीय है |  

             सोचनीय सबहीं बिधि सोई | 

             जो न छाडि छलु हरि जन होई ||

              वह व्यक्ति तो सभी प्रकार से सोच करने योग्य है जो छल छोड़कर हरि का भक्त नहीं होता |

           वसिष्ठजी अंतिम और महत्वपूर्ण बात भरतजी को कहते हैं कि ऐसे मनुष्य का जीवन विचारणीय है जो सर्वोत्कृष्ट मनुष्य जीवन पाकर भी हरि की आराधना नहीं करता है बल्कि जीवन भर संसार में छल-कपट करने में ही लगा रहता है | मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य है-आत्म-बोध अर्थात परमात्मा को प्राप्त करना | हरि को जानना है तो हरि की भक्ति करना आवश्यक है |

          संसार से मुक्त होकर हरि के साथ भक्त होना ही हरि को जानना है और यही आत्म-ज्ञान है | इसके लिए सभी प्रकार के छल-कपट से दूरी बनानी होगी | दो नावों में एक साथ सवारी कभी भी नहीं हो सकती | संसार छल-कपट से भरा हुआ है, इसीलिए वह लुभावना प्रतीत होता है | संसार के आकर्षण को छोड़कर परमात्मा की ओर उन्मुख होने में ही मनुष्य का कल्याण निहित है |

         जब दशरथ का पुत्र-वियोग में मरण हो गया तब भरतजी के मन में भी एक सोच ने जन्म लिया था | उस अत्यधिक सोच-विचार के कारण भरत भी बड़े दुखी और शोकग्रस्त हो गए थे | तब मुनि वसिष्ठ ने उनका शोक दूर करने की लिए क्या कहा था ? गोस्वामीजी लिखते हैं-

   सुनहु भारत भावी प्रबल,

   बिलखि कहेउ मुनिनाथ |

   हानि लाभु जीवनु मरनु, 

   जसु अपजसु बिधि हाथ ||मानस-2/171||

    वसिष्ठजी दुखी मन से कहते हैं कि हे भरत ! सुनो, भावी बड़ी प्रबल है | हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के हाथ है | 

          वसिष्ठजी मानस में भरतजी को कहते हैं कि सोचो और विचार करो कि दशरथ के मरने का दोष किसको दिया जाये ? क्या दशरथ के मरण का दोष कैकई को दिया जाय, जिसके वर मांगने से अयोध्या का परिदृश्य एक ही रात में बदल गया था अथवा इसका दोष राजा के पुत्र-मोह को दिया जाय जो राम के वन चले जाने से उत्पन्न हुए आघात को तनिक भी सहन नहीं कर सके | आखिर इसका दोष किसे दिया जाय ?

           वसिष्ठ मुनि भरत को पूछ रहे हैं कि क्या केवल कैकेई के दो वर ही दशरथ के मरण के कारण बने हैं ? नहीं, जिस माता कैकेयी को तुम अपने पिता के मरने का कारण मान रहे हो, वह अनुचित है | संसार में जितनी भी घटनाएँ घटित होती हैं, उनमें से प्रत्येक घटना परमात्मा के द्वारा पूर्व नियोजित होती है और उनका होना निश्चित है | प्रत्येक घटना के घटित होने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है और वह घटना सबके हित में ही घटित होती है | घटना घटित होने के बाद हमें ऐसा प्रतीत होता है जैसे विधि ने हमारे साथ अन्याय किया है | इस संसार में कोई किसी के साथ अन्याय नहीं कर सकता, सब प्रकृति के नियमानुसार ही घटित होता है |

       वसिष्ठजी आगे कहते हैं कि इस बात के लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता और फिर दशरथ तो सोच करने योग्य है ही नहीं | उन जैसा राजा न तो अब तक कोई हुआ है, न है और न ही अब होने को है | अवधपति दशरथ ने अपने जीवन में प्रजा की भलाई के लिए ही कार्य किये हैं । अतः हे भरत ! सुनो, तुम्हें उनके मरने पर तनिक भी शोक नहीं करना चाहिए |

           त्रेता से अब चलते है द्वापर में। भरत की तरह ही द्वापर में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन भी एक काल्पनिक संसार में खोकर शोकग्रस्त हो गया था | किसी छोटी सी बात पर अत्यधिक विचार करने से भी मनुष्य अपने भीतर एक काल्पनिक संसार को रच लेता है | फिर उसे वही दिखलाई पड़ता है, जैसा वह देखना चाहता है | अर्जुन द्वारा युद्ध के बारे में किये गए अत्यधिक सोच-विचार ने ही उसे अवसाद की दशा में ला खड़ा कर दिया जो कि उसके विषाद का कारण बना |

         प्रश्न उठता है कि क्या किसी व्यक्ति, किसी कार्य, किसी विषय अथवा किसी घटनाक्रम पर किसी भी प्रकार के विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है ? नहीं, ऐसा सोचना भी अनुचित है | बिना सोच-विचार के निर्विचार की अवस्था तक पहुंचा ही नहीं जा सकता | इसलिए सोच-विचार करने की आवश्यकता प्रत्येक परिस्थिति में रहती ही है | बस, हमें इस बात का ज्ञान हो जाना चाहिए कि किस विषय पर कितनी सीमा तक विचार करने की आवश्यकता है | अनावश्यक रूप से और एक सीमा से अधिक सोचना ही मनुष्य को अर्जुन और भरत की तरह विषादग्रस्त कर देता है |

        संसार में प्रतिपल लाखों घटनाक्रम घटित होते हैं, क्या हम सभी पर विचार करते हैं ? नहीं, हम स्वयं से सम्बंधित व्यक्तियों, विषयों और कार्यों पर ही अधिक विचार करते हैं | कई बार हम ऐसे ऐसे विषयों पर विचार करने लगते हैं, जिनका हमसे दूर दूर का सम्बन्ध ही नहीं होता | ऐसे प्रत्येक विचार से दूरी बनाना आवश्यक हैं | इनमें राजनैतिक विषय प्रमुख है, जिस पर एक आध्यात्मिक चिन्तक के लिए सोचना भी निरथर्क है |

   विचार क्या है ? मुख्य रूप से विचार किसी उद्देश्य और उस उद्देश्य की पूर्णता के लिए किए जाने वाले कर्म के मध्य की एक प्रतिक्रिया मात्र है। यह प्रतिक्रिया परिणाम निकलने के पहले अथवा उसके बाद में हो सकती है।कहने का अर्थ है कि कार्य प्रारंभ करने से पहले उसके संभावित परिणाम  की कल्पना करने अथवा किसी कार्य अथवा घटना के हो जाने के बाद, मस्तिष्क में जो आवेग उत्पन्न होता है, वह आवेग ही विचार का जनक है। 

            चिंता, शोक, दुःख आदि के पीछे मन में उठने वाले विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | इन विचारों पर मंथन बुद्धि करती है।इस प्रकार कहा जा सकता है कि मन और बुद्धि की भूमिका विचार करने में है। ये दोनों ही जड़ प्रकृति के हैं। जड़ से चेतन तक नहीं पहुंचा जा सकता,अतः विचारों से आगे निकल जाना आवश्यक है, तभी इस मनुष्य जीवन का कुछ अर्थ है।

       विचारों के आधार पर मनुष्य को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है | पहली श्रेणी उन मनुष्यों की है जिनके मन में किसी कार्य के परिणाम पर गहराई से सोचने का विचार ही जन्म नहीं लेता | यह बुद्धिहीन लोगों की श्रेणी है, उनकी बुद्धि कुंद है। इन लोगों के भीतर विचार जन्म ही नहीं लेते।ऐसे मनुष्य को मनुष्य न कहकर पशु-पक्षी ही कहा जा सकता है | यह मनुष्य की विचारहीनता की अवस्था है |

          कुंद बुद्धि का अर्थ है जब बुद्धि में एक बात जच जाए फिर उसी पर टिके रहना, उस पर किसी प्रकार का विचार न करना । यह प्रथम श्रेणी ऐसे ही विचारहीन मनुष्यों की श्रेणी है, जिसमें किसी बात पर किसी कार्य के परिणाम पर विचार ही नहीं किया जाता | 

       दूसरी श्रेणी में वे मनुष्य आते हैं जिनके भीतर कार्य के परिणाम पर विचार जन्म लेते हैं, इसलिए वह अपने भीतर कार्य के परिणाम को लेकर बहुत अधिक चिंतन और मनन करने लगता है | ऐसे लोगों की बुद्धि तेज होती है।अत्यधिक चिंतन मनन करने से वह "क्या करूं, क्या न करुं", इस द्वंद्व का शिकार बन जाता है, जैसा कि कुरुक्षेत्र में अर्जुन के साथ हुआ था | यह मनुष्य की वैचारिक या विचारशील (Thoughtfulness) अवस्था है |

          तीसरी श्रेणी में वे मनुष्य आते हैं, जिनके भीतर विचार तो जन्म लेते हैं, उन विचारों के अनुसार भीतर चिंतन-मनन भी होता है फिर भी वे चिंता और शोकग्रस्त नहीं होते क्योंकि विचार करते करते एक अवस्था ऐसी आती है जब उन्हें विचार करना भी व्यर्थ लगने लगता है।कहने का अर्थ है कि इस स्थिति में बुद्धिमान व्यक्ति बुद्धि का अतिक्रमण कर जाता है। अंततः वे विचार करने की अवस्था से स्वयं को अलग कर लेते हैं | यह मनुष्य की निर्विचार (Thoughtlessness) की अवस्था है | इस अवस्था में मनुष्य वैचारिक अवस्था तक पहुँचता तो है, परन्तु वहाँ पहुंचकर उसे आभास हो जाता है कि किसी विषय पर इतना अधिक विचार करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है ।

       बुद्धि का अतिक्रमण किये बिना जीवन की वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता। यह पूर्ण होश की अवस्था है जहां बुद्धि होते हुए भी बुद्धि का अनर्गल उपयोग नहीं है।श्री कृष्ण इस सीढ़ी पर हैं और वे अर्जुन को भी खींचकर अपनी अवस्था में लाना चाहते हैं।

         प्रथम श्रेणी (विचारहीन) और तीसरी श्रेणी (निर्विचार) एक सी प्रतीत अवश्य होती है परंतु दोनों में गुणात्मक अंतर बहुत है।प्रथम श्रेणी का मनुष्य तीसरी श्रेणी में नहीं जा सकता क्योंकि विचारहीन अवस्था से निर्विचार की अवस्था में जाना संभव ही नहीं है क्योंकि वह किसी भी बात अथवा विषय पर तनिक भी विचार करने की क्षमता खो चूका है | या तो ऐसे लोगों में बुद्धि नहीं है या वह कुंद हो चुकी है। जब उनमें बुद्धि का अभाव है तो फिर उसके अतिक्रमण करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

        परन्तु दूसरी श्रेणी (विचारशील) का मनुष्य तीसरी श्रेणी (निर्विचार) में अवश्य ही ले जाया जा सकता है | वैचारिक अवस्था से बुद्धि से परे जाकर  निर्विचार की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है | महाभारत का दुर्योधन प्रथम श्रेणी का मनुष्य है तभी तो वह युद्ध के लिए आमादा है | ऐसा व्यक्ति बुद्धि का जरा सा भी उपयोग नहीं कर पाता। दुर्योधन युद्ध की विभीषिका के बारे में जरा भी विचार नहीं कर रहा है | वह युद्ध जैसे कार्य के बारे में विचारहीन है | प्रत्येक युद्ध चुनौती है परंतु उस चुनौती का परिणाम क्या होगा, इस पर विचार करना भी आवश्यक है।

         अर्जुन दूसरी श्रेणी का मनुष्य है, जो युद्ध भूमि में अपने सम्मुख खड़े युद्ध को देखकर, जिसको टालना अब लगभग असंभव है फिर भी उसकी विभीषिका के बारे में विचार तो कर रहा है | वह एक वैचारिक मनुष्य है |उसकी बुद्धि सोचने समझने लायक है। जब ऐसा मनुष्य एक सीमा से अधिक चिंतन मनन करता है तब वह अवसाद और विषादग्रस्त हो सकता है | जैसा कि अर्जुन के साथ हुआ था | अर्जुन को अगर सही दिशा मिले तो वह बुद्धि के पार जा सकता है। यह तो अच्छा हुआ कि उसे श्री कृष्ण जैसा गुरु मिला जिसने उसको वैचारिक स्थिति से निर्विचार की अवस्था में लाकर खड़ा कर दिया अन्यथा अर्जुन तो युद्ध से लगभग पलायन कर ही गया था |

      एक छोर पर दुर्योधन खड़ा है, दूसरे छोर पर श्री कृष्ण और दोनों के मध्य खड़े हैं, अर्जुन। अर्जुन दोनों में से किसी एक छोर पर अवश्य ही जाएगा। श्री कृष्ण जैसे गुरु मिलें है तो निर्विचार के छोर पर जाना निश्चित है।

     अर्जुन दो किनारों के मध्य में खड़ा है। विचारशील व्यक्ति बहुत संकल्प-विकल्प करता है। हथियार चलाने में संकल्प-विकल्प की कोई भूमिका नहीं होती। युद्ध के लिए या तो दुर्योधन की तरह विचारहीन होना होगा अथवा श्री कृष्ण की तरह निर्विचार की अवस्था वाला। वैचारिक मनुष्य तो केवल विचार ही कर सकता है, युद्ध नहीं।अर्जुन भी बहुत विचार कर रहा है और युद्ध से पलायन को ही सर्वश्रेष्ठ मान रहा है। देखते हैं, आगे भगवान श्री कृष्ण क्या करते हैं?

            भगवान् श्री कृष्ण ने युद्ध की विभीषिका के प्रति अर्जुन के विचार को पूर्ण रूप से धैर्य रखते हुए सुना और समझा | यही कारण है कि गीता के प्रथम अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण एक भी शब्द नहीं बोलते हैं | सब कुछ जानकर अर्जुन की दशा को समझकर ज्ञान की धारा को प्रवाहित करते हुए गीता के दूसरे अध्याय के प्रारम्भ में ही भगवान् श्री कृष्ण उसे कह देते हैं-

       अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |

        गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ||गीता-2/11||

       अर्थात अर्जुन ! तूने शोक न करनेयोग्य बात का शोक किया है और विद्वता भरी बातें कर रहे हो | जिनके प्राण चले गए हैं और जिनके प्राण नहीं गए है, उनके लिए पण्डित जन शोक नहीं करते |

       अर्जुन ने अपने सम्मुख खड़े युद्ध को देखा | उसने दोनों सेनाओं के मध्य खड़े होकर देखा कि मरने वाले और मारने वाले, दोनों एक ही परिवार के सदस्य हैं | फिर ऐसे युद्ध से क्या लाभ ? इस युद्ध के परिणाम में अगर जीत मिलेगी तो भी दुःख होगा और अगर पराजय मिलेगी फिर तो दुःख मिलना अवश्यम्भावी ही है |

   क्या दोनों ओर की सेनाओं में केवल अर्जुन के ही सम्बन्धी थे, दुर्योधन के नहीं थे ? सम्बन्धी तो दोनों के ही एक दूसरे के विरुद्ध खड़े थे परंतु दुर्योधन तो विचारहीन अवस्था में है।वह भला युद्ध के परिणाम पर विचार क्यों करे?उसकी तो बुद्धि एक ही बात कह रही थी कि एक सूई की नोक जितनी जमीन भी पांडवों को नहीं देनी है।कुंद हुई बुद्धि की दशा परिवर्तित नही की जा सकती। बुद्धि की दशा परिवर्तित होते ही तो विचारों को दिशा मिल जाती है।

        विचार से अधिक महत्वपूर्ण विचार की दिशा है | तामसिक प्रवृति का व्यक्ति विचारहीन होता है अर्थात उसके मन में किसी प्रकार का कोई विचार जन्म ही नहीं लेता | अगर कभी कोई विचार जन्म ले भी लेता है तो वह अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर उस पर मनन तक नहीं करता | सात्विक प्रवृति के व्यक्ति के मन में बहुत से विचार जन्म तो लेते हैं परन्तु उन विचारों पर मनन करते करते उसको विचार करना तथ्यहीन प्रतीत होता है और एक दिन वह निर्विचार की अवस्था को उपलब्ध हो जाता है | समस्या तो राजसिक प्रवृति वाले के व्यक्ति के साथ सबसे अधिक है, जिसके विचारों का कोई अंत ही नहीं है |

        विचार राजसिक प्रवृति के व्यक्ति को सर्वाधिक हानि पहुंचाते हैं | वह किसी भी घटना के बारे में बहुत अधिक सोचने लगता है, जैसा कि भरत के साथ हुआ था अथवा फिर वह किसी कार्य के संभावित परिणाम पर बहुत सोचता है, जैसा कि अर्जुन ने किया था | दोनों ही परिस्थितियों में वह मानसिक अवसाद और विषाद का आसान शिकार बन जाता है, जो उसके जीवन को प्रभावित करता है ।

          इस प्रकार स्पष्ट है कि बहुत अधिक सोच-विचार करने से शोक और विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है | साथ ही यह भी स्पष्ट है कि निर्विचार की स्थिति को प्राप्त कर लेने से शोक और चिंता दूर हो सकती है | महर्षि पतंजलि ने अपने अष्टांग-योग में योग का एक अंग "ध्यान" भी बताया है | ध्यान-योग से निर्विचार की अवस्था उपलब्ध हो सकती है, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है | परन्तु प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह एक सुगम साधन नहीं है |

        अब प्रश्न उठता है कि क्या ज्ञान से शोक दूर किया जा सकता है ? ज्ञान और ध्यान-योग के सम्बन्ध में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं –

   शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया |

   आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ||गीता-6/25||

    अर्थात धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा संसार से धीरे-धीरे उपराम हो जाएँ और मन-बुद्धि को परमात्मा में सम्यक प्रकार से स्थित करके फिर किसी भी प्रकार का चिंतन न करें | इस प्रकार प्रयास करने से निर्विचार की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है |

          गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कर्म, ज्ञान और भक्ति-योग के माध्यम से अर्जुन को शोक और विषाद की अवस्था से बाहर निकाला और कह दिया कि ‘मा शुचः’ अर्थात तू किसी प्रकार का शोक या चिंता न कर | सम्पूर्ण गीता में दो ही स्थान पर ‘मा शुचः’ आया है | 

       गीता एक राजसिक प्रवृति वाले व्यक्ति अर्जुन को कही गयी है | इसका तात्पर्य है कि राजसिक व्यक्ति के लिए शोक और चिंता से मुक्त होने के लिए, निर्विचार होने के लिए ध्यान-योग से महत्वपूर्ण दो अवस्थाएं और भी हैं, जिनके लिए ‘मा शुचः’, इन दो शब्दों को उपयोग में लिया गया है | 

            प्रथम अवस्था, दैवी सम्पदा की अवस्था है जिसको स्पष्ट करते हुए गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं –

    दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता |

    मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोSसि पाण्डव ||16/5||

               अर्थात दैवी सम्पति मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पति बंधन के लिए मानी गयी है | हे पाण्डव ! तुम दैवी सम्पति को प्राप्त हुए हो, इसलिए तुम शोक मत करो |     

           अपने में दैवी सम्पति की वृद्धि करते रहने से व्यक्ति धीरे-धीरे सभी प्रकार के विचारों से दूर होता चला जाता है | दैवी सम्पति कौन कौन सी है? इसको गीताजी के 16 वें अध्याय के प्रथम चार श्लोकों में स्पष्ट किया गया है |

          दैवी सम्पति से युक्त मनुष्य जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में सम रहता है | इसलिए उसके विचलित होकर शोकग्रस्त और चिन्तायुक्त होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता | इसलिए निर्विचार की अवस्था को प्राप्त करने के लिए दैवी सम्पति से सदैव युक्त रहना आवश्यक है |

         निर्विचार होने की दूसरी व्यवस्था, परमात्मा के शरणागत हो जाने की है | भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं –

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |

   अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||18/66||

    अर्थात सभी धर्मों (कर्तव्य कर्मों) के आश्रय का त्याग कर केवल एक मेरी शरण में आजा, मैं तुम्हें सभी प्रकार के पापों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत कर |

            राजसिक प्रवृति का व्यक्ति किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणाम पर गहराई से विचार करता है | उस विचार के अनुसार ही वह परिणाम स्वरुप मिलने वाले पाप और पुण्य की गणना करता है |देखा जाए तो पाप और पुण्य का अस्तित्व केवल मानसिक विचार के कारण ही है। वास्तव में कर्म-योग के अनुसार कर्म करने से सभी कर्म पाप और पुण्य से परे हो जाते हैं। 

       एक परमात्मा की शरण में चले जाने से व्यक्ति निश्चिन्त हो जाता है, निशोक हो जाता है, निर्भय हो जाता है और निशंक हो जाता है | इन चारों अवस्थाओं को प्राप्त कर लेने वाले व्यक्ति के मन में फिर किसी भी प्रकार के विषय पर विचार और मनन करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है । इस प्रकार भविष्य में फिर कोई विचार तक मन में जन्म ही नहीं लेगा |ऐसे में पाप और पुण्य होने का प्रश्न ही नहीं उठता। यही व्यक्ति की निर्विचार की अवस्था है |

        सभी प्रकार के शोक और चिंता से मुक्त होने के लिए एक परमात्मा की शरण में चले जाना ही सुगम और सर्वश्रेष्ठ मार्ग है | अन्य सभी मार्गों में विशेष प्रयास की आवश्यकता होती है परन्तु भगवान् की शरण लेने में किसी भी प्रकार के प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं होती | जब आप अपने जीवन की बागडोर परमात्मा को सौंप देते हैं, तब आपके समस्त कार्य बिना किसी विचार करने के ही संपन्न हो जाते है |  

            परमात्मा के शरण होने का अर्थ है, परमात्मा की इच्छा में अपनी इच्छा मिला देना | ऐसा कर लेंगे तो फिर किसी भी परिस्थिति में आप विचलित नहीं हो सकते | फिर किसी कार्य के परिणाम पर, किसी घटना, किसी विषय आदि पर किसी प्रकार का विचार करने की कोई  आवश्यकता ही नहीं होगी | हाँ, यह बात अवश्य है कि परमात्मा पर श्रद्धा और विश्वास किये बिना शरणागत हो जाना असंभव है | अतः एक परमात्मा पर ही पूर्ण विश्वास रखना महत्वपूर्ण है | जितने भी महान संत और भक्त हुए हैं, उनके जीवन का सपूर्ण भार परमात्मा ने अपने ऊपर लिया है |  

     गीता में भी भगवान् कहते हैं –

       अनन्यश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |

      तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || (9/22)

अर्थात जो अनन्य भक्त मेरा चिंतन करते हुए मेरी भलीभांति उपासना करते हैं, मुझमें निरंतर लगे हुए उन भक्तों का योगक्षेम अर्थात अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा मैं करता हूँ |

   इसलिए अगर विचार और चिंतन करना है तो केवल परमात्मा का करें | तभी ‘मा शुचः’ सही मायने में सिद्ध होगा ।

 सार-संक्षेप

          ‘मा शुचः’ अर्थात शोक न करो, से तात्पर्य है कि किसी भी विषय पर अधिक चिंतन न करो | ऐसा चिंतन व्यर्थ का चिंतन है | व्यर्थ का चिंतन ही चिंता और शोक का कारण बनता है | त्रेता में दशरथ के मरने पर भरतजी शोकग्रस्त होकर उनके मरने के कारणों पर विचार कर रहे हैं | यह घटना के घटित हो जाने के पश्चात् की वैचारिक अवस्था है | इधर द्वापर में अर्जुन भविष्य में घटित होने जा रही संभावित घटना पर विचार करते हुए शोकमग्न हो रहा है | यह भविष्य में होने वाले संभावित घटनाक्रम पर किये जाने वाली वैचारिक अवस्था है | दोनों ही अर्थात भूत और भविष्य की अवस्थाओं पर विचार करना किसी भी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता | व्यक्ति को सदैव  वर्तमान में रहते हुए तात्कालिक विषय पर ही किसी प्रकार का विचार करना चाहिए जैसा कि वसिष्ठजी ने भरत को मानस में बतलाया है |

         विचारहीन होने से अच्छा है, विचारवान होना | विचारहीन मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं है | हम प्रायः विचारहीन अवस्था को ही निर्विचार होना मान लेते हैं जोकि अनुचित है | विचारहीन व्यक्ति विचारशून्य नहीं हो सकता | विचारशून्य विचार उत्पन्न होने के बाद ही हुआ जा सकता है जैसा कि अर्जुन के साथ हुआ था | वैचारिक व्यक्ति को विचारशून्य की अवस्था में ले जाया जा सकता है विचारहीन व्यक्ति को नहीं |

       निर्विचार की अवस्था के लिए ध्यान-योग है परन्तु इसमें विशेष प्रयास करना पड़ता है | परमात्मा की शरण होना, निर्विचार की अवस्था को प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग है, जिस पर चलकर ही अर्जुन ने कुरुक्षेत्र का महाभारत अपने नाम कर लिया था | इसलिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है, एक परमात्मा की शरण लेकर निर्विचार हो जाना |

प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||


     


Wednesday, December 29, 2021

यः सदा मुक्त एव सः

 यः सदा मुक्त एव सः 

       भक्ति और मुक्ति एक दूसरे से संबंधित है क्योंकि मुक्त होकर ही भक्त हुआ जा सकता है।भक्त जुड़ता है और मुक्त संबंध विच्छेद करता है। एक भक्त होता है, संसार का और दूसरा भक्त होता है, परमात्मा का। संसार का भक्त जीवन भर सुखी-दुःखी होता रहता है और परमात्मा का भक्त मौज में रहता है। हमें संसार से संबंध विच्छेद करना है और परमात्मा से संबंध जोड़ना है। नहीं, नहीं ! परमात्मा से संबंध तो पहले से ही जुड़ा हुआ है परंतु संसार से संबंध जुड़ जाने के कारण हम परमात्मा से अपने संबंध को विस्मृत कर चुके है। यह बात पुनः स्मृति में तभी आएगी, जब संसार के साथ माने गए संबंध से हम मुक्त होंगे।

     एक मनुष्य के रूप में भले ही हम स्वतंत्र पैदा हुए हों परंतु संसार में आकर हमें बेड़ियाँ पहनने का शौक लग जाता है। बेड़ियाँ चाहे सोने की हो अथवा लोहे की, है तो बांधने के लिए ही न। हमें इन्हीं बेड़ियों से मुक्त होकर स्वयं की खोज करनी है। स्वयं की खोज ही परमात्मा की खोज है।

      कौन है मुक्त ? मुक्ति का परिणाम क्या है ?इनको जानने का प्रयास करंगे, "यः सदा मुक्त एव सः" में।

          आत्मबोध के लिए प्रयत्नरत व्यक्ति जानता है कि उस परमात्मा को कैसे प्राप्त किया जा सकता है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह दूर से दूर भी है और निकट से भी निकट है | संसार की आसक्तियों में आकण्ठ डूबे मनुष्य के लिए परमात्मा दूर से भी दूर है और जिसने संसार से असंग होते हुए उससे निवृति ले ली है उसके लिए परमात्मा निकट से भी निकट है | 

        परमात्मा की प्राप्ति उस प्रकार की प्राप्ति नहीं है जैसे किसी प्रकार के पदार्थ अथवा वस्तु को प्राप्त किया जाता है | परमात्मा की प्राप्ति से अर्थ है, जिस अज्ञान का बोझ हम अपने सिर पर उठाए आज तक भटक रहे हैं उस अज्ञान को छोड़कर ज्ञान को प्राप्त होना | हमें जब भी किसी वस्तु को प्राप्त करना होता है तो पूर्व में पकड़ी हुई वस्तु को छोड़ना पड़ता है | बिना किसी को छोड़े कुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता, यह सार्वभौमिक सत्य है | इसी प्रकार परमात्मा को प्राप्त करने के लिए भी संसार को छोड़ना पड़ता है | संसार को छोड़े बिना परमात्मा का प्राप्त होना असंभव है | संसार को पकड़कर रखना हमारा अज्ञान है और परमात्मा को पकड़ रखना ज्ञान है |

           हमारे जितने भी शास्त्र हैं, वे सब इस बात पर एक मत है कि बिना मुक्ति के परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती | ब्रह्म-सूत्र में एक सूत्र है – “मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्” (1/3/2) अर्थात उस प्रेमस्वरूप भगवान् को मुक्त पुरुषों के लिए ही प्रातव्य बताया गया है | मुक्त किससे होना है ? जिस बंधन में हम बंधे हुए हैं, उस बंधन से हमें मुक्त होना है | वह बंधन जिसमें हम बन्ध गए हैं, वह है हमारे द्वारा निर्मित संसार |

       प्रत्येक मनुष्य जन्म से ही स्वाभाविक रूप से मुक्त ही पैदा होता है परन्तु इस संसार में आकर इन्द्रिय-विषयों के भोगों में आकंठ डूबकर इस प्रकार बन्ध जाता है कि जीवनभर उनसे मुक्त नहीं हो पाता | तभी तो अष्टावक्र मुनि जनकजी को कहते हैं कि ‘मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्यज’ (अष्टावक्र गीता-1/2) यदि तू मुक्ति को चाहता है तो विषयों को विष के समान जानकर इनको छोड़ दे ।

              संसार के साथ बंधने में इन्द्रिय-विषय की भूमिका ही महत्वपूर्ण है | मुक्त पैदा हुआ मनुष्य इस संसार रुपी वियावान में भटकता ही इसीलिए है कि वह जीवन भर विषय-भोग प्राप्त करने में ही उलझा हुआ रहता है | विषय भोगों से आज तक कोई तृप्त नहीं हुआ है | अपने पुत्र पूरु से उसकी युवावस्था को प्राप्त करके भी राजा ययाति भोगों से संतुष्ट न हो सका, ऐसे में आपकी और मेरी तो बिसात ही क्या है ?

                 राजा ययाति दैत्यों के गुरु शुक्राचार्यजी के दामाद और देवयानी के पति थे | शुक्राचार्य जी दानवराज वृषपर्वा के पुरोहित थे | वृषपर्वा की एक पुत्री थी, शर्मिष्ठा | शर्मिष्ठा और गुरुपुत्री के मध्य अहंकारवश उपजे वैमनस्य-भाव के कारण दानव-राजकन्या शर्मिष्ठा को विवाह उपरांत देवयानी के साथ एक दासी के रूप में उसके ससुराल जाना पड़ा | थोड़े दिनों बाद देवयानी ने एक पुत्र को जन्म दिया | उचित अवसर जानकर शर्मिष्ठा ने ययाति से एकांत में सहवास की कामना की जिसे राजा ने स्वीकार कर लिया | इस प्रकार कामपिपासु ययाति से देवयानी से दो पुत्र और शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए | बहुत समय बीत जाने के उपरांत जब देवयानी को पता चला कि शर्मिष्ठा के तीनों पुत्र भी ययाति से ही उत्पन्न हुए हैं तब उसे बहुत दुःख हुआ और ययाति पर बड़ा क्रोध आया ।

                 शर्मिष्ठा और ययाति के सम्बन्ध की जानकारी मिलते ही देवयानी रुष्ट होकर तत्काल ही ययाति को छोड़कर अपने पिता के पास चली गयी | देवयानी से सारा वृतांत जानकर शुक्राचार्य को बड़ा क्रोध आया | उन्होंने राजा ययाति को तुरंत ही वृद्ध हो जाने का श्राप दे डाला |

              राजा ययाति ने शुक्राचार्य जी को समझाया कि इस शाप से केवल मेरा ही नहीं आपकी पुत्री का भी अहित ही होगा | ययाति ने शुक्राचार्य जी से बहुत आग्रह किया कि वे अपना शाप लौटा लें परन्तु एक ब्राह्मण के मुख से निकले वचन कभी असत्य नहीं हो सकते थे | शाप के प्रभाव से उसी समय ययाति को वृद्धावस्था ने घेर लिया और वे कुरूप हो गए |

        ययाति के बहुत अनुनय विनय करने पर शुक्राचार्य जी ने कह दिया कि ‘मेरे द्वारा दिया शाप तो वापिस नहीं हो सकता परन्तु इस शाप से बच निकलने की एक व्यवस्था मैं तुम्हें दे रहा हूँ | अगर कोई युवा व्यक्ति तुम्हारी वृद्धावस्था को स्वयं के लिए अपनी इच्छा से स्वीकार कर ले और तुम्हें अपनी युवावस्था दे दे, तो तुम पूर्व अवस्था को उपलब्ध हो सकते हो ।

        राजा ययाति राजमहल लौटे, उनके साथ देवयानी भी लौट आयी | राजा ने एक-एक कर अपने सभी पुत्रों से उनकी युवावस्था को स्वयं की वृद्धावस्था से बदलने का अनुरोध किया | एक-एक कर सभी पुत्रों ने इसके लिए स्पष्ट रूप से मना कर दिया | केवल सबसे छोटे पुत्र पूरु ( शर्मिष्ठा से उत्पन्न हुआ पुत्र) ने उनके इस आग्रह को सहर्ष अपना कर्तव्य मानते हुए स्वीकार किया और अपनी युवावस्था अपने पिताजी को देकर बदले में उनसे वृद्धावस्था ले ली | युवा होने के बाद कई वर्षों तक ययाति ने स्त्री-सुख का भोग किया |

         परिवर्तन सभी के जीवन में एक न एक दिन अवश्य ही आता है और ऐसा ही परिवर्तन ययाति के जीवन में भी आया | ऐसे परिवर्तन को जीवन का turning point कहा जाता है | जो व्यक्ति इस परिवर्तन को समझ जाता है, वह तो इस संसार चक्र से बाहर निकलने का प्रयास कर लेता है और जिसने इस परिवर्तन को अनदेखा किया, वह संसार चक्र में अनन्त काल तक घूमता रहता है | राजा ययाति ने अपने जीवन में आये इस परिवर्तन को समझा |

        राजा ययाति के मस्तिष्क में विचार आया कि मैं भी कैसा पतित व्यक्ति हूँ जो केवल शारीरिक सुख के लिए अधःपतन को प्राप्त हो गया हूँ | आज जब मेरे पुत्र को युवावस्था की आवश्यकता है तब मैंने उसको वृद्ध बनाकर उसके स्थान पर स्वयं सुख भोगने में लगा हुआ हूँ | इतने वर्षों तक भोग भोगने के बाद भी मुझे तृप्ति नहीं हुई है, इसका अर्थ यही है कि विषय-भोगों से कभी भी तृप्त नहीं हुआ जा सकता | विषयों को लगातार भोगते रहने से भी भोगवासना कभी शांत नहीं हो सकती बल्कि जैसे घी की आहुति देने से आग और अधिक भड़क उठती है वैसे ही भोगवासनाएं भोगों से और अधिक प्रबल हो उठती है | विषयों की तृष्णा ही दु:खों का उद्गम स्थान है |

         विचारों में आया यह परिवर्तन ययाति को एक नई दिशा दे गया क्योंकि उसने इन विचारों की उपेक्षा नहीं की थी | तत्काल ही उसने अपने पुत्र पूरु को राजभवन बुलाया और उसकी युवावस्था लौटा दी | स्वयं वृद्ध होकर सर्वप्रथम पूरु को राज्य दिया और फिर देवयानी को साथ में लेकर साधना हेतु वन के लिए राजभवन से प्रस्थान कर गए |

        इस प्रकार राजा ययाति के प्रसंग से स्पष्ट होता है कि कोई भी इन्द्रिय-विषय किसी को जीवन भर मिलता रहे तो भी तृप्त नहीं कर सकता | इसलिए जितनी शीघ्रता से विषयों को त्याग दिया जाये उतना ही जीवन के लिए लाभदायक है |

        कल एक मित्र से बात हो रही थी | कह रहे थे कि ‘स्त्री के कारण ही जीवन दु:खमय बना हुआ है | स्त्री को ही घर परिवार के लिए बहुत कुछ चाहिए | पुरुष को किसी भी चीज की आवश्यकता कभी नहीं होती |’ मैंने उनको बड़ी शालीनता के साथ समझाया कि भले ही एक पुरुष को जीवन में कुछ भी नहीं चाहिए, फिर भी उसे एक स्त्री अवश्य ही चाहिए | इस प्रकार पुरुष की जीवन में बस एक ही कामना होती है और वह कामना है एक स्त्री को पाने की | पुरुष ने ही स्त्री की कामना की थी और संसार चक्र में फंस जाने पर अब उसी स्त्री को दोष दे रहा है, क्या ऐसा करना उचित है ? कदापि नहीं | इसमें भला स्त्री का क्या अपराध है ?

           आपने स्त्री की कामना करके उसे पत्नी बनाकर अपने संसार को बनाया है |  इसके लिए आप ही दोषी हैं | या तो आपके मन में एक स्त्री को पाने की कामना ही नहीं उठती तो अच्छा होता और फिर भी कामनावश आपने स्त्री को पत्नी के रूप में पा भी लिया तो विषयों से निवृत्त होना आपका काम है, पत्नी का नहीं | इसमें पत्नी की भूमिका केवल आपका साथ देने तक ही सीमित है, अतः स्त्री को जीवन में कभी भी दोष न दें |

         मुक्ति के लिए न तो स्त्री बाधा है और न ही उसके कारण बना आपका संसार | मुक्ति के लिए एक तो स्वयं का प्रयास काम आएगा और दूसरा आपकी पत्नी का इस कार्य में सहयोग | इसलिए मन में मुक्ति का विचार आते ही राजा ययाति की तरह विषय-भोगों से निवृति पा लें | भोगों से निवृति तो आप नहीं ले पा रहे हैं और उलटे दोष स्त्री को दे रहे हैं | आपने स्त्री के माध्यम से संसार बनाया है, फिर इस संसार में आसक्त भी आप ही हुए हैं अतः इस संसार से आपको ही मुक्त होना है | इस संसार से निवृत होना आपका कार्य है, इसमें आपकी ही दृढ़ता काम आएगी |

              बात चल रही थी कि मुक्त व्यक्ति के लिए ही परमात्मा प्रातव्य है | मुक्ति और भक्ति, ये दो शब्द अध्यात्म में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं | भक्ति का अर्थ है, जुड़ना (attachment) और मुक्ति का अर्थ है, अलग हो जाना (separation) यानि जिससे जुडाव है उससे स्वतंत्रता पा लेना | एक आध्यात्मिक चिन्तक, जिससे जुडाव है (संसार) उससे तो मुक्त होता है और जिससे दुराव है (परमात्मा) उससे जाकर जुड़ता है | मनुष्य का जुडाव रहता है, संसार से | अतः मुक्त हो जाने का अर्थ है संसार से अलग होकर स्वतन्त्र हो जाना | मनुष्य का संसार से जुडाव उसे परमात्मा से दूर बनाये रखता है | संसार से अलग होकर परमात्मा के साथ जुड़ना ही मुक्ति से भक्ति की तरफ जाना है |

           संसार से विमुख होने का अर्थ संसार से द्वेष रखना कदापि नहीं है बल्कि संसार की गतिविधियों में जो आपकी रुचि है उससे स्वयं को अलग रखते हुए परमात्मा के सम्मुख होना है | संसार से भिन्न होकर ही संसार को जाना जा सकता है | परमात्मा को जानने के लिए उनसे अभिन्न होना पड़ता है ।

        आप जिसके सम्मुख होते हैं, स्वतः ही उसके विपरीत से विमुख हो जाते हैं | अगर हम पूर्व दिशा के सम्मुख हैं तो स्वतः ही पश्चिम दिशा से विमुख होते हैं | परमात्मा के सम्मुख होने का अर्थ है संसार से विमुख हो जाना; ज्ञान के सम्मुख होने का अर्थ है अज्ञान से विमुख होना और इसी प्रकार प्रकाश की ओर उन्मुख होने का अर्थ है अँधेरे से दूर होना | इसीलिए कहा गया है कि मुक्त पुरुष के लिए ही परमात्मा प्राप्तव्य है | परमात्मा को प्राप्त करने का अर्थ है-जो प्राप्त है, उसका त्याग करना | अतः कहा जा सकता है कि संसार के त्याग में ही परमात्मा की प्राप्ति छिपी है | “अतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः” (भागवत-10/14/28) अर्थात संसार के त्याग में ही परमात्मा की खोज निहित है |

             संसार में आसक्ति रखना बंधन है और संसार में रहते हुए अनासक्त होकर जीना ही उससे मुक्ति है | संसार की आसक्ति हमें बंधन में कैसे डालती है ? यह जान लेना भी आवश्यक है | जब तक हम इस बात को स्पष्ट रूप से जान नहीं लेंगे तब तक मुक्ति की राह नहीं पकड़ सकते | भला, मुक्त हुए बिना परमात्मा से हमारी दूरी कैसे मिटेगी ?

                प्रायः हममें से प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा की भक्ति की बात करता है परन्तु संसार से मुक्ति की बात आती है, तब सब यही कहते हैं कि हम तो मुक्त ही हैं | परन्तु सच्चाई यह है कि हममें से कोई भी संसार से सही मायने में मुक्त नहीं है | मेरी बात कुछ कटु लग सकती है परन्तु जब तक दर्पण में प्रतिबिम्ब देखा नहीं जायेगा तब तक हमें अपनी वास्तविकता का अनुभव नहीं होगा | आइये, यही जानने का प्रयास करते हैं कि संसार की आसक्ति में डूबे हुए व्यक्ति की पहचान कैसे कर सकते हैं ? यह सूत्र केवल स्वयं को पहिचानने के लिए है, किसी अन्य को इन के आधार पर पहिचानने का प्रयास न करें, यह जानते हुए कि हम सभी एक नाव में बैठे हुए इस असार संसार सागर में विचरण कर रहे हैं | हम सब की एक सी ही यात्रा हैं |

              आध्यात्मिक प्रगति के बारे में प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को दूसरे से भिन्न समझता है | जबकि वास्तविकता यह है कि केवल प्रतिमा की पूजा और पाठ आदि करने को ही हम महत्वपूर्ण मान बैठे हैं | इस संसार से आसक्ति किसी की भी नहीं छूट रही है | जब तक संसार की आसक्तियों से से मुक्ति नहीं मिल जाती तब तक आध्यात्मिक प्रगति शून्य ही कही जाएगी |

          जो व्यक्ति भयग्रस्त है, मान लीजिये वह अभी भी संसार में आसक्त है | भय का मुख्य कारण है-‘जो मिला है वह कहीं खो न जाये’| वास्तव में जीवन में जो कुछ भी मिला है वह संसार और शरीर से किसी भी मायने में भिन्न नहीं है | संसार और शरीर दोनों ही क्षर है इसका अर्थ हुआ कि जो मिला है उसकी स्थिति भी सदैव एक समान नहीं रह सकती | जब क्षरण होना ही उसकी नियति है, तो उसका खो जाना भी निश्चित है | तो फिर खोने का भय क्यों ? सांसारिक पदार्थ एक न एक दिन समाप्त होने है, उनका एक से दूसरे प्रारूप में परिवर्तित होना प्राकृतिक नियम है | हमारा शरीर भी उस नियम से परे नहीं है |

          यह शरीर और इस शरीर से सम्बंधित सभी विषय-भोग, परिवार-जन, धन-सम्पति, भवन आदि सभी क्षरण के गुण लिए हुए है | उसमें आसक्ति रखना ही हमारे भय के मूल में है | जब तक हम भयग्रस्त हैं तब तक हम मुक्त नहीं हुए है, यह बिलकुल स्पष्ट है | इस संसार का संग करते हुए हम भय से कभी भी मुक्त नहीं हो सकते और भय से मुक्त हुए बिना परमात्मा की ओर यात्रा नहीं हो सकती |

        श्री मद्भागवत महापुराण में राजा चित्रकेतु और रानी कृतद्युति का वृतांत आता है | वृद्धावस्था की दहलीज पर दोनों खड़े हैं और सन्तान न होने के कारण वे अपने आपको दुखी मान रहे हैं | तभी ऋषि अंगिरा और नारदजी का आगमन होता है | राजा उन्हें अपने दुःख का कारण बतलाते हैं | ऋषि अंगिरा और नारदजी के बहुत समझाने पर भी वे जिद्द करते हैं कि एक बार पुत्र हो जाये तो हम अवश्य ही सुखी हो जायेंगे | आखिर दोनों उन्हें इस चेतावनी के साथ पुत्र होने का आशीर्वाद देते हैं कि यह पुत्र तुम को सुख और दुःख दोनों ही देगा |

       समय पाकर रानी कृतद्युति पुत्रवती होती है | राजा चित्रकेतु बड़ा प्रसन्न होता है | दिन-रात राजा और रानी, पुत्र को लाड़-प्यार करने में ही लगे रहते हैं | इन दोनों का सुखी होना अन्य रानियों से देखा नहीं जाता | द्वेष-भाव से अन्य रानियां मिलकर राजपुत्र को विष दे देती है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है | राजा चित्रकेतु और रानी कृतद्युति पुत्र शोक में रो-रो कर पागल हो जाते हैं | चेतना लौटते ही पुत्र के शव को सीने से लगाकर फिर से विलाप करने लगते हैं | तभी ऋषि अंगिरा और नारद मुनि वहां पहुँच जाते हैं |  

          ऋषि अंगिरा और नारद मुनि, राजा और रानी को विविध प्रकार से समझाते है कि ‘राजन ! हमने तो पहले ही कहा था कि यह पुत्र तुम्हें हर्ष और शोक, दोनों को ही देने वाला होगा परन्तु तुम माने नहीं और पुत्र प्राप्ति की अपनी जिद्द पर अड़े रहे | अब पुत्र के चले जाने से दुखी क्यों हो रहे हो ?’

           मनुष्य की यही नियति है कि वह जीवन भर आसक्ति के कारण सुखी दुखी होता रहता है | राजा और रानी, दोनों जिद्द करते हैं कि एक बार हमारे पुत्र से हमारी बात करा दीजिये | अंततः नारदजी द्वारा राजपुत्र की जीवात्मा को बुलाया जाता है | जीवात्मा को देखते ही राजा चित्रकेतु कहते हैं-‘पुत्र तुम कहाँ चले गए हो ? तुम्हारी मां तुम्हारे जाने से दुखी है | लौट आओ, हमारे पास |’ जीवात्मा उत्तर देते हुए कहती है-‘कौन पुत्र ? किसका पुत्र ? मुझे अपनी सांसारिक यात्रा में अब तक न जाने कितने मां बाप मिल चुके हैं | अब जहाँ मैं पहुँच गया हूँ वहां के मां-बाप मुझे देखकर प्रसन्न है और मैं भी उनके वहां प्रसन्न हूँ | मैं अब पुनः आपके यहाँ लौट नहीं सकता, प्रकृति का यही नियम है |’ इतना कहकर राजपुत्र की जीवात्मा अन्तरिक्ष में खो गयी |

            विलाप करते राजा-रानी को ऋषि अंगिरा और नारदजी ने विविध प्रकार से समझाते हुए ज्ञान दिया, तब जाकर दोनों पुत्र-शोक से मुक्त हो सके | ज्ञान होते ही राजा चित्रकेतु और रानी कृतद्युति ने राजमहल का त्याग कर दिया और परमात्मा की प्राप्ति के लिए साधना करने वन की ओर चल दिए |

              इस प्रकार ययाति प्रसंग से निकला सूत्र तो कहता है कि अगर हम मुक्ति चाहते हैं तो हमें विषयों का त्याग कर देना चाहिए तथा चित्रकेतु-नारद-अंगिरा संवाद से यह निष्कर्ष निकलता है कि इच्छा रखना ही हमें बंधन में डालता है, मुक्त नहीं होने देता |

       सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आसक्ति ही दुःख और भय का मूल कारण है | आसक्ति के कारण ही मन में विविध इच्छाएं और कामनाएं जन्म लेती है | जब कामना पूर्ति हो जाती है तो परिणाम में प्राप्त हुए के खो जाने का भय सताता है | कामना पूर्ण न हो तो दुःख और क्रोध पैदा होता है | कामना ही राग और द्वेष की जनक है | जो प्राप्त हुआ है, उसमें तो राग उत्पन्न हो जाता है और जिस कारण से प्राप्त नहीं हो सका है उस कारण के प्रति द्वेष |

         गीताजी के 16 वें अध्याय में दैवी सम्पदा का वर्णन आता है | जिसमें बताया गया है कि दैवी सम्पति मुक्ति के लिए है | हमें अपने जीवन में दैवी सम्पदा से युक्त होना चाहिए जिससे मुक्त हो सकें |

          दैवी सम्पदाएँ हैं- भय का सर्वथा अभाव, अंतःकरण की शुद्धि, योग में दृढ स्थिति,सात्विक दान, इन्द्रिय-दमन,यज्ञ, स्वाध्याय, कर्तव्यपालन के लिए कष्ट सहना, शरीर-मन-वाणी की सरलता, अहिंसा, सत्य बोलना, क्रोध न करना, राग-द्वेष का न होना, चुगली न करना, सभी प्राणियों के प्रति दया भाव रखना, विषयों में आसक्त न होना, अकर्तव्य में लज्जा भाव, कोमल ह्रदय, चपलता का अभाव,तेज,क्षमा,धैर्य,शरीर की शुद्धि,वैर भाव का न होना, मान-सम्मान न चाहना आदि | इसके विपरीत आसुरी संपदाओं का वर्णन करते हुए भगवान् स्पष्ट करते हैं कि दंभ करना, घमंड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकी होना आसुरी सम्पदा को प्राप्त हुए मनुष्य के लक्षण है |

      हमें दैवी सम्पदा से युक्त होना है, तभी संसार से मुक्त हो सकते हैं |

              मुक्त कौन है ? इसको स्पष्ट करते हुए भगवान् गीता के पांचवें अध्याय के 28 वें श्लोक में कहते हैं-

    यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण:       |

     विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः || 

अर्थात जिसकी इन्द्रियां,मन और बुद्धि जीती हुई है, जो मोक्ष परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है |

       इन्द्रियां विषय-भोग को प्राप्त करने का कार्य करती है और मन उन विषय-भोगों को प्राप्त करने की इच्छा करता है जिसमें बुद्धि उसकी सहयोगी बनती है | इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात हुई; मन, बुद्धि को जीतना जिससे इन्द्रियाँ विषयों की ओर न दौड़े | ऐसा होना केवल तभी संभव है जब भीतर मोक्ष की कामना हो | परमात्मा के सम्मुख और संसार से विमुख होने से ही इन सबको जीता जा सकता है | मन, बुद्धि और इन्द्रियों को जीत लेने का परिणाम होता है-इच्छा, भय और क्रोध का न होना | जिस व्यक्ति के जीवन में इच्छा, भय और क्रोध का अभाव है वह सदैव मुक्त ही है | ऐसा मुक्त व्यक्ति ही परमात्मा प्राप्ति का अधिकारी होता है |

         संसार से मुक्त होने के लिए क्या करना होगा | भगवान् श्री कृष्ण गीता में कहते हैं –‘असंगशस्त्रेण दृढेण छित्वा’ (15/3) अर्थात दृढ मूलों वाले संसार रुपी वृक्ष को असंग रूप शस्त्र से काट दें | असंग का अर्थ है संसार का संग न करें | संसार के संग से तात्पर्य है, संसार में आसक्ति न रखें | हमारी आसक्ति या तो विषय-भोगों में होती है अथवा संसार के पदार्थों और विभिन्न शरीरों में, जिन्हें हम अपना परिवार कहते हैं | परिवार के सदस्य हमें वैसे ही इस जीवन में मिलते हैं, जैसे प्यासे व्यक्ति विभिन्न मार्गों से चलते हुए एक प्याऊ पर आकर कुछ समय के लिए मिल-बैठ जाते हैं | प्यास से मुक्त होते ही सभी अपने अपने रास्ते चल देते है |

       जब हम सब अपनी-अपनी यात्रा पर गतिमान है तो फिर राह में मिलने वालों से लगाव क्यों ? यह लगाव रखना ही बंधन है | इस प्रकार के लगाव से मुक्ति पा लेना ही संसार से  असंग हो जाना है | संसार से असंग होना ही मुक्ति है |

      भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि असंगता ही वह शस्त्र है जिससे सांसारिक बंधन काटे जा सकते हैं | संसार के बंधन काट डालने के उपरांत ही परमात्मा की खोज प्रारम्भ होती है, बंधन के रहते नहीं | ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज कहते हैं कि संसार नित्य निवृत है, इसलिए इसको नित्य होना मान लेने की भावना का त्याग करना होता है और परमात्मा नित्य प्राप्त है, इसलिए उनकी खोज करनी होती है | ‘ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्’ (गीता-15/4) अर्थात असंग शस्त्र से संसार की दृढ मूल वाले वृक्ष को काटकर फिर परमात्मा की खोज करनी चाहिए |

             संसार में राग रखना ही बंधन है | संसार के प्रति राग को मिटा डालना ही मुक्ति है | बिना संसार से मुक्त हुए भगवान् से भक्त नहीं हो सकते | अतः भक्ति के लिए संसार से मुक्त होना आवश्यक है | यही परमात्मा तक पहुँचने का एक मात्र रास्ता है | जीवन में संसार से अनासक्त हो जाना ही हमें आत्म-बोध की ओर ले जा सकता है, जहाँ पहुंचकर हम स्वयं ही परमात्मा हो जाते है |

         गीता कहती है कि जो मान और मोह से रहित हो गए हैं, जिन्होंने आसक्ति से होने वाले दोषों को जीत लिया है, जो नित्य निरंतर परमात्मा में लगे हुए है, जो सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हो गए हैं, जो सुख-दुःख नामक द्वंद्वों से मुक्त हो गए हैं वे ही वास्तव में संसार से असंग हुए हैं | इनमें से किसी भी व्यक्ति में एक भी विकार है तो समझ लें कि वह अभी भी बंधन में है, मुक्त नहीं हुआ है |

         जिसमें एक भी ऐसा विकार नहीं है वही मुक्त है | “गच्छन्ति अमूढ़ा: पदम् अव्ययं तत् (गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्-गीता-15/5) अर्थात ऐसे मुक्त हुए ज्ञानी व्यक्ति ही उस अविनाशी पद को प्राप्त करने के लिए गतिमान होते हैं | कहने का अर्थ है कि संसार से असंग होने के लक्षण जो कि ऊपर बतलाये गए हैं, परमात्मा केवल ऐसे पुरुषों के लिए ही प्राप्तव्य है | अतः हमें जो यह मनुष्य जीवन मिला है उसकी उपयोगिता तभी है जब हम संसार में आसक्त न रहें और परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयास करें।

                     सिकंदर के जीवन का एक वृतांत है | जब सिकंदर अपने विश्व-विजय अभियान पर निकला था तब निकलने से पहले वह अपनी मां से आशीर्वाद लेने उनके पास गया था | उसने मां से पूछा कि जब मैं विश्व-विजय अभियान से लौटूं तो तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊँ ? मां ने कहा कि अगर ला सकते हो तो भारत देश से एक संत को लेकर आना | सिकंदर ने सोचा कि एक संत को हिंदुस्तान से ले कर आना कौन सी बड़ी बात है? उसे तो मैं बड़ी आसानी से ले आऊंगा |

            परन्तु सिकंदर की सोच ही गलत थी | संत अपनी मर्जी का मालिक होता है, किसी का गुलाम नहीं | इसीलिए वह सदैव भयमुक्त रहता है |

       जब सिकंदर अपनी हिंदुस्तान यात्रा से वापिस लौटने लगा तो उसको अपनी मां का कहा स्मरण हो आया | उसने तत्काल ही किसी संत की खोज में निकल पड़ने की सोची | इस विचार को अपने सैन्य साथियों के साथ बाँटते हुए वह एक संत की खोज में निकल पड़ा | उसके  साथियों ने सुरक्षा के लिए साथ चलने का कहा परन्तु उसने यह जान कर उन्हें रोक दिया कि भला एक संत को लाने में सेना की क्या आवश्यकता है ?

        हिमालय की गुफाओं में खोजते-खोजते सिकंदर को आखिर एक संत मिल ही गए | घोड़े पर बैठा सिकंदर और जमीं पर अधलेटा नंगधडंग एक संत | घोड़े पर बैठे-बैठे सिकंदर बोला-‘तुम्हें मेरे साथ यूनान चलना होगा |’ संत ने कहा कि ‘हम कहीं जाते-आते नहीं है।हमने भटकना छोड़ दिया है’ | सिकंदर ने कहा – ‘यह तलवार  देखते हो न | मैं चाहूँ तो इसके एक ही झटके में तुम्हारा सिर धड़ से अलग हो जायेगा |’ संत ने कहा –‘किसको तलवार का भय दिखा रहे हो ? जिस प्रकार तुम मेरा सिर धरती पर गिरते देखोगे उसी प्रकार मैं भी उसे गिरते देखूंगा |’

          सिकंदर की आँखों में आँखे डालकर भारत का एक संत बात कर रहा है | उसे तनिक भी भय नहीं है कि सामने मन में विश्व विजय की कामना लिए एक सम्राट खड़ा है | भारत का यह संत मुक्त है, सभी प्रकार की इच्छाओं से, भय से, क्रोध से | जबकि सिकंदर की इच्छाओं का कोई ओर-छोर नहीं है | संत की बात सुनते ही सिकंदर का क्रोध जैसे पिघल गया | आज वह एक साधारण से दिखने वाले संत से परास्त हो गया | हिम्मत कर उसने संत से पूछा - ‘आप कौन है ?’ संत ने कहा –‘अहम् ब्रह्मास्मि |’

        संत के ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ कहते ही सिकंदर चौंका | एक नंगधडंग संत भूमि पर पड़ा है, जिसके पास कुछ भी नहीं है और वह निर्भय होकर कह रहा है कि मैं ब्रह्म हूँ | सिकंदर की मुमुक्षा बढ़ी | वह और अधिक जानने को आतुर हुआ | घोड़े पर से नीचे उतरा | तलवार को अलग रखते हुए संत के सामने घुटनों के बल बैठकर नत मस्तक हो गया | आज उसे समझ में आ रहा था कि मां ने जो वस्तु मुझसे मांगी है, जिसको मैं एक साधारण सी बात मान रहा था, वह संसार की समस्त धन-दौलत से भी न खरीदे जा सकने वाली वस्तु है।वह वस्तु इतनी असाधारण है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता |

           सिर उठाकर सिकंदर ने बड़ी ही मधुर वाणी में संत से पूछा - ‘अगर आप ब्रह्म है तो फिर मैं कौन हूँ ?’ संत ने उत्तर दिया –‘तत्त्वमसि’ (तत् त्वं असि) अर्थात तुम भी वही हो |’ सुनकर सिकंदर की आँखें फटी की फटी रह गयी | वह सोचने लगा - ‘मैं भी ब्रह्म हूँ | मैंने अभी तक यह जाना ही नहीं था | संत के सानिध्य ने आज ही मुझे इस बात का ज्ञान कराया है |”  आज सिकंदर अपने को संसार का सबसे सौभाग्यशाली व्यक्ति समझ रहा था जो उसे  एक संत का सानिध्य मिला | सत्य है-अँधेरे को भगाने के लिए प्रकाश की एक छोटी से किरण ही पर्याप्त है |

            सिकंदर से इससे आगे कुछ भी पूछते न बना | उसने संत को प्रणाम किया और अपनी तलवार उठाकर घोड़े पर बैठ गया और भारी मन से वहां से निकल गया | उसके लिए अभी भी बहुत कुछ जानना शेष था परन्तु उसके साथी उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो रहे होंगे, यह जानकर वह अधिक न रूक सका | एक संत के अल्प समय के लिए मिले सानिध्य ने उसको कितना परिवर्तित कर दिया, इसको जान लेने की हमारी उत्सुकता नहीं है | हमें तो संत की बात महत्वपूर्ण लगी |

       एक दृष्टि संत के व्यवहार पर डालेंगे तो पाएंगे कि ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ कहना तभी संभव हो सकता है, जब व्यक्ति मुक्त हो | समस्त आसक्तियो से मुक्त होते ही संसार से मुक्त हो जाता है और फिर वह स्वयं ही ब्रह्म हो जाता है | इसलिए जीवन में भय मुक्त हों, क्रोध मुक्त हों और इच्छा रहित हों | तीनों आपस में सम्बंधित है | केवल इनसे मुक्त होने के लिए मन, बुद्धि और इन्द्रियों पर दृढ़ता से नियंत्रण करना होगा | तभी हम मुक्त कहे जा सकते हैं और उस अवस्था को एक दिन उपलब्ध हो जायेंगे जब हम भी कह सकेंगे –“अहम् ब्रह्मास्मि |”

प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||


         


 


            


 


           


        


             


Friday, December 3, 2021

नाथ आजु मैं काह न पावा...

 नाथ आजु मैं काह न पावा...

        अभी कुछ दिनों पूर्व की बात है, मैं अपने मित्रों के साथ बैठा चर्चा कर रहा था | अनायास ही एक मित्र ने कहा कि “आप जब भी चर्चा करते हैं, तब गीता अथवा उपनिषद की बात अधिक करते हैं, राम-चरित्र से सम्बंधित उदाहरण बहुत ही कम देते हैं | क्या आपको गोस्वामीजी की रामचरितमानस पसंद नहीं है ?” मैंने कहा कि ऐसी बात नहीं है, राम-चरित्र के समान कोई दूसरा मर्यादित चरित्र नहीं है | इतना कहकर मैंने चर्चा का विषय बदल दिया और उनकी रुचि को देखते हुए श्री रामचरितमानस पर बात करने लगा |

           मित्र द्वारा अनायास दागे गए इस प्रश्न ने मुझे कुछ सोचने को विवश कर दिया | ऐसा नहीं है कि गोस्वामीजी की रामचरितमानस ने मुझे प्रभावित नहीं किया है | जीवन में सर्वप्रथम जिस ग्रन्थ से प्रेरणा मिली वह गोस्वामीजी का यही ग्रन्थ था | बात उन दिनों की है जब मैं सातवीं कक्षा में अध्ययनरत था | उस समय की हिंदी की पुस्तक में एक पाठ होता था- “केवट का भाग्य” | उस समय की समझ के अनुसार उस पाठ ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया | हालाँकि उस समय की सोच-समझ ने रामचरितमानस के इस प्रसंग के मर्म को इतना स्पष्ट रूप से मैं समझ नहीं सका था जितना बाद में संतों के मुख से सुनने से यह स्पष्ट हुआ है |

          श्री रामचरित मानस में केवट-प्रसंग मात्र तीन दोहों के अंतर्गत आई चौपाइयों तक ही सिमटा हुआ है | इतना कम स्थान मिलने के उपरांत भी यह प्रसंग बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है | वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में केवट प्रसंग है ही नहीं | इन दोनों ग्रंथों में गंगा पार जाने के लिए केवल मल्लाहों और निषादराज गुह के द्वारा ही नाव का सञ्चालन करना बताया गया है | श्री रामचरितमानस में जिस ढंग से गोस्वामीजी ने इस प्रसंग को भावपूर्ण बनाया है, वह भले ही उनकी एक कल्पना मात्र हो परन्तु है वह बहुत ही उच्च कोटि की | यथार्थ के मूर्त रूप लेने के पीछे कल्पना का ही हाथ होता है | प्रत्येक महत्वपूर्ण खोज का आधार कोई न कोई कल्पना ही होती है | कल्पना से ही इस संसार का निर्माण हुआ है और कल्पना से ही जीवन को आनंदित बनाया जा सकता है | मनुष्य अपने जीवन में अगर कल्पना ही नहीं करे तो उसका जीवन नीरस ही बना रहता है | जीवन की सरसता का राज़ कल्पना में ही छिपा रहता है | इसी कल्पना ने गोस्वामीजी के केवट का अस्तित्व न होते हुए भी उसे जीवंत बना दिया है |

         त्रेतायुग में गंगा के किनारे तुलसी का वह केवट रहता था अथवा नहीं, हमारे चिंतन का यह विषय नहीं होना चाहिए | चिंतन का विषय होना चाहिए कि केवट ने अपने जीवन में ऐसा क्या कार्य किया जिसके कारण वह अमर हो गया | केवट नाम के चरित्र को जानना और समझना इतना सरल नहीं है | केवट को समझने के लिए हमें स्वयं को केवट बनना होगा | इसी केवट प्रसंग की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए त्रेता युग से पूर्व आपको सतयुग में लिए चलता हूँ |

          सतयुग में एक बार क्षीर सागर में भगवान् श्री हरिः शेष शैया पर विश्राम कर रहे थे | श्रीजी उनके चरणों की सेवा में रत थी | भगवान् की शैया बने थे शेषजी महाराज जोकि अभी श्री हरिः के शारीरिक स्पर्श का सुख लेने में मग्न है | तभी वहां एक कछुआ आता है जोकि श्री हरिः के चरणों का स्पर्श पाने को आतुर है | वह चरणों का स्पर्श करने के लिए शेष शैया पर चढने का बार-बार प्रयास करता है | शेषजी को इस बात का आभास हो जाता है और वे अपनी पूंछ फटकारने के साथ-साथ फुंफकार भी रहे हैं | तुरंत ही कछुआ दूर हट जाता है और पुन: अवसर मिलने की प्रतीक्षा करता है | इस बार अनुकूल समय जानकार फिर कछुआ श्री हरिः की ओर बढ़ता है | शेषजी फिर चरण स्पर्श का उसका प्रयास विफल कर देते हैं |

          श्री हरिः तो जन जन के मन की बात जानते हैं फिर भला एक छोटे से कछुए के मन की बात उनसे कैसे छिपी रह सकती है ? भगवान् समझ गए कि कछुआ चरण स्पर्श को व्याकुल है | वे शयन करते हुए जरा सी करवट लेते हैं और अपना एक पाँव शेष शैया से थोडा सा बाहर निकाल देते हैं, जिससे कछुआ उसे आसानी से स्पर्श कर सके | कछुआ भगवान् का संकेत समझ जाता है | वह एक बार फिर से प्रयास करता है | इस बार श्रीजी सजग हैं | ज्योंही वह उनके चरणों को स्पर्श करने वाला होता है कि लक्ष्मीजी की दृष्टि उस पर पड़ जाती है | लक्ष्मीजी अपने हाथ को झटककर कछुए को दूर भगा देती है और श्रीहरिः के पाँव उठाकर वापिस शैया पर कर देती है |

        थोड़े समय उपरांत भगवान् फिर दूसरी करवट लेते हैं और उधर के पाँव को शैया से थोडा बाहर निकाल देते है | कछुआ एक बार पुनः प्रयास करता है परन्तु इस बार भी वह लक्ष्मीजी की दृष्टि से बच न सका | लक्ष्मीजी ने फिर उस कछुए को चरणों का स्पर्श करने से वंचित कर दिया | इस प्रकार कई प्रयास करने के उपरांत भी कछुआ श्री हरिः के चरणों तक अपनी पहुँच न बना सका |

            उसी समय श्रीहरिः नींद से जाग जाते है और चारों ओर अपनी दृष्टि घुमाते हैं | एक दृष्टि कछुए पर डालते हैं और फिर शेषजी तथा लक्ष्मीजी की ओर देखकर हंस पड़ते हैं | भगवान् को जगा हुआ जानकार कछुआ समुद्र के जल में एक गहरी डूबकी लगाता है और सब की दृष्टि से ओझल हो जाता है | श्रीजी और शेषजी भगवान् के हंसने का कारण जानने का प्रयास करते हैं परन्तु जान नहीं पाते और पुनः पूर्व की भांति उनकी सेवा में लग जाते हैं |

            भगवान् की उस समय की हंसी के पीछे कोई न कोई कारण तो अवश्य ही रहा होगा | क्या रहा होगा, उसको या तो केवल वे स्वयं जानते हैं अथवा कोई उनको जानने वाला ही जान सकता है | हंसने का अर्थ होता है, किसी बात को सुनकर अथवा देखकर आनंदित होना | संसार की आसक्तियों में आकंठ डूबा हुआ व्यक्ति भगवान् की लीला का आनंद नहीं उठा सकता जबकि इस संसार को भगवान् ने लीला करते हुए उससे आनंद लेने के लिए ही बनाया है | जब भगवान् को किसी लीला में अतिशय आनंद की अनुभूति होती है तब अनायास ही उनको हंसी आ जाती है |

           प्रभु तो जानते हैं कि कछुआ मेरे चरण का स्पर्श पाकर मुक्त होना चाहता है परन्तु मुक्ति इतनी सरल भी तो नहीं है | मुक्ति के लिए उसे अभी और तपस्या करने की आवश्यकता है | कछुआ भगवान् का भक्त है, वह इस बात को समझ जाता है और तप में लीन हो जाता है |

           प्रत्येक युग में परमात्मा को अवतार लेकर इस धरा पर आना पड़ता है | उनके अनन्य भक्त उनके अवतार लेने की प्रतीक्षा करते हैं | सतयुग का वह कछुआ भी त्रेतायुग में गंगातट पर बैठा उनके आने की प्रतीक्षा कर रहा है |

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम ||” (गीता-4/7)

अर्थात जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने आप को प्रकट करता हूँ |

        इसी बात को मानस में गोस्वामीजी इस प्रकार लिखते हैं-

   जब जब होइ धर्म कै हानी |

   बाढहिं असुर अधम अभिमानी |

   तब तब प्रभु धरि बिबिध शरीरा | 

हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ||(1/121/6-8)

         इसी आधार पर त्रेता युग में भगवान् का अवतरण श्री राम के रूप में हुआ | गोस्वामीजी लिखते हैं-‘राम जन्म के हेतु अनेका’ (मानस-1/122/2) केवल एक कारण से ही श्री राम का जन्म नहीं हुआ बल्कि इस जन्म के पीछे अनेक कारण रहे हैं। परमात्मा के अवतार लेने के पीछे कई कारण होते हैं परन्तु मुख्य कारण अधर्म की वृद्धि को रोककर धर्म का उत्थान करना होता है | एक साधारण व्यक्ति भी जब इस संसार में जन्म लेता है, उसके जन्म लेने के भी अनेक कारण होते हैं | पूर्व मानव जन्म में रही अनेकों कामनाएं, ममता आदि उसको इस संसार में बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में घुमाती रहती है परन्तु नया जन्म पाकर भी वह इस वास्तविकता को समझ नहीं पाता | परमात्मा के साथ ऐसी बात नहीं है | वे जब भी इस संसार में अवतरित होते हैं, उन्हें अपने आने का उद्देश्य स्पष्ट होता है | अपने उद्देश्य के अनुरूप ही वे यहाँ पर लीला करते हैं और उद्देश्य पूर्ण होते ही अपनी लीला को समेटकर पुनः लौट जाते हैं |

           राम के जन्म लेने का मुख्य उद्देश्य भले ही धर्म की हानि को रोककर उसका उत्थान करना रहा होगा परन्तु सांसारिक लीला में वे अपने भक्तों का भी पूरा ध्यान रखते हैं, ऐसे में वे भला उस कछुए को कैसे भूल सकते हैं जिसने सतयुग में उनके चरण स्पर्श करने का विफल प्रयास किया था | उनकी लीला को सुनने और देखने में आनंद की अनुभूति होती है | लीला भी मानवोचित हो, तभी लीला का महत्व है | नाटक अगर नाटक ही प्रतीत हो तो फिर दर्शक पर वह नाटक अपना प्रभाव नहीं छोड़ पायेगा | नाटक में वास्तविकता प्रतीत हो, तभी उसमें आनंद आता है अन्यथा नहीं | देखा जाये तो भगवान् के लिए क्या संभव नहीं है अर्थात उनके लिए सब कुछ संभव है | भगवान् चाहते तो अल्प समय में ही रावण कुम्भकरण का आसानी से वध कर सकते थे परन्तु ऐसा करना एक मानव के रूप में उनके लिए उचित नहीं होता | भगवान् साधारण मनुष्य के रूप में आये हैं, तो उनके लिए साधारण मनुष्य का सा ही व्यवहार करना ही उचित होगा | मनुष्य जैसा व्यवहार करना ही उनकी लीला करना कहलाता है |

          लीला की पटकथा स्वयं भगवान् ही लिखते हैं अर्थात लेखक भी भगवान् और रंगकर्मी के रूप में भी भगवान् | इसी लीला की पटकथा के अनुसार भगवान् का जन्म राम के रूप में हुआ | उसकी लीला को पूर्णता प्रदान करने के लिए कई पात्र इस संसार में जन्म ले चुके हैं उनमें से एक वह कछुआ भी है | त्रेता में वही कच्छप, केवट बनकर गंगा किनारे प्रभु के आने की प्रतीक्षा कर रहा है | केवट जानता है कि मेरे प्रभु अपने चरणों का आश्रय प्रदान करने एक दिन अवश्य गंगा किनारे आयेंगे | भगवान् के आने की प्रतीक्षा केवल केवट ही नहीं कर रहा था, उसके अतिरिक्त भी अनेकों ऋषि-मुनि, अहिल्या, जनक सुता जानकी, भक्त हनुमान, सुग्रीव, शबरी, जटायु आदि ही नहीं, रावण सहित अनेकों राक्षस भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं |

            भगवान् राम रूप में अवतरित हुए | अहिल्या का उद्धार करते हुए जानकीजी का वरण किया | राजतिलक होने ही वाला था कि सब कुछ परिवर्तित हो गया | भगवान् कहते हैं कि ‘मम माया संभव संसारा’ मेरी माया से यह संसार बना है और सब कुछ इस संसार में होना संभव है | लोगों की प्रतीक्षा रंग लाई और भगवान् राजभवन छोड़कर वनयात्रा पर निकल पड़े | अनेकों नदियाँ पार करनी पड़ी | उनसे कैसे पार हुए, पता नहीं परन्तु गंगा को पार करने के लिए उन्हें नाव की आवश्यकता आ पड़ी क्योंकि कोई उनकी यहाँ प्रतीक्षा कर रहा है | लक्ष्मण को आदेश दिया गया - ‘नाव की व्यवस्था करो’| गंगा की अथाह जलधारा और लम्बा-चौड़ा पाट | किनारे पर नाव भी केवल एक और वह भी उसी केवट की | केवट आने में देरी कर रहा है और उधर जानकीजी पार जाने को उतावली हो रही है | भगवान् श्रीराम भी धैर्य के साथ केवट के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं | भगवान् भीतर ही भीतर जानते हैं कि देरी क्यों हो रही है ?

             ‘कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना’- केवट कहता है कि प्रभु ! मैं आपके मर्म को जानता हूँ | केवट भगवान् का कौन सा मर्म (भेद) जान गया है जो नाव लाने में इतनी देर लगा रहा है ? वह मन ही मन कह रहा है- “मैं जानता हूँ प्रभु कि आप नदी एक क्षण के भीतर पार कर सकते हैं, नाव की आपको कोई आवश्यकता नहीं है | आप यह बात जानते हैं कि मैं आपके चरण-स्पर्श करने को युगों युगों से लालायित हूँ | आप इस बार मेरी यह कामना पूरी करने जा रहे हैं, इसीलिए आप नाव से नदी पार करा देने का मुझसे अनुग्रह कर केवल अभिनय कर रहे हैं | इस क्षण की मैंने पूरे एक युग तक प्रतीक्षा की है | अब बारी मेरी है | मैं भी आपको कुछ समय के लिए प्रतीक्षा करवाऊंगा |” भक्त की महिमा विचित्र है | संसार में केवल प्रभु का भक्त ही प्रभु के मन की बात समझ सकता है | भगवान् भी भक्त के प्रेम के इतने अधिक भूखे रहते हैं कि वे भक्त के लिए धैर्य धारण कर लम्बी प्रतीक्षा भी कर सकते हैं |

            अंततः सभी की प्रतीक्षा समाप्त होती है और नाव लेकर केवट आ जाता है | भगवान्, सीता और लक्षमण को साथ लेकर नाव में चढने वाले ही होते हैं कि केवट उन्हें रोक देता है | अभी भी कुछ और समय के लिए उसे भगवान् का सानिध्य चाहिए | कहता है – ‘अभी ठहरिये प्रभु ! आपके चरणों की रज की विशेषता मैंने सुनी है | आपने एक पत्थर को अपने चरणों से जरा सा क्या छुआ कि वह एक मुनि की पत्नी (गौत्तम ऋषि की पत्नी अहिल्या) बन गयी | एक पत्थर को छूते ही जब शिला भी नारी के रूप में परिवर्तित हो जाती है तो ऐसे में भला, उसके सामने मेरी इस लकड़ी से बनी नाव की बिसात ही क्या है ? मेरी नाव का तो न जाने क्या होगा ? गौत्तम ऋषि के पास तो उस समय उनकी पत्नी नहीं थी, इसलिए उनके लिए तो ऐसा होना उचित ही था परन्तु मेरे पास तो पहले से ही एक पत्नी है | कल को मेरी नाव भी आपके चरण रज का स्पर्श पाकर नारी बन गयी तो मेरा क्या होगा ? दो-दो पत्नियां एक साथ रख पाने की स्थिति में मैं नहीं हूँ |’

           भगवान् कहते हैं-“केवट ! ऐसा नहीं होगा | तू व्यर्थ की ही चिंता करता है | देखो, जानकीजी नदी पार करने को उतावली हो रही है और लखन भी क्षुब्ध हो रहा है |’ केवट कहने लगा – ‘प्रभु ! मान लिया. मेरी नाव नारी नहीं बनेगी | परन्तु क्या पता आपके पैरों की धूल का स्पर्श पाते ही यह नष्ट हो जाये | मैं एक गरीब मल्लाह हूँ | मेरी आजीविका, मेरे परिवार का भरण-पोषण केवल इसी एक नाव पर आश्रित है | मैं एक नाव खेने के अतिरिक्त अन्य कोई काम भी करना नहीं जानता | ऐसे में भला मेरे द्वारा अपने परिवार का पालन-पोषण करना कैसे संभव होगा ? आपके चरणों की रज मिल जाये, बस इतना ही मेरे लिए पर्याप्त है | आपके चरणों के आश्रय से मेरा और मेरे परिवार का कल्याण हो जायेगा |’

             इस प्रकार भगवान् और भक्त के मध्य भावपूर्ण वार्तालाप चल रहा है | केवट इतना कहकर यहीं पर नहीं रूका, वह आगे कह रहा है –‘हाँ, एक बात और | आप केवल मुझे अपने पैरों को धोने की आज्ञा दें, इसके अतिरिक्त मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए | मैं आपको गंगाजी के उस पार ले जाने की कोई मजदूरी भी आपसे नहीं लूँगा | मुझे आप और आपके पिताजी की सौगंध, जो मैं थोडा सा भी झूठ कहूँ तो, मैं सब सत्य कह रहा हूँ | मुझे अब लक्षमण के बाण का भी भय नहीं है | प्रभु ! वह अवसर चला गया जब मैं आपके द्वार पर आया था और शेषजी की फुंफकार से डरकर आपके चरण स्पर्श करने से वंचित रह गया था | आज आप मेरे द्वार पर आये हैं, वह भी अपनी इच्छा से | अब मैं उस प्रतीक्षा के एक एक क्षण का हिसाब लूँगा | आज भगवान् आये हैं, इस भक्त का उद्धार करने | अब भला मुझे किस बात का भय सता सकता है | प्रभु ! आप चाहे जो कीजिये, यह अवसर अब मैं व्यर्थ ही जाने नहीं दूंगा | नहीं, नहीं मैं आपको बिना आपके पाँव धोये इस नाव की सवारी नहीं करने दूंगा |’

           केवट के वचन प्रेम से सने हुए और अटपटे होते हुए भी बिलकुल स्पष्ट थे | वह अपनी भाषा में भाव विभोर होकर अपने प्रभु से वार्तालाप कर रहा था | केवट की बातें सुनकर भगवान् श्री राम, सीता और लक्षमण की ओर देखकर उसी प्रकार हंस दिए जैसे सतयुग में कछुए के प्रयास को विफल होते देखकर श्रीजी और शेषजी की तरफ देखकर हँसे थे | मानो प्रभु कह रहे हों कि मैं मेरे भक्त के वश में हूँ | रास्ते की कोई भी बाधा इतनी बड़ी और कठिन कभी भी नहीं हो सकती जोकि किसी भक्त का प्रभु से मिलन रोक सके | लक्ष्मण और सीताजी के चहरे के भाव बता रहे थे कि वे अब गंगा पार जाने के लिए और अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकते | राम ने उनके ह्रदय की बात जान ली और केवट को मुस्कुराते हुए कहा – ‘केवट, तुम वही कार्य करो, जिससे तुम्हारी नाव सुरक्षित रह सके | त्वरित गति से जाओ और गंगाजी का जल लाकर उससे मेरे पाँव धो लो |’

      जासु नाम सुमिरत एक बारा |

       उतरहिं नर भवसिंधु अपारा |

      सोइ कृपालु केवटहि निहोरा | 

      जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा ||

             सतयुग में एक दिन कछुआ चरण स्पर्श करना चाहता था, आज त्रेता में केवट के रूप में वह प्रभु के सामने खड़ा है | वामन अवतार लेकर जिस प्रभु ने राजा बलि से तीन पैर भूमि मांगी थी और बलि ने अपने गुरु की बात न मानते हुए उसे देने का संकल्प कर लिया था, उस समय प्रभु ने पूरे जगत को केवल दो पैरों से नाप लिया था, क्या उस प्रभु के लिए एक नदी को अपने बल से पार कर पाना संभव नहीं था ? भगवान् के लिए कुछ भी असंभव नहीं है | परन्तु यहाँ मामला भक्त और भगवान् के मध्य का है | भगवान् आज भक्त को कृतार्थ करने आये हैं | सतयुग के उस कछुए की तपस्या अब त्रेता में जाकर रंग लाई है | सदा सेवक स्वामी के अधीन होता है परन्तु आज स्वामी सेवक के अधीन हो रहा है | ऐसे में भला स्वामी अपनी शक्ति का प्रदर्शन क्यों कर करेंगे ? सब कुछ भगवान् की इच्छा से ही तो हो रहा है |

          गीता में भगवान् कहते हैं कि अगर अन्तकाल में भी कोई व्यक्ति मेरे नाम का स्मरण एक बार भी कर लेता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है | अजामिल ने अंत समय में एक बार ‘नारायण-नारायण’ कहा और संसार सागर से पार हो गए | क्या ऐसे उद्धारक भगवान् को गंगाजी को पार करने के लिए नाव और उसको खेने वाले की आवश्यकता रही होगी ? यह सत्य बात है कि सब कुछ भगवान् के अधीन है | वे जैसा चाहते हैं, वैसा ही हो जाता है | परन्तु यहाँ साधारण स्थिति की बात नहीं है | यहाँ भक्त और भगवान् के आपसी सम्बन्ध की बात है | तभी तो भगवान् को भक्त से अनुनय विनय करनी पड़ रही है और इस लीला का भगवान् के साथ-साथ भक्त भी पूरा आनंद ले रहा है | भक्त भी जानता कि भगवान् सर्व समर्थ हैं | यहाँ भक्त भी अपने अभिनय को भगवान् की लीला में पूर्ण दक्षता के साथ निभा रहा है |

          भगवान् ने बहुत सी नदियाँ अपने वन गमन की अवधि में पार की होगी | आज गंगा मैया को उनकी लीला देखने का पुनीत अवसर मिला है | चरण धोवन से पूर्व भगवान् के पैरों के नख देखकर गंगा भी आनन्दित है | आनंदित क्यों न हो, आखिर उसका उद्गम भी तो इन्हीं चरणों से हुआ है | आश्चर्य की बात नहीं है क्या कि परमात्मा के चरण देखकर एक नदी भी हर्षित हो सकती है | ऐसा तभी होता है जब भगवान् भक्त के वश में हो जाते है | आज से पूर्व भी करोड़ों अरबों नाविकों ने गंगा के ऊपर नाव चलाई होगी परन्तु भगवान् को पार ले जाने वाला कोई कोई ही केवट होता है अन्यथा तो केवल भगवान् ही संसार सागर से पार करने वाले एक मात्र नाविक हैं | भगवान् का नाम लेकर भव सागर को पार करने वाले भक्त आज भगवान् को सांसारिक नदी को पार कराने में अपना अहोभाग्य समझ रहे हैं | प्रभु की लीला विचित्र है | इसको समझना केवल भक्त के वश में ही है |

          भगवान् श्रीराम की आज्ञा पाते ही केवट प्रसन्न हो गया | तत्काल ही वह हर्षित मन से उठा और पानी की कठौती भर लाया | बड़े आनंद के साथ वह धीरे-धीरे भगवान् के पाँव धोने लगा | कहाँ तो स्वर्ग के देवता तक भगवान् के दर्शन को लालायित रहते है और यहाँ तो साक्षात् परमेश्वर के चरण को एक साधारण नाविक केवट अपने हाथों में लेकर बड़े प्रेम से धो रहा है | देवता भी प्रभु की ऐसी लीला देखकर हर्षित हुए बिना नहीं रह सके | देवता आपस में बात करते हुए कह रहे हैं कि केवट ने पूर्वजन्म में कोई बड़ा भारी पुण्य किया है, जिसका लाभ उसे आज मिल रहा है | अपने जीवन में जो भी कार्य आप परमात्मा का कार्य मान कर करते हैं, उसका पुण्यलाभ आपको कभी न कभी अवश्य ही मिलता है  | केवट ने अपने पूर्व जीवन कछुए के रूप में परमात्मा के चरणों की कामना की थी, आज उसके वे ही कर्म परिपक्व हुए है | आज उसी कामना के कारण प्रभु का सानिध्य उसे मिल पाया है |

      पाँव धोते धोते केवट के समक्ष एक बड़ी समस्या आ खड़ी हुयी | वह एक पैर धोकर जमीन पर रखता और दूसरा पैर धोने लगता कि पहले पैर पर गंगारज चिपक जाती | फिर वह पहले वाले पैर को धोता तो दूसरे पैर के रज लग जाती | भगवान् समझ गए कि इस बहाने तो यह केवट जीवन भर मेरे पैर छोड़ने का नाम ही नहीं लेगा | अंततः उन्हें कहना ही  पड़ा कि केवट तुम यह क्या कर रहे हो ? केवट बोला कि ‘प्रभु जब मैं एक पैर धोकर दूसरा पैर धोने लगता हूँ तब धोये हुए पैर से धूल फिर चिपक जाती है | मैं क्या करूँ प्रभु ? प्रभु, आप ऐसा कीजिये कि आपका एक पैर धुलते ही उसे मेरे एक हाथ पर रख दीजिये | फिर दूसरा पैर इस जल भरी कठौती में रख दीजिये | दूसरे पैर के धुलते ही वह पैर मेरे दूसरे हाथ पर रख दीजिये | इस प्रकार आप के दोनों पैर मेरे हाथों में होंगे तो धुल से सनने का प्रश्न ही नहीं उठेगा |’ प्रभु हंसकर बोले – ‘भला, दोनों पांव बिना किसी सहारे के कोई एक साथ कैसे ऊपर उठा कर रख सकता है ?’ केवट भी बड़ा चतुर निकला, बोला-‘ ऐसा कीजिये प्रभु, आप अपने दूसरे पैर को कठौती में रखते समय मेरे सिर पर अपने दोनों हाथ रख दीजिये | ऐसा करने से मैं भी निर्भय हो जाऊंगा और आपके गिरने का भय भी नहीं रहेगा |’ भगवान् की लीला भी कैसी कैसी होती है ? भक्त को भगवान् का ही एक मात्र सहारा होता है और आज भगवान् एक भक्त का सहारा ले रहे हैं |

           भगवान् मन ही मन अपने भक्त की चतुरता पर मुस्कुरा रहे हैं | भक्त केवल चरण-स्पर्श से ही संतुष्ट नहीं होता है, साथ ही वह अपने सिर पर भी भगवान् का हाथ चाहता है | सत्य भी है कि एक भगवान् के अतिरिक्त भक्त का कोई दूसरा आश्रय होता भी तो नहीं है और न ही भक्त अन्य किसी का आश्रय लेना चाहता है | भगवान् भला क्या करते ? लक्ष्मण और सीताजी की ओर देख मुस्कुराते हुए केवट के चाहे अनुसार करते रहे | केवट की समस्या फिर भी समाप्त नहीं हुई | प्रभु के दोनों पाँव तो पखार दिए परन्तु अब अगर फिर से उन्हें जमीन पर रखेगा तो वे धुल से पुनः सन जायेंगे | बड़ा ही सुन्दर दृश्य है | आप भी इस भावपूर्ण दृश्य का आनंद लीजिये | आज भक्त के पूरे वश में भगवान् हो गए हैं | केवट के दोनों हाथों में भगवान् के दोनों पैर है और केवट के सिर पर भगवान् के दोनों हाथ | स्थिति ऐसी है कि उस समय केवट जो चाहे वह भगवान् के साथ कर सकता है | तत्काल ही वह खड़ा हुआ और उसने भगवान् को अपनी गोद में उठा लिया और धीरे-धीरे चलता हुआ उन्हें नाव में ले जाकर बिठा दिया | केवट की सारी समस्या एक क्षण में ही दूर हो गयी |

        नाव में भगवान् को बिठाकर केवट लौटा और कठौती के जल (चरणामृत) का सर्वप्रथम स्वयं ने पान किया, फिर परिवार के समस्त सदस्यों को भी पान कराया और साथ ही साथ अपने समस्त पूर्वजों तथा पितरों को भी पान कराया | ऐसा करके वह तुरंत ही नाव पर लौट आया | जब तक लौटता तब तक लखन और जनकसुता भी नाव पर चढ़ चुके थे और गुह उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे | केवट के आते ही निषादराज गुह भी उसके साथ ही नाव पर चढ़े | प्रमुदित मन से केवट नाव खेते हुए प्रभु को गंगाजी के उस पार ले गया | प्रभु की लीला देखिये ! आज एक भक्त ने भगवान् को नदी के पार कर दिया | भगवान् आज भक्त के ऋणी हो गए | अब भगवान् की जिम्मेवारी, समय आने पर वे ही भक्त को संसार सागर के पार ले जायेंगे |

           गंगा के दूसरे किनारे पहुंचते ही भगवान् श्रीराम के साथ सीताजी, लखन और निषादराज भी नाव से उतरे | केवट ने नाव को गंगा किनारे बांधा, नाव से नीचे उतरा और जमीन पर दण्डवत लेटकर प्रभु को प्रणाम किया | चाह कर भी वह उठ नहीं पा रहा था | आज केवट का ह्रदय गद्गद् हो रहा था | उसके दोनों नयनों से सतत नीर बहे जा रहा था | वह एकटक प्रभु को ही देखे जा रहा था | एक प्रभु के अतिरिक्त उसे कुछ भी दिखलाई नहीं पड़ रहा था | अनन्य भक्ति वही होती है जिसमें एक भगवान् के अतिरिक्त सब कुछ खो जाये |

            केवट जानता था कि साक्षात् परमात्मा कुछ क्षणों पश्चात् उसकी दृष्टि से ओझल होने जा रहे हैं | तभी भगवान् श्री राम के मन में विचार आया कि मेरे पास इसे देने के लिए कुछ भी नहीं है, मैं इसको उतराई में आखिर दूं क्या ? जगत जननी जानकीजी प्रभु के मन की बात तत्काल ही समझ गयी | उन्होंने अंगुली से अपनी मुद्रिका उतारी और केवट को उतराई देने के लिए प्रभु को सौंप दी | प्रभु उतराई के रूप में वह अंगूठी केवट को देने लगे |

             भगवान् ने जब मुद्रिका को केवट की ओर किया तो केवट भाव-विह्वल हो गया और कहने लगा –“नाथ आजु मैं काह न पावा |’ हे मेरे प्रभु ! मुझे आज क्या नहीं मिला ? अर्थात आज मुझे सब कुछ मिल गया | मैंने जीवनभर नाव से लोगों को पार उतारकर बहुत मजदूरी/आमदनी की है | आज की मजदूरी मुझे आत्मरूप से संतुष्ट करने वाली है | एक भक्त के जीवन में संतोष से बढकर कोई कमाई नहीं हो सकती | जीवन में जिस कार्य से संतुष्टि मिलती है, उसकी तुलना मिलने वाली धन राशि से कभी भी नहीं हो सकती | फिर भी आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं तो मेरा एक आग्रह स्वीकार करें | आप वनवास से जब भी अयोध्या को लौटें, मेरी नाव से ही इस गंगा नदी को पार करें | उस समय आप जो कुछ भी मुझे देंगे, मैं आपका प्रसाद मानकर प्रफुल्लित मन से उसे स्वीकार कर लूँगा परन्तु आज मैं आपसे उतराई के रूप में कुछ भी नहीं लूँगा | आज मेरे जीवन के सभी विकार दूर हो गए हैं, मेरी सभी व्याधियां मिट गयी है और सभी दुःख दूर हो गए हैं | अभी तो मैं आपसे केवल आपकी भक्ति का वरदान चाहता हूँ, अन्य कुछ भी नहीं | हाँ, लौटते समय अपने भक्त को दर्शन देते हुए कृतार्थ अवश्य कीजिएगा |’

            श्रीराम ने बहुत आग्रह किया परन्तु केवट ने मुद्रिका लेने से स्पष्ट मना कर दिया | केवट परमात्मा के समक्ष उनके पैरों में लोटने लगा | प्रभु ने बड़े प्रेम से उसे उठाकर केवट को अपने ह्रदय से लगाया और उसे निर्मल भक्ति का वरदान दिया | भगवान् ने लखन जानकी सहित गंगा स्नान किया | फिर केवट से विदा लेकर भगवान् तो अपनी वनयात्रा पर आगे निकल गए और केवट दु:खी मन से उन्हें निहारता हुआ अश्रुपात करने लगा | आज उसने बहुत आग्रह करने के उपरांत भी किसी और व्यक्ति को नाव में बैठाकर नदी पार नहीं कराई | भारी मन से अकेला ही नाव खेता हुआ पुनः इस पार लौट आया |

       गोस्वामी श्री तुलसीदासजी महाराज ने केवट प्रसंग का बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतीकरण मानस में किया है | भगवान् को गंगा नदी को पार करा देने के बाद उनका यह प्रसंग यहीं  समाप्त हो जाता है | एक भक्त का भगवान् के प्रति प्रेम का बहुत ही सुन्दर चरित्र गोस्वामीजी ने गढा है | केवट निम्न और दलित वर्ग के अंतर्गत आते हैं | तुलसीदासजी के समय जाति व्यवस्था अपने चरम पर थी | उस समय उच्च और निम्न वर्ग के बीच वैमनस्य भाव बढ़ता ही जा रहा था | शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने केवट का चरित्र गढ़ा था जिससे दो वर्गों के बीच की खाई को कुछ सीमा तक पाटा जा सके | श्री राम के समकालीन आदिकवि वाल्मीकिजी थे | उनकी रामायण में केवट नाम का कोई चरित्र ही नहीं है | उनकी रामायण में निषादराज गुह ही अन्य नाविकों के साथ नाव का सञ्चालन करते हुए प्रभु को गंगा पार ले जाना बताया गया है |

      गोस्वामीजी ने तो केवट प्रसंग को एक सीमा तक स्पष्ट करके छोड़ दिया | राम के वन में आगे गमन करने के बाद पीछे से केवट के साथ क्या हुआ ? आइये ! यह भी जान लेते हैं | श्री राम के बाद केवट ने नाव में सवारी बिठाना तक बंद कर दिया | दिन-रात वह केवल राम-राम की रट लगाये रखता था | दिन भर यही कहता रहता था कि मेरे प्रभु राम, वापिस लौटेंगे तो मेरे पास अवश्य आयेंगे | परिवार वाले एक एक कर उसका साथ छोड़ते गए क्योंकि केवट उनका भरण-पोषण करने में विफल हो रहा था | आखिर कब तक उसकी पत्नी और बच्चे उससे इस बात की अपेक्षा रखते | परिवारजन अपनी उदरपूर्ति के लिए यहाँ-वहां जहाँ पर भी उन्हें कुछ काम मिलता, कार्य करने लगे | केवट तो दिन-रात बस केवल एक ही रट लगाये रहता – ‘मेरे राम आयेंगे.... मेरे राम आयेंगे’ | भक्त की एक विशेषता होती है, वह परमात्मा की प्रतीक्षा अनन्त काल तक कर सकता है | उसकी परमात्मा पर बहुत अधिक श्रद्धा होती है | वह जानता है कि एक न एक दिन उसे परमात्मा अवश्य ही मिलेंगे | केवट उन्हीं भक्तों में से एक है |

         चौदह वर्ष बीत चले थे | श्रीराम ने रावण का वध भी कर दिया | जानकीजी लंका से वापिस उनके पास आ गयी | सभी जगह यह बात फ़ैल गयी कि भगवान् श्रीराम अयोध्या लौट रहे हैं | किसी को पता नहीं था कि वे अयोध्या किस मार्ग से और किस साधन से लौटेंगे | केवट के कानों में भी अपने प्रभु के अयोध्या लौटने की भनक पड़ी | वह प्रफुल्लित हो उठा | ‘मेरे राम आ रहे हैं, मेरे राम आ रहे हैं’, कहते हुए नाचने लगा | उसने बड़े प्रेम से अपनी नाव को ताज़ा फूलों से सजाया और अपने प्रभु के आने की बाट जोहने लगा |

          इधर राम को अयोध्या लौटने की जल्दी थी | वे जानते थे कि यदि अयोध्या लौटने में चौदह वर्ष से एक दिन भी ऊपर निकल गया तो भरत अपनी देह त्याग देगा | वे पुष्पक विमान लेकर त्वरित गति से अयोध्या के लिए निकल पड़े | केवट की आस अधूरी रह गयी | उसको पता नहीं था कि भगवान् श्री राम उसके पास अब नहीं आ पायेंगे | वह तो अभी भी रट लगाये जा रहा था कि मेरे राम आ रहे हैं, मेरे प्रभु आ रहे हैं | तभी उसके कानों ने किसी के बोल सुने कि राम अयोध्या लौट आये हैं | भक्त का मन भगवान् के विरह में व्याकुल हो गया | पूरी रात वह रोता रहा |

       भोर हो चली थी | सभी नाविक अपनी अपनी नावें सम्हाल रहे थे | एक नाविक ने केवट की नाव की ओर ध्यान दिया | प्रभु की प्रतीक्षा में सजी हुई नाव में किसी भी प्रकार की हलचल नहीं हो रही थी | नाविक उस नाव के थोडा निकट गया | देखा कि केवट की मृत देह उस सजी हुई नाव में पड़ी है | भक्त केवट के प्राण पखेरू न जाने रात को किस समय उड़कर अयोध्या में भगवान् श्री राम के पास पहुंच गए | शैया पर सोये श्री राम अचानक नींद से जाग कर उठ बैठे | स्वप्न नहीं, सत्य था यह | केवट उनका विरह सहन नहीं कर सका था | आज उनको केवट की बहुत याद आ रही थी | सहसा उनके मुख से निकल पड़ा –‘भक्त केवट; मैं अयोध्या लौटते हुए रास्ते में रूककर तुम्हारा ऋण नहीं चूका सका |’

       तभी वहां उपस्थित केवट की आत्मा बोल पड़ी- ‘नहीं प्रभु ! ऐसा न कहिये | मैं आपका दास हूँ, सेवक हूँ | मुझे केवल आपकी भक्ति ही चाहिए और कुछ भी नहीं | आज मुझे संसार की सारी सम्पति मिल गयी है |’ भक्त कहता रहा और भगवान् ने उसे स्वयं में लीन कर लिया |

   धन्य है केवट का जीवन, जिसने भगवान् को भी भक्त के समक्ष नतमस्तक कर दिया | सत्य है केवट का यह कहना कि “नाथ आजु मैं काह न पावा |”

                  लेख के प्रारम्भ में जो कछुआ प्रभु के चरण छूने का प्रयास कर रहा है, वह पूर्व मानव जन्म की कोई योगभ्रष्ट आत्मा है | योगभ्रष्ट वही व्यक्ति होता है जो जीवन में परमात्मा की तरफ चलने का प्रयास तो करता है परन्तु सांसारिक भोगों के आकर्षण से एक बार मुक्त होकर भी पुनः उनमें जाकर उलझ जाता है | उलझने का कारण होता है, जीवन की सुरक्षा का भय होना | प्रायः हम देखते हैं कि जीवन में परमात्मा की ओर उन्मुख होने के बाद भी जीवन यापन के लिए हम संग्रह के लिए उद्यत रहते हैं | संग्रह का कारण है भय | परमात्मा पर पूर्णतः विश्वास न होना ही इस भय का जनक है | ऐसा ही व्यक्ति अपने मार्ग से भटक जाता है और पीठ पर जीवन सुरक्षा का भय लादे कछुए के रूप में अवतरित होता है |

       कछुआ सागर में इसी प्रकार घूमता रहता है जैसे संसार सागर में हम विचरण करते हैं | परन्तु पूर्वजन्म में योगभ्रष्ट हुआ वह व्यक्ति कछुए का रूप प्राप्त कर भी भगवान् को भूला नहीं है | वह परमात्मा के चरणों का स्पर्श पाने को आतुर है परन्तु भयमुक्त अभी भी नहीं है | तभी तो वह शेषजी की फुंफकार और पूंछ की फटकार से तथा लक्ष्मीजी के हाथ के झटकने से भी डर जाता है | अपने पैरों को शेषशैया से नीचे करते हुए भगवान् तो चाहते हैं कि कछुआ मेरी शरण ले ले परन्तु जब तक वह स्वयं भयमुक्त नहीं होगा तब तक परमात्मा से उसकी दूरी बनी रहेगी | भयमुक्त होने के लिए वह तपस्या करता है और केवट के रूप में त्रेता में जन्म लेता है | इस बार उसकी तपस्या सफल हुई है |

           इसी प्रकार हमारे जीवन में  कभी कभी परमात्मा की स्मृति मन में उठती है तो परमात्मा को पाने के लिए उनकी तरफ चल पड़ते हैं | प्रभु के सम्मुख होना और उनसे विमुख हो जाना, दोनों ही अवस्था हमारे जीवन में भी बार-बार आती रहती है | हमें सांसारिक भोग भी चाहिए और जीवन सुरक्षा के लिए संग्रह भी | इसी प्रकार हम संसार भंवर में उलझते हुए डूबते उतराते रहते हैं |

              जीवन की विपरीत परिस्थितियां हमें परमात्मा की ओर जाने को उद्यत करती है | परन्तु फिर सांसारिक सुख अर्थात भोग और संग्रह अपना प्रभाव दिखलाते हैं और हम एक झटके से परमात्मा से विमुख हो जाते हैं | गोस्वामीजी के जीवन में भी तो यही हुआ था | ज्ञानी होते हुए भी तुलसीदासजी सांसारिक भोगों में आकंठ डूबे हुए थे | पत्नी के उलाहना भरे वचनों से बनी विपरीत परिस्थति ने उन्हें परमात्मा की ओर उन्मुख कर दिया | फिर वे किसी भी प्रकार के सांसारिक भोग और भय से विचलित नहीं हुये | अंततः वे केवट बन गए और परमात्मा के चरणों का आश्रय उन्हें मिल ही गया |

            केवट प्रसंग का भाव यही है कि संसार सागर में विचरण करते हुए परमात्मा की ओर चलें | साथ ही ध्यान में रखें कि भोग और संग्रह के आकर्षण से स्वयं को दूर रखें |  भोग और संग्रह के आकर्षण से मुक्त रहने की अवस्था ही जीवन्मुक्ति की अवस्था है | फिर परमात्मा स्वयं चलकर आपके द्वार तक आयेंगे | हमारे जीवन की विडम्बना है कि हम स्वयं को इन विकारों से मुक्त नहीं कर पाते और अपने जीवन में इन्हीं के अभाव से होने वाली काल्पनिक दुर्दशा से डरकर कछुए की तरह परमात्मा से दूर चले जाते हैं | कछुए ने तपस्या की थी, इन विकारों से भयमुक्त रहने के लिए | तभी केवट बनकर लखन और जानकीजी से भी वह भयभीत नहीं हुआ और परमात्मा के चरण पकड़ते हुए उनका वरदहस्त प्राप्त किया | अंततः परमात्मा ने उसे सायुज्य मुक्ति प्रदान की | तभी केवट ने कहा है –

 “नाथ आजु मैं काह न पावा | मिटे दोष दुख दारिद दावा ||”

प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||    


         




        


Monday, November 15, 2021

स्वभाव से स्वरूप की ओर

 स्वभाव से स्वरुप की ओर 

      अध्यात्म में तीन शब्द महत्वपूर्ण हैं – पर, स्व और परम | ‘पर’ शब्द जगत (अपरा प्रकृति/क्षर पुरुष) के लिए उपयोग में लिए जाता है जबकि ‘स्व’ स्वयं (परा प्रकृति/अक्षर पुरुष) के लिए और ‘परम’ परमात्मा (पुरुषोत्तम) के लिए | ‘स्व’ का अस्तित्व तभी तक है जब तक हमारा ‘भाव’ स्वयं की इच्छानुसार कुछ बनने का रहता है | यह भाव ही हमारा स्वभाव कहलाता है | जब हम अपने स्वभाव को परमभाव की ओर ले जाते हैं तब ‘स्व’ मिट जाता है और हम ‘परम’ को उपलब्ध हो जाते हैं | स्वभाव हमारा व्यक्तिगत (व्यष्टि) होता है जबकि ‘परमभाव’ समष्टि का है | ‘परमभाव’ से हम सभी प्राणी समान है परन्तु स्वभाव से सब भिन्न भिन्न हैं |

         ‘पर’ (संसार) में आसक्ति से स्वभाव बनता है और समस्त आसक्तियों के मिटते ही स्वभाव परमभाव में परिवर्तित हो जाता है और मनुष्य अपने स्वरुप में स्थित हो जाता है | ‘पर’ से ‘स्व’ में स्थित हो जाना, स्वरूप को जानने के लिए आवश्यक है | ‘स्व’ में स्थित व्यक्ति ही सही मायने में ‘स्वस्थ’ होता है | शारीरिक स्वस्थता और मानसिक स्वस्थता में अंतर है | शारीरिक रूप से स्वस्थ मनुष्य सांसारिक कार्य में तो निपुण हो सकता है परन्तु केवल मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही अध्यात्म की ओर जाने का प्रयास कर सकता है | यहाँ ‘स्वस्थ’ शब्द का अर्थ मानसिक रूप से स्वस्थ रहने से है |

       “अध्यात्म” किसे कहते हैं ? स्वयं को जानने का नाम ही अध्यात्म है | अध्यात्म ही हमें स्वरुप तक पहुंचा सकता है | अध्यात्म के रास्ते सर्वप्रथम व्यक्ति अपने स्वभाव को जानता है और फिर स्वाभावानुसार स्व-धर्म का पालन करते हुए कर्म करता है | इन्हीं कर्मों के माध्यम से वह अपने पूर्व संचित कर्मों (प्रारब्ध) को नष्ट करता है और स्वरुप की ओर चलता है |

            बहुत ही रोचक विषय है यह | कल से इस विषय पर थोडा विस्तार से चिंतन प्रारम्भ करते हैं | चलिए ! साथ-साथ चलते हैं – “स्वभाव से स्वरुप की ओर” | 

        प्रारम्भ एक कहानी से करते हैं | एक सिंह का शावक जन्म लेते ही अपनी मां से बिछुड़ गया | भूख से बिलबिला रहे शावक पर जंगल में भेड़ों को चरा रहे एक गडरिये की दृष्टि पड़ी | उसने अपने हाथों से उस भूखे शावक को पकड़ कर एक भेड़ के थनों से लगाया | दूध की जरा सी मात्रा शरीर में जाते ही शावक सक्रिय हो गया | लगातार दूध मिलते रहने से धीरे-धीरे शावक बड़ा होने लगा | अब तो सिंह शावक उन भेड़ों के झुण्ड में ही रहने लगा | जिधर गडरिया भेड़ों को हांक ले जाता, सिंह शावक भी उनके साथ हो लेता | जिस भेड़ का वह दूध पीता था, उस एक भेड़ को ही वह अपनी मां मानने लगा | दूध पीता, भेड़ों के छोटे छोटे बच्चों के साथ उछलकूद करता और मस्त रहता |

          धीरे धीरे समय बीतता गया | अब सिंह शावक भी बड़ा हो गया | भेड़ों के साथ रहते रहते वह भी उन्हीं की तरह दिन भर मिमियाता रहता | एक दिन एक युवा सिंह शिकार की तलाश में जंगल में भटक रहा था | सहसा उसे भेड़ों का वह झुण्ड दिखलाई पड़ा | उसने शिकार के लिए उस झुण्ड पर हमला कर दिया और उसी एक भेड़ को झुंड से अलग कर दिया जिसका दूध वह सिंह शावक पिया करता था | अपनी धाय मां को अलग थलग पड़े देखकर सिंह शावक भी उसके पीछे पीछे मिमियाता हुआ झुण्ड से अलग हो लिया | युवा शेर भय से मिमियाती उस भेड़ का शिकार करने ही वाला था कि उसकी दृष्टि साथ दौड़ते हुए मिमियाते हुए सिंह शावक पर पड़ी | युवा सिंह को भेड़ बने शावक को देख आश्चर्य हुआ | उसने भेड़ का पीछा करना छोड़ दिया और शावक की ओर बढ़ चला |

       युवा सिंह को अपनी ओर बढ़ते देखकर सिंह शावक जोर-जोर से मिमियाने लगा | युवा सिंह ने उस शावक को भेड़ से अलग कर लिया और उसे घेर कर अपने साथ ले जाने लगा | भय से मिमियाते हुए वह शावक अपनी धाय मां की ओर देखता और करूण पुकार करता हुआ सिंह के साथ चल रहा था | रास्ते में वह युवा शेर उसको बार बार मिमियाना बंद करने के लिए कहता, डांटता परन्तु उस शावक पर इस बात को कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था | सिंह ने उसे बहुत समझाया कि तू एक शेर का बच्चा है, जोर से दहाड़ परन्तु शावक है कि स्वयं को अभी भी भेड़ का बच्चा ही समझ रहा है | दहाड़, सिंह की आवाज़ होती है और मिमियाना भेड़ की |

        अपनी कही बात का असर न होते देखकर सिंह उसे एक कुएं के पास ले जाता है और भीतर झांकने को कहता है | शावक ने जब उस सिंह के साथ कुएं में झाँका तब उसे जल में दोनों की परछाई दिखलाई पड़ी | उसे आश्चर्य हुआ कि दोनों का चेहरा मोहरा एक ही प्रकार का है | अब वह शावक कभी जल में अपनी परछाई देखता और कभी उस सिंह के चेहरे की ओर | अब धीरे धीरे उसके समझ में आने लगा था कि वह इतने दिनों तक भेड़ों के झुण्ड में रहते रहते लगभग भेड़ ही हो चला था | आज उसे अपने वास्तविक स्वरूप के दर्शन हुए हैं | शावक को उहांपोह में देखकर युवा सिंह ने एक जोरदार दहाड़ लगाई | सिंह को दहाड़ते देखकर शावक को भी जोश आया | उसने भी दहाड़ लगाई | वह समझ गया था कि अब तक जो वह स्वयं को एक भेड़ समझता रहा था वह उसके जीवन की बहुत बड़ी भूल थी, वह तो जन्म से ही सिंह है | उसने युवा सिंह के साथ लम्बी दौड़ लगाई और क्षुधा शांत करने के लिए शिकार की खोज में निकल पड़ा |

           हमारे जीवन में और उस सिंह शावक के जीवन में तनिक समानता ढूँढने का प्रयास कीजिये | जरा सा भी भिन्न नहीं है, दोनों का जीवन | हम भी भेड़ों के झुण्ड रुपी इस संसार में स्वयं को एक भेड़ समझते हुए भटक रहे हैं | जिस दिन हमारे को समझाने के लिए एक सच्चा गुरु मिलेगा तभी हम समझ पाएंगे कि हम वास्तव में क्या हैं ? गुरु भी हमारे में से ही कोई एक होगा जिसने अपना वास्तविक स्वरुप जान लिया है | गुरु हमें हमारा परिचय हमारे वास्तविक स्वरुप से कराएगा क्योंकि गुरु उस युवा सिंह की तरह स्वयं का वास्तविक स्वरुप जानता है | जानते तो हम भी थे अपना वास्तविक स्वरुप, परन्तु संसार के झुण्ड में शामिल होकर उसे भूला बैठे हैं | जो स्वरुप अभी हमारा है वह सांसारिक स्वरुप है | सांसारिक स्वरूप को स्वभाव कहा जाता है | हमें इस मनुष्य जीवन में सांसारिक स्वरुप से वास्तविक स्वरुप तक की यात्रा करनी है | इस यात्रा को हम अपने स्वभाव से स्वरुप की यात्रा कह सकते हैं और 'स्व' से 'परम' की यात्रा भी कह सकते हैं |

             हम 'परम' से आये हैं, ऐसा कहना भी अनुचित है | नहीं, हम परम से आये नहीं हैं बल्कि हम परम ही हैं | हम क्यों भूल गए अपने परम होने को ? इसी विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे और ‘स्व’ को छोड़कर ‘परम’ तक पहुँचने का मार्ग तलाश करने का प्रयास करेंगे |

         शावक और सिंह की कहानी बताने से तात्पर्य है कि सिंह ‘स्वरुप’ है और शावक ‘स्वभाव’ है | शावक भेड़ों के संग रहते रहते एक प्रकार से भेड़ बनकर ही रह गया था जबकि वह भेड़ न होकर सिंह था | उसका सिंह होना भेड़ की छाया तले दबकर रह गया था | इसी प्रकार संसार का संग हमारे स्वरुप को ढक लेता है | हम संसार के प्रभाव में आकर अपना एक अलग ही व्यक्तित्व गढ़ लेते हैं | हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप ही हमारा स्वभाव बन जाता है | स्वरुप मूल तत्व है जबकि स्वभाव व्यक्तित्व | इस प्रकार व्यक्तित्व के तले हमारा स्वरुप दब कर रह गया है | हमें व्यक्तित्व के खोल से बाहर निकलना है जिससे वास्तविक स्वरुप प्रकट हो सके | हमें स्वभाव को इस प्रकार परिवर्तित करना है कि जीवन से समस्त अवांछित हट जाये और केवल स्वरुप ही शेष रह जाये |

              स्व को परम होना नहीं है बल्कि यह स्व ही परम है, इस बात को पुनः स्मृति में लाना है | इसके लिए कुछ करना नहीं है बल्कि जो कुछ कर रहे हैं अथवा कुछ बनने का प्रयास कर रहे हैं, उनका त्याग करना है | यह ठीक उसी प्रकार से है जैसे मूर्तिकार मूर्ति को पत्थर से उसके अवांछित भाग को हटाकर निकाल लेता है | देखने में तो आता है कि मूर्तिकार मूर्ति को गढ़ता है परन्तु यह सत्य नहीं है | वह केवल पत्थर के अवांछित भाग को हटाता है और मूर्ति स्वतः ही प्रकट हो जाती है | मूर्ति प्रत्येक पत्थर में पहले से ही विद्यमान है उसी प्रकार स्व में परम भी पहले से ही है केवल जिस अवांछित को हमने ओढ़ रखा है, केवल उस भाग को हमें हटाना है | इसलिए हमें कुछ भी बनना नहीं है बल्कि जो बने हुए हैं उसमें से अवांछित का त्याग करना है | फिर हम जो होंगे वही हमारा वास्तविक स्वरुप होगा |

             हमारे स्वभाव में ही 'स्व' छिपा है फिर भी हम उसे पहिचान नहीं पा रहे हैं | स्वभाव में जो ‘भाव’ अंश है, वह एक मात्र कारण है उसका, जोकि हम बने बैठे हैं | हमारा स्वभाव ही हमें स्वरूप का ज्ञान नहीं होने देता क्योंकि अपने स्वभाव को परिवर्तित करते हुए स्वयं जैसा बनना चाहते हैं, उसी ओर की यात्रा हम प्रारम्भ कर देते हैं और अपने स्वरुप से दूर होते चले जाते हैं | जीवन में कुछ न कुछ बनना ही हमारे बिगड़ने का कारण बनता है और हम अपने वास्तविक स्वरुप से धीरे-धीरे दूर होते चले जाते हैं | स्वरूप को जानने के लिए कुछ बनने की आवश्यकता नहीं है बल्कि जो हम बने हुए हैं उससे अलग हो जाने की आवश्यकता है | बनने का प्रयास हमारे स्वभाव को बिगाड़ देता है जबकि अपने मूल स्वभाव के अनुसार जीना ही हमें स्वरुप को जानने की ओर ले जा सकता है |

         गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि “स्वभावोSध्यात्ममुच्यते” अर्थात स्वभाव को ही अध्यात्म कहा जाता हैं | अध्यात्म नाम है, स्वयं को जानने का अर्थात अपने स्वरुप तक पहुँचना | इससे स्पष्ट है कि स्वरुप तक पहुँचने के लिए हमें सर्वप्रथम अपने मूल स्वभाव को जानना होगा और फिर स्वभाव से स्वरुप तक कैसे पहुँच सकते है, इस बात का ज्ञान करना होगा | प्रत्येक मनुष्य एक निश्चित स्वभाव लेकर पैदा होता है और उस स्वभाव के अनुसार अपना जीवन प्रारम्भ करता है | फिर कहाँ गड़बड़ हो जाती है कि वह स्वरुप तक नहीं पहुँच पाता और मनुष्य जीवन व्यर्थ गंवाते हुए 84 में भटकता रहता है ?

         गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं-

       यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |

         तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ||8/6||

   हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदैव उसी भाव से भावित रहा है |

           भाव दो प्रकार के होते हैं – स्वभाव तथा परमभाव | स्वभाव का अर्थ है, मनुष्य जो वर्तमान में है वह अपने वैचारिक भाव के अनुसार है अर्थात उसने अपने स्वयं के होने की जो कल्पना की थी वह उसी भाव के अनुसार वर्तमान में है | परमभाव का अर्थ है, वास्तविक स्वरुप, जोकि सच्चिदानंद है अर्थात परमब्रह्म परमात्मा | यहाँ मनुष्य के स्वभाव में भाव का अर्थ है, मनुष्य का अस्तित्व (Existence) यानि उसकी प्रकृति | भाव अर्थात जैसा व्यक्ति बनना/होना चाहता है | इस भाव के अनुसार ही नए मानव जीवन में उसका स्वभाव बनता है | इस प्रकार कहा जा सकता है कि मनुष्य जन्म के साथ ही अपना स्वभाव इस संसार में लेकर आता है | अतः सर्वप्रथम हमें यह जानना आवश्यक है कि हमारा स्वभाव बनता कैसे है ? हमारे कर्म, आचरण, कामना, विचार आदि ही हमारा स्वभाव बनाते हैं और फिर यही स्वभाव हमारे द्वारा भविष्य में किये जाने वाले कर्म निश्चित करता है | कहने का अर्थ है कि नए जीवन में मनुष्य पूर्व जन्म से मिले स्वभाव के अनुसार कर्म करना प्रारम्भ करता है | कर्मों के प्रति आसक्ति उसे फिर नए कर्म करने को प्रेरित करती है | नए कर्म उस जीवन में परिपक्व होकर फल दे दे तब तो ठीक है अन्यथा यही कर्म संचित होकर नए जीवन में मनुष्य के स्वाभावानुसार परिपक्व होते हैं और फल देते हैं | कर्मों के प्रति उसकी आसक्ति अथवा विरक्ति वर्तमान जीवन में उसके संस्कार बनाती है | जब समय आने पर मनुष्य देह छूटती है तब उन्हीं संस्कारों के अनुसार उसका कारण शरीर बनता है |

          कारण शरीर के अनुसार उसका पुनर्जन्म होता है और इस प्रकार पूर्व जीवन का  संस्कार ही नए जीवन में उसका स्वभाव बन जाता है | बनते बिगड़ते संस्कार जन्म दर जन्म उसका स्वभाव बनाते और बिगाड़ते रहते हैं | प्रत्येक मनुष्य जीवन में उसको अवसर मिलता है कि वह अपने मूल स्वभाव को पहिचान कर उसके अनुसार जीवन जीते हुए स्वरूप तक पहुँच जाए परन्तु वह स्वाभाविक जीवन जीना छोड़ कृत्रिम जीवन जीना प्रारम्भ कर देता है और इस प्रकार यह कृत्रिम जीवन उसे स्वरूप तक नहीं पहुँचने देता | कृत्रिम जीवन ऊसका स्वभाव परिवर्तित तो कर सकता है परन्तु उसे स्वरुप तक पहुँचने में कोई सहायता नहीं कर सकता | स्वभाव आपको आवागमन से मुक्त तभी होने देता है जब आप अपने भाव अर्थात अपनी प्रकृति को परमात्मा की ओर लगा दें |

            मनुष्य जीवन भर या तो किसी के प्रभाव में जीता है अथवा किसी के अभाव में | प्रभाव और अभाव उसे अपने मूल स्वभाव के अनुसार जीने नहीं देते | जब तक वह अपने स्वभाव में नहीं जीएगा तब तक उसे ‘स्व’ का ज्ञान नहीं हो सकेगा | मनुष्य के जीवन में प्रभाव और अभाव होता है सांसारिक वस्तुओं और व्यक्तिओं का | संसार, अभाव का ही दूसरा नाम है, यहाँ अभाव के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | इस प्रकार अभाव और प्रभाव से मनुष्य जीवन भर मुक्त नहीं हो सकता, ऐसे में भला उसको अपने स्वाभावानुसार जीवन जीने का अवसर ही कब और कैसे मिल सकता है ? वह जीवन भर ‘स्वरूप’ को स्वयं से बाहर ही खोजने में लगा रहेगा, उसे वास्तव में पता ही नहीं चल पायेगा कि ‘स्व’ की उपस्थिति तो उसके स्वभाव के भीतर पहले से ही है | इसलिए प्रत्येक अभाव व प्रभाव से बाहर निकलकर स्वभाव में जीना ही स्वरुप तक ले जा सकता है, अन्य कोई साधन स्वरुप तक पहुँचने का नहीं है |

         स्वभाव और स्वरुप में क्या अंतर है ? ठीक है, स्वभाव स्वरूप को प्रकट नहीं होने देता परन्तु प्रकट क्यों नहीं होने देता ? दोनों में अंतर नाम मात्र का है | स्वरूप पर प्रकृति के गुणों का आवरण जब चढ़ जाता है तब वह स्वभाव बनकर स्वरुप को प्रकट नहीं होने देता | चलिए ! इसी बात को जानने का प्रयास करते हैं |

              शरीर प्रकृति की देन है, इस कारण से शरीर में प्रकृति के तीनों गुण उपस्थित रहते हैं | शरीर में प्रकृति अपने तीनों गुण डालती है क्योंकि कोई भी कर्म बिना गुण के संपन्न नहीं हो सकता | गुणों के कारण ही मनुष्य अपने जीवन में कर्म करना प्रारम्भ करता है | शरीर में ये तीन गुण रहते कहाँ है ? मुख्य रूप से ये गुण स्वभाव के अनुरूप और उसी के साथ शरीर में रहते हैं | स्वभाव परिवर्तन के साथ गुणों की प्रधानता भी परिवर्तित होती रहती है | नए जीवन में शरीर के साथ स्वभाव आया है और स्वभाव के लिए साथ में गुण भी आवश्यक हैं | इसीलिए मनुष्य के स्वभाव को उसकी प्रकृति भी कहा जाता है | स्वभाव के कारण शरीर में उपस्थित गुण ही मनुष्य का आचरण निश्चित करते हैं | अगर पूर्वजन्म के अनुसार इस जन्म में स्वभाव अच्छा मिला है तो सत्व गुण की प्रधानता शरीर में रहेगी और उसी के अनुसार व्यक्ति का आचरण होगा |

       स्वभाव ही मनुष्य के गुण निर्धारित करता है और उसी के अनुसार मनुष्य को नए जन्म में परिवार मिलता है | प्रत्येक परिवार का एक वर्ण होता है | वर्ण चार प्रकार के होते हैं | ये चार वर्ण हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र | भगवान् गीता में इन चारों वर्णों को सृजित करने के बारे में कहते हैं - “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः | ||गीता-4/13||” अर्थात मेरे द्वारा गुणों और कर्मों के अनुसार चारों वर्णों की रचना की गयी है | जिस वर्ण वाले परिवार में मनुष्य जन्म लेता है, उसका स्वभाव भी उसी वर्ण के अनुसार होता है | जिस व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार जो वर्ण मिला है उस व्यक्ति का उसी वर्ण का धर्म, स्व-धर्म भी होता है और उसे अपने जीवन में उसी धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए | इसी बात को भगवान् 18 वें अध्याय में स्पष्ट करते हैं-

     ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप |

   कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवेर्गुणैः ||गीता-18/41||

अर्थात हे परन्तप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए तीनों गुणों के द्वारा विभक्त किये गए हैं |

       इस प्रकार स्पष्ट है कि मनुष्य का वर्ण स्वाभावानुसार ही निश्चित होता है और उसे अपने जीवन में उसी स्वभाव के अनुसार कर्म करने चाहिए | यही उस वर्ण का धर्म है | इसी धर्म के अनुसार कर्म करने से वह ‘स्व’ को जानने के निकट पहुँच सकता है इसीलिए इसे स्व-धर्म कहा जाता है | स्व-धर्म के अनुसार स्व-कर्म होते हैं और अंततः स्व-कर्म ही मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप तक ले जाते हैं |-

            गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं-

       श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |

     स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||गीता-18/47||

अर्थात अच्छी तरह अनुष्ठान किये हुए परधर्म से गुण रहित स्वधर्म श्रेष्ठ है क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्व-धर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता |

            हमने पूर्वजन्म में जैसे फल की कामना की थी उसी अनुसार कर्म भी किये थे | दुर्भाग्यवश वे कर्म उस जीवन में परिपक्व होकर फल नहीं दे पाए थे | वे कर्म ही संचित होकर संस्कार के रूप में पुनर्जन्म का कारण बने और उन्हीं के अनुसार हमें नया मनुष्य जीवन मिला है | जिस भी वर्ण में हमें यह जन्म मिला है, उसकी कामना हमने अपने पूर्व मानव जीवन में की थी | अतः आवश्यक है कि हम इस जीवन में अपने वर्ण के धर्म के अनुसार कर्म करें और अपने प्रारब्ध का फल भोगें | स्व-धर्म के अनुसार कर्म करने से ही हम अपने प्रारब्ध से मुक्त होकर स्वरुप तक पहुँच सकेंगे | अगर हम पर-धर्म के अनुसार कर्म करने लगेंगे तो हमारा प्रारब्ध कभी भी समाप्त नहीं हो सकेगा और हम स्वरुप तक भी नहीं पहुँच सकेंगे | पर-धर्म के अनुसार कर्म करने वाला पाप को प्राप्त होता है, ऐसा कहने का अर्थ है कि फिर हम आवागमन से कभी भी मुक्त नहीं हो सकेंगे |

        वर्ण व्यवस्था के अनुसार एक वर्ण में स्थित व्यक्ति को दूसरा वर्ण अधिक गुणों वाला और उच्च प्रतीत होता है और अपना वर्ण कम गुणों वाला और निम्न | ऐसा समझकर व्यक्ति दूसरे वर्ण के कर्म करने लग जाता है | ऐसा करना उसके लिए किसी भी प्रकार हितकर नहीं हो सकता | कौए को सदैव अपनी चाल के अनुसार ही चलना चाहिए | उसे कभी भी हंस की चाल चलने का प्रयास नहीं करना चाहिए | इस प्रकार पर-धर्म के अनुसार चलने वाला जीवन भर भय से मुक्त नहीं हो सकता | भयग्रस्त व्यक्ति सदैव ही अपने स्वरुप को जानने से कोसों दूर खड़ा रह जाता है |

             जिस प्रकार भगवान् ने वर्णों की रचना की है उसी प्रकार चार आश्रम भी उन्हीं के बनाये हुए हैं | चार आश्रम हैं- ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम | मनुष्य की आयु एक सौ वर्ष की मानी गयी है | इस आयु को समान रूप से चार भागों में विभाजित कर चार आश्रम बनाये गए हैं | जन्म से लेकर 25 वर्ष तक की आयु को ब्रह्मचर्य आश्रम कहा गया है | 26 से 50 वर्ष तक की अवस्था गृहस्थ आश्रम की है | 51 से 75 वर्ष की उम्र वानप्रस्थ आश्रम कहलाती है और 75 वर्ष से अधिक की आयु संन्यास की अवस्था होती है | प्रत्येक आश्रम का अपना अपना धर्म होता है | मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी आयु को देखकर अपना आश्रम निश्चित कर उसके धर्म के अनुसार ही आचरण और कर्म करे |

      श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध के 17 वें अध्याय में भगवान् ने वर्णाश्रम-धर्म का निरूपण किया है | वर्ण और आश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति को स्पष्ट करते हुए भगवान् कहते हैं-

     विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजा:|

  वैराजात् पुरुषाज्जाता य आत्माचारलक्षणा: ||

   गृहाश्रमो जघनतो ब्रह्मचर्यं हृदो मम |

वक्षः स्थानाद् वने वासो न्यासः शीर्षणि संस्थितः ||भागवत-11/17/13-14||

           भगवान्, उद्धवजी को कह रहे हैं कि विराट् पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई है | वह विराट् पुरुष मैं ही हूँ | मेरे उदर स्थल से गृहस्थाश्रम, हृदय से ब्रह्मचर्याश्रम, वक्षःस्थल से वानप्रस्थाश्रम और मस्तक से संन्यासाश्रम की उत्पत्ति हुई है |

     इसी अध्याय में आगे भगवान् ने प्रत्येक वर्ण और आश्रम के धर्म विस्तार से बताएं हैं | आधुनिक युग में कोई भी व्यक्ति अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार धर्म का आचरण करते हुए कर्म नहीं कर रहा है | यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वरुप को जानने से वंचित है | इसी युग में संत रैदास हुए हैं जोकि मीरां बाई के गुरु थे | उन्होंने अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार धर्म निभाया और स्वरुप को उपलब्ध हुए | तभी तो कहा जाता है – “मन चंगा तो कठौती में गंगा” | स्व-धर्म के अनुसार कर्म करते हुए उन्होंने चमड़े को भिगोने वाली कठौती में भी मां गंगा को आने को विवश कर दिया था | यह है स्वभाव के अनुसार धर्म पर चलते हुए कर्म करते रहने का परिणाम | 

         इतने विवेचन से स्पष्ट है कि स्व-धर्म के अनुसार कर्म न करके पर-धर्म के अनुसार कर्म करने वाला सदैव भय-ग्रस्त रहता है क्योंकि ऐसा करना उसके स्वभाव के एकदम विपरीत है | भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं-   

     श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |

     स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ||गीता-3/35||

      अच्छी तरह आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणों की कमी वाला अपना धर्म श्रेष्ठ है | अपने धर्म में तो मरना भी कल्याण करता है जबकि दूसरों का धर्म भय को देने वाला है | 

         प्रत्येक प्राणी का स्वभाव अलग अलग होता है | अपने स्वभाव के अनुसार ही प्रत्येक प्राणी कर्म करता है | मनुष्य को यह स्वतंत्रता है कि वह अपने स्वभाव अनुसार निर्धारित किये गए कर्मों के अतिरिक्त भी कर्म कर सकता है, अन्य जीवों को ऐसी स्वतंत्रता नहीं है | मनुष्य अपने स्वभाव को नए कर्म करके परिवर्तित भी कर सकता है | स्वभाव में यह परिवर्तन आपके उत्थान का कारण बन सकता है और पतन का कारण भी | साथ ही यह भी सत्य है कि स्वाभाविक कर्म को न करना लगभग असंभव है क्योंकि स्वभावानुसार कर्म करके ही पूर्व जन्म के संचित कर्म को परिपक्व किया जा सकता है अन्यथा नहीं |

       भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि –

 स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा |

 कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोSपि तत् || गीता-18/60||

    अर्थात हे कुन्तीनन्दन ! अपने स्वभावजन्य कर्म से बंधा हुआ तू मोह के कारण जिस युद्ध को नहीं करना चाहता, उसको तू (क्षात्र-प्रकृति के) परवश होकर करेगा |

       अर्जुन को कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में युद्ध प्रारम्भ होने से पहले मोह हो गया था और वह युद्ध नहीं करना चाहता था | तब भगवान् ने कहा कि तू कितना ही चाह ले कि युद्ध नहीं करूँगा परन्तु तेरी प्रकृति जोकि तेरा स्वभाव ही है तुझे युद्ध करने को विवश कर देगा |

             गीता में भगवान् स्पष्ट कर देते हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के परवश होकर ही कर्म करता है अर्थात प्रत्येक मनुष्य कर्म करने को विवश है | मनुष्य को अपने पूर्वजन्म से मिले स्वभाव के कारण कर्म करना, उसके लिए संचित कर्म को परिपक्व करने के लिए आवश्यक है | जब तक संचित कर्मों का प्रभाव समाप्त नहीं हो जाता तब तक प्रकृति के गुणों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता | यह अवस्था गुणातीत अवस्था कहलाती है | गुणातीत हो जाने पर ही स्वरूप प्रकट होता है | गुणों के आवरण के कारण ही तो स्वरुप, स्वभाव बन जाता है | स्वभाव ही हमारा धर्म निश्चित करता है और इसी धर्म का जीवन में पालन करना आवश्यक है |

   स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |

   धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोSन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ||2/31||

अर्थात अपने क्षात्र धर्म को देखकर भी विचलित नहीं होना चाहिए; क्योंकि धर्ममय युद्ध से बढकर एक क्षत्रिय के लिए दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है |

                    स्वाभानुसार कर्म न करना जीवन में पतन का कारण बनता है | इस प्रकार कहा जा सकता है कि मनुष्य का स्वभाव ही उसका धर्म निश्चित करता है और जो मनुष्य इस धर्म के अनुसार कर्म करता है वह धर्म उसका स्व-धर्म कहलाता है | स्व-धर्म ही आपको स्वरुप तक ले जा सकता है | जो व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करने से दूर भागता है वह बार बार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है क्योंकि उसने अपने संचित कर्मों का फल प्राप्त कर उनको नष्ट नहीं किया है |

        जो कर्म हम अपने जीवन में ‘स्व’ को जानने की इच्छा से करते हैं वे स्व-कर्म कहलाते हैं और जो कर्म हम अपने स्वभावानुसार करते हैं वे कर्म स्व-धर्म कहलाते हैं | हमें कर्म स्व-धर्म के अनुसार करने हैं जिससे परमात्मा की कृपा से मिले इस एक मनुष्य जीवन में ही हम अपने स्वरुप को प्राप्त कर लेने की अवस्था तक पहंच जाएँ |  

   गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं-

       स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः |

      स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ||18/45||

      अर्थात अपने अपने कर्म में प्रीतिपूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक सिद्धि को प्राप्त कर लेता है | अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त होता है, उसको तू मुझसे सुन |

       भगवान् ने गीता में कह दिया है कि अपने अपने कर्म में प्रीतिपूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक सिद्धि अर्थात स्वरुप तक पहुँच जाता है | कैसे पहुँच जाता है, उसको स्पष्ट करते हुए भगवान् कहते हैं कि –

           यतः प्रवृतिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् |

    स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ||18/46||

अर्थात जिस परमात्मा से सम्पूर्ण प्राणियों की प्रवृति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्मा का अपने कर्म के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है |

            परमात्मा का पूजन अपने कर्म (स्व-कर्म) के द्वारा करें | कौन से परमात्मा का पूजन ? उस परमात्मा का जिसने यह संसार रचा है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है अर्थात वासुदेवः सर्वम् | इसका अर्थ यह है कि जो भी प्राणी आपकी दृष्टि में आता है उसको परमात्मा मानकर उसका पूजन करें अर्थात नि:स्वार्थ भाव से प्रत्येक प्राणी की सेवा करें | नि:स्वार्थ भाव से सेवा कर्म करना ही स्व-कर्म है और परमात्मा का पूजन भी | अपने स्वार्थ से किये जाने वाले कर्म आप करते अवश्य हैं परन्तु वे कर्म आपको अपने स्वरुप तक न ले जाकर 84 लाख योनियों में भटकने की ओर धकेल ले जाते हैं | ऐसे कर्म स्व-कर्म नहीं हो सकते क्योंकि ये स्व-धर्म के अनुसार नहीं किये जा रहे हैं | ऐसे समस्त कर्म त्याज्य हैं |

         निःस्वार्थ भाव से किये जाने वाले कर्म में भी अगर आसक्ति हो गयी तो फिर वे भी आपको अपने स्वरुप से दूर कर देंगे | देखा जाये तो कर्म में भाव मुख्य है | स्वार्थ भाव पतन की ओर ले जाता है और निःस्वार्थ भाव स्वरुप तक | इसलिए निःस्वार्थ भाव से किये जाने वाले कर्म ही स्व-कर्म है, जिनको करते हुए मनुष्य सम्यक सिद्धि अर्थात अपने स्वरुप को प्राप्त कर लेता है |

           भगवान् का पूजन हम जब निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हुए करते हैं तब हम परमात्मा के अति निकट होते हैं | परमात्मा सच्चिदानंद स्वरुप हैं और हमारा स्वरुप भी चिदानंद है | प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का दर्शन करते हुए उसकी सेवा में लगे रहना ही स्व-कर्म है और निःस्वार्थ भाव से किये जाने वाला प्रत्येक कर्म हमें अपने स्वरुप तक पहुँचने में सहायक होता है |

         यहाँ आकर प्रश्न उठता है कि निःस्वार्थ सेवा स्व-कर्म है और स्व-धर्म भी व्यक्ति का कर्तव्य कर्म है तो फिर स्व-धर्म में और स्व-कर्म में क्या अंतर है ? नाम मात्र का अंतर है, दोनों में | स्व-धर्म विशाल शब्द है जोकि अपने भीतर स्व-कर्म को समेटे हुए है | स्व-धर्म ही तब स्व-कर्म बन जाता है, जब उस कर्म में किसी प्रकार की आसक्ति और स्वार्थ नहीं होता | यह सत्य है कि स्वभाव मनुष्य का धर्म निश्चित करता है और उसका स्व-धर्म उसके कर्म निश्चित करता है | अतः आवश्यक है कि जीवन में मनुष्य स्व-धर्म के अनुसार कर्म करे और कर्मों के प्रति आसक्त न हो | आसक्ति और स्वार्थ रहित होकर स्व-धर्म के अनुसार किये जाने वाले कर्म ही स्व-कर्म है और हम स्व-कर्म करके प्रत्येक प्राणी को परमात्मा मानकर सेवा के माध्यम से उसका पूजन करते हैं | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि स्वभाव से सम्बंधित स्व-धर्म के अनुसार कर्म करते हुए स्वरुप तक पहुंचा जा सकता है |

         स्वभाव के अनुसार कर्म करते हुए मनुष्य को यह भ्रम हो जाता है कि ये कर्म परमात्मा करते हैं | नहीं, परमात्मा न तो कोई कर्म करते हैं, न ही आपको उन कर्मों का कोई फल देते हैं और न ही आपको कर्म करने को प्रेरित करते हैं | गीता में इस बात को स्पष्ट करते हुए भगवान् कहते हैं –

     न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः |

      न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते || गीता-5/14||

    अर्थात परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न ही कर्मफल के साथ संयोग की रचना करते हैं; केवल मनुष्य का स्वभाव ही सब कुछ कर रहा है |

         ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदासजी महाराज इस श्लोक (गीता-5/14) की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि कर्तापन, कर्म और कर्मफल के साथ संयोग करना जीव का काम है, न कि परमात्मा का | अतः इन सब का त्याग भी जीव को करना है | जीव ही अज्ञानवश प्रकृति (स्वभाव) के साथ सम्बन्ध जोड़ कर कर्मों का कर्ता बनता है और कर्मफल के साथ सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दु:खी होता रहता है |

       इससे स्पष्ट है कि जो कर्म हम अपने स्वभाव के अनुसार कर रहे हैं उन कर्मों का हमें कर्ता नहीं बनना है और न ही कर्मफल मिलने पर उस फल व कर्म में आसक्त होना है | स्वभाव को धर्म मानते हुए कर्म कर पूर्वजन्म के प्रारब्ध से मुक्त होकर स्वरुप तक पहुँचना ही हमें अपने जीवन का एक मात्र उद्देश्य रखना चाहिए |

        जैसा कि मैंने पूर्व में बताया है कि स्वभाव के अनुसार कर्म करने के लिए प्रकृति के तीन गुणों की उपस्थिति आवश्यक है | बिना गुणों के कर्म हो नहीं सकते | इसीलिए प्रत्येक मनुष्य के शरीर में प्रकृति के तीनों गुण उपस्थित होते हैं | स्वभाव से स्वरुप तक पहुँचने के लिए इन गुणों से परे चला जाना आवश्यक है | इस अवस्था को गुणातीत अवस्था कहा जाता है | गुणों से परे चले जाना कोई हंसी-खेल नहीं है | केवल मनुष्य नाम का यह जीव ही है जो गुणातीत होने का प्रयास कर सकता है, अन्य जीव तो इस योग्य भी नहीं है | गीता में भगवान् कहते हैं-

 त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |

 निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||2/45||

   वेद तीनों गुणों के कार्य का वर्णन करने वाले हैं | हे अर्जुन ! तू तीनों गुणों से रहित हो जा, राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित हो जा, निरंतर नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेम की चाहना भी मत कर और परमात्म परायण हो जा |

        फिर योग-क्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा) कैसे होगा ? भगवान् श्री कृष्ण गीता में कहते हैं-‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ (9/22) अर्थात उनका योग-क्षेम मैं वहन करता हूँ | लगभग ऐसी ही बात भागवत में भी भगवान् कहते हैं –‘ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे तान् बिभर्म्यहम् | (10/46/4) अर्थात मेरा यह व्रत है कि जो लोग मेरे लिए लौकिक और पारलौकिक धर्मों को छोड़ देते हैं, उनका भरण-पोषण मैं करता हूँ |

            तीनों गुणों से रहित होने से आशय है सकाम कर्म का त्याग कर केवल निष्काम कर्म करना | निष्काम भाव से कर्म करने वाला ही गुणातीत अवस्था को उपलब्ध हो सकता है | स्वभाव में छिपे ‘स्व’ को प्रकट करने के लिए ‘भाव’ को उससे अलग करना होगा | प्रायः सांसारिक ‘भाव’ ही हमें सकाम कर्म की ओर ले जा सकता है | संसार के विषय ही मनुष्य की कर्मों में आसक्ति का एक बड़ा कारण है | यह आसक्ति ही उसे सकाम कर्म करने को प्रेरित करती है | विषयों में आसक्ति मन में कामना पैदा करती है और फिर यही कामना व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के कर्म करने को प्रेरित करती है | सकाम भाव का त्याग कर देने से ही स्वरुप को जान लेना संभव है अन्यथा नहीं | केवल एक परमात्मा को ही अपना मानकर उसमें स्थित हो कर कर्म करते रहना ही स्वरुप तक पहुँचने के लिए पर्याप्त है | जब व्यक्ति निर्द्वंद्व अवस्था को उपलब्ध हो जाता है तब उसके मन में न तो कोई कामना रहती है और न ही उसकी किसी विषय में रुचि | इस अवस्था को उपलब्ध हुआ व्यक्ति अपने स्वभाव से गुणों को मुक्त कर देता है और ‘स्व’ को जानते हुए स्वरुप तक पहुँच जाता है |

         स्वभाव से स्वरुप तक पहुंचना कर्म-योग है | गीता में स्वभाव को ही अध्यात्म कहा गया है | जीवन में अगर हम स्वभाव का विज्ञान समझ लें तो धर्म और कर्म का विज्ञान भी समझ में आ जायेगा | ‘स्वभाव को ही अध्यात्म कहते है’, ऐसा कहने का अर्थ है कि जीव का वास्तविक स्वरुप भी उसका स्वभाव ही है | जैसे प्रत्येक पत्थर में भगवान् है | जिस कारण से यह मनुष्य शरीर मिला है और जिस प्रकृति (स्वभाव) को हम उपलब्ध हुए हैं उसमें से अवांछित भाग का त्याग करना है | ऐसा करने से ‘स्व’ स्वतः ही प्रकट हो जायेगा | जैसे पत्थर के अवांछित भाग को हटाकर भगवान् की मूर्ति निकाल ली जाती है | स्वभाव में अवांछित भाग है, हमारा कर्मों के प्रति आसक्त होना, हमारा कर्ता भाव, कर्मफल की कामना,राग-द्वेष जैसे विकार इत्यादि | ऐसा सब स्वभाव के साथ आए प्रकृति के तीन गुणों के कारण होता है | अपने स्वभाव के अनुसार जीवन जीना और इन अवांछित तत्वों को त्याग कर गुणों से अतीत हो जाना स्वयं के स्वरुप को जान लेना है |

         गीता का तानाबाना स्व-धर्म/स्व-कर्म के चारों ओर बुना गया है | इसी कारण से गीता को कर्म-योग का ग्रन्थ कहा जाता है | जहां प्रथम अध्याय में अर्जुन धर्म को लेकर भ्रमित प्रतीत होता है, उसके उसी भ्रम को केंद्र में रखते हुए भगवान् श्री कृष्ण उसका मोह विभिन्न प्रकार से दूर करने का प्रयास करते हैं | उसमें एक मार्ग कर्म-योग का भी है, जिसको भगवान् ने गीता में विस्तार से स्पष्ट भी किया है | अर्जुन क्षत्रिय था क्योंकि  क्षत्रिय वर्ण में पैदा होने के कारण उसका क्षत्रिय स्वभाव ही था | जन्म-जात स्वभाव के अनुसार ही धर्म को अपनाकर उसे कर्म करने चाहिए थे | वह अपने सगे-सम्बन्धियों को युद्धभूमि में आपस में मरते-मारते हुए देखना नहीं चाहता था | यह सोचकर वह स्व-धर्म तथा स्व-कर्म से विमुख होने जा रहा था |

         श्री कृष्ण ने उसके क्षत्रिय स्वभाव को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास किया परन्तु वह मोहवश वास्तविक ज्ञान को समझ नहीं पा रहा था | अंततः भगवान् को कहना ही पड़ा-

   सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |

   अहं तव सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः || गीता-18|66||

     तू सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा | मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा |

       भगवान् श्री कृष्ण ने कह तो दिया कि सभी धर्मों को छोड़कर एक मेरी शरण में आ जा, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, तो क्या महाभारत का युद्ध भगवान् ने लड़ा था ? नहीं, भगवान् कोई कर्म न तो करते हैं और न ही किसी कर्म में लिप्त होते हैं | युद्ध तो अर्जुन ने ही लड़ा था और वह भी अपने स्वभाव के अनुसार, उस युद्ध को स्व-धर्म मानते हुए | उसका स्वभाव उसे युद्ध करने को विवश कर देता परन्तु युद्ध में वह अपने सगे-सम्बन्धियों का हत्यारा बनकर पाप का भागी नहीं बनना चाहता था | यह उसका केवल अज्ञान था | जीवन में स्वभाव के अनुसार मिले स्व-धर्म का पालन करना ही आवश्यक है | स्व-धर्म के पालन के लिए कर्म करने आवश्यक हैं परन्तु उन कर्मों का आश्रय न लेकर केवल परमात्मा का आश्रय लेकर कर्म करें तो फिर हम सभी प्रकार के पाप से मुक्त रहते हैं | भगवद-आश्रय में रहते हुए मनुष्य निःस्वार्थ भाव और मनोयोग से कर्म करते हुए कर्म के साथ बंधता नहीं है और ‘न बंधा हुआ’ मनुष्य सदैव मुक्त ही है |

           स्वभाव से स्वरूप तक पहुँचने के लिए स्व-धर्म का पालन करते हुए कर्म करने आवश्यक है | स्व-धर्म को स्मृति में बनाये रखना आवश्यक है अन्यथा हमारी भी वही स्थिति हो जाएगी जैसी युद्धभूमि में अर्जुन की हुई थी | अर्जुन को तो श्री कृष्ण जैसे गुरु का सत्संग मिल गया था | इसलिए हमें भी जीवन में सत्संग लेते रहना चाहिए | सत्संग के साथ स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन) भी आपकी स्मृति को बनाये रखने में सहायक होता है | परमात्मा का नित्य स्मरण करते हुए निःस्वार्थ भाव से कर्म (सेवा) करते रहें, स्वरुप से दूर नहीं होंगे | भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा भी है-

     अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् |

     यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ||8/5||

    जो मनुष्य अन्तकाल में भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है |

       अन्तकाल अभी और इसी समय है क्योंकि हमारे शरीर की कोशिकाएं प्रतिपल मर रही है और इसी प्रकार यह शरीर भी एक दिन अचानक मर जायेगा | परिवार वाले प्रतीक्षा करते रह जायेंगे और यह हंस अकेला ही उड़ जायेगा | अतः परमात्मा का स्मरण प्रत्येक क्षण करते रहें | सत्संग, स्वाध्याय, सुमिरन और सेवा में समस्त योग आ जाते है | इसलिए स्वभाव में ‘स्व’ के साथ मिले ‘भाव’ को परिमार्जित करते हुए उसका लोप कर दें | ‘भाव’ मन के भीतर रहता है, मन को परमात्मा में मिला देने से सांसारिक ‘भाव’ का स्वतः ही लोप हो जाता है | साथ ही परमात्मा का स्मरण करते हुए स्व-धर्म के अनुसार कर्म करते रहें आप तत्काल ही स्वरुप को प्राप्त कर लेंगे ।

           कर्म से शरणागति की ओर जाना स्वभाव से स्वरुप तक की यात्रा है | आप चाहे कर्म-योग को उचित मानें अथवा ज्ञान-योग को श्रेष्ठ मानें, स्वरुप का ज्ञान आपको भक्ति की सर्वोच्च अवस्था शरणागति को प्राप्त करने से सहज ही हो जाता है | हम मनुष्य हैं | हम न जाने कितनी योनियों में भ्रमण करते हुए मनुष्य की अवस्था को प्राप्त हुए हैं | यह भी निश्चित है कि हम अपना एक स्वभाव लेकर इस संसार में आये हैं | मनुष्य जीवन हमारे लिए एक सुअवसर है, जिसमें हम स्वभाव के अनुसार स्व-धर्म का पालन करते हुए स्वरुप तक पहुँच सकते है | इसके लिए हमें पूर्व मानव जीवन के कर्मों का फल भोगते हुए नए कर्मों और कामनाओं का और बोझ नहीं ढोना है | यह अवांछनीय बोझ ही हमें नए जन्मों की ओर धकेल देता है | इसलिए आवश्यक है कि स्व-धर्म का पालन करते हुए भगवद-आश्रय में रहते हुए कर्म कर स्वरुप तक पहुँच जाएँ | तभी इस मनुष्य जीवन की सार्थकता है।    

सार संक्षेप-

           स्वभाव से स्वरुप तक पहुँचने के लिए आवश्यक है कि स्वयं के भाव में परिवर्तन किया जाये | भाव क्या है ? भाव आपके विचार हैं जो स्पष्ट करते हैं कि आप जो है उससे अलग होकर कुछ नया होना चाहते हैं ? स्व के साथ इस भाव के जुड़ जाने से आपका स्वभाव बनता है | उसी स्वभाव के अनुसार जीवन में व्यक्ति का आचरण होता है | सांसारिक भाव के कारण व्यक्ति के अभिव्यक्त होने के विविध प्रकार के आयाम हो जाते है | सांसारिक अभिव्यक्ति आपको अपने स्वरुप से दूर ले जाती है | जो नाटकीयता आप अपने जीवन में वास्तविक रुप पर ओढ़ लेते हैं वह आपको अपने स्वरूप से दूर कर देती है |

         सांसारिक जीवन की विषमता से थककर जब आपका स्वभाव अपने स्वरूप को जानने को उत्सुक होता है तब वह परिवर्तित होकर नाटकीयता से दूर कर देता है और व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर लेता है | सांसारिक विषमता को जानना और उससे दूर होजाना सर्वप्रथम आपके स्वभाव को परिवर्तित करता है और यह परिवर्तित स्वभाव आपको स्वरूप तक ले जाता है |

        आपका स्वभाव क्षर है, आपका स्वरूप अक्षर है और जो स्वरूप से भी परे है वह स्व है अर्थात परमात्मा | स्वभाव मनुष्य अपने जन्म के साथ ले कर आता है | फिर उसी स्वभाव के अनुसार अगर वह जीवन में स्व-धर्म निभाता रहे तो पूर्व जन्म के सभी संस्कार मिट जाते हैं और व्यक्ति स्वरूप को उपलब्ध हो जाता है | इसके लिए आवश्यक है कि इस जन्म में स्वयं के भाव को सांसारिक गतिशीलता के अनुसार न बदलें बल्कि आत्मबोध के लिए परिवर्तित कर दें | फिर स्वरूप से स्व तक पहुँचाना सुगम हो जाता है |

         स्वधर्म और स्वकर्म से स्वरूप और अंततः स्व को जान लेना ही आध्यात्मिक यात्रा की सफलता है और मनुष्य जीवन का उद्देश्य भी | मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपने शरीर के रहते स्व तक पहुँच जाएँ |

प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||