Monday, June 30, 2014

धन |-९

                                       धन की प्रथम गति दान है,जिसके बारे में हम संक्षेप में चर्चा कर चुके है । दूसरी गति अर्थात विसर्जन के दूसरे प्रकार के अनुसार धन भोग में व्यय होता है । जितने भी व्यक्ति आज तक इतिहास में हुए हैं , उनमे से बहुत कम ने ही अपने सृजित धन को उचित तरीके से भोगा है ।धन का भोग ,वास्तव में है क्या? किसी भी पदार्थ का भोग उसका वह उपयोग है जिससे शरीर और मन को सुख और शांति का अनुभव होता है । यह सुख किसी भौतिक पदार्थ के उपयोग का परिणाम होता है इसलिए ऐसा सुख भी उस भौतिक पदार्थ की तरह ही अस्थाई होता है । धन से भौतिक पदार्थ और सुख के संसाधन खरीदे जा सकते हैं ,इसलिए अपरोक्ष रूप से इसे धन का भोग ही कहा जाता है ।सुख प्रदान करने वाले भौतिक पदार्थ और संसाधन दिन-प्रतिदिन नए नए विकसित किये जा रहे हैं । इन सुख के संसाधनों की जकड धीरे धीरे धीरे मज़बूत होती जा रही है । प्रारम्भ में व्यक्ति इन संसाधनों को प्राप्त करने के लिए छटपटाता है । एक बार उपलब्ध होने के बाद व्यक्ति इन्हें बार बार प्राप्त करने का प्रयास करता है । इसी कारण से व्यक्ति इन भोगों में ही उलझ कर रह जाता है । एक बार जब भोगों से सुख प्राप्त होने लगता है तो फिर व्यक्ति चाह कर भी उनसे विमुख नहीं हो सकता । भोगों के प्रति यह आकर्षण भोगों के प्रति आसक्ति कहलाती है ।
                                  भोग से सुख प्राप्त करना कदापि भी अनुचित नहीं है परन्तु भोगों में ही उलझ कर रह जाना अनुचित है । भोगों में आसक्ति हो जाने से व्यक्ति का धन तेजी के साथ विसर्जित होने लगता है और संरक्षित नहीं रह पाता । सृजित धन तो व्यय होता जाता है और भोगों में उलझा व्यक्ति धन का उपार्जन भी नहीं कर पाता । ऐसे में धन समाप्ति की ओर जाने का रुख कर लेता है । इस प्रकार की आसक्ति कहीं से भी उचित नहीं है ।                                    
                                भोग ,धन की वह गति है जिसमे व्यक्ति धन को अपने शरीर,अपने परिवार के सुख के लिए उपयोग में लेता है ।  बस उसे यही ध्यान रखना है कि धन को केवल शारीरिक सुख के भोगों पर ही व्यय नहीं करना है । उत्तम भोग तभी माना जाता है जब व्यक्ति अपने धन को बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य और परिवार की उन्नति के लिए व्यय करे । इसके लिए वह किसी भी प्रकार की कंजूसी नहीं बरते । ऐसे भोग में धन व्यय करना उस धन का सही व उचित उपयोग करना है ।
क्रमशः
                                         ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Sunday, June 29, 2014

धन |-८

                                 धन के विसर्जन के कितने तरीके हो सकते है ,आइये वही जानने का प्रयास करते है । एक बहुत ही प्रसिद्द दोहा है ,जो इस बारे में हमारा मार्ग दर्शन कर सकता है ।
                                  या धन की गति तीन है,दान भोग और नाश ।
                                  दान कर दो या भोग लो, या फिर होगा  नाश ॥
                 धन चंचल है,इसलिए यह गतिमान भी है । इस धन की तीन प्रकार की गति होती है-दान,भोग और नाश । दान का अर्थ है आप इस धन को किसी जरूरतमंद की सेवा के लिए समर्पित कर सकते हैं । इस भौतिक संसार में चाहे हम धन की कितनी ही निंदा करलें परन्तु हम सब साथ ही यह भी जानते हैं कि इस संसार में बिना धन के जीना कितना मुश्किल है । दान,धन का एक त्याग है । इस त्याग के पीछे परमार्थ की भावना होती है । स्वार्थ से दान का किसी भी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं होता है । जिस धन के त्याग के पीछे स्वार्थ छिपा होता है फिर वह धन का त्याग दान की श्रेणी में नहीं आता है । स्वार्थ प्रायः अपना नाम कमाने और प्रसिद्धि तथा समाज में प्रतिष्ठा पाने का होता है । अतः जो त्याग या कथित दान अगर व्यक्ति प्रसिद्धि और नाम पाने के उद्देश्य से करता है वह दान निम्न या राजस श्रेणी का कहा जाता है ।
                               गीता में भगवान् श्री कृष्ण इस प्रकार के दान के बारे में स्पष्ट रूप से कहते हैं कि-
                                                        यत्तु प्रत्युप्कारार्थ फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
                                                       दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ गीता १७/२१ ॥
                              अर्थात,जो दान क्लेश पूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टिगत रखते हुए दिया जाता है,वह दान राजस प्रकृति का कहा जाता है । क्लेश पूर्वक दान वह दान है जो आजकल हम लोग चंदा करने वालों को मजबूरीवश देते हैं । फ़ल की दृष्टि से दान करने का अर्थ है कि दान मान,बड़ाई,प्रतिष्ठा और स्वर्गादिकी प्राप्ति के लिए या फिर रोग अथवा कष्ट निवारण हेतु दिया जाता है । इस प्रकार से दिया हुआ
दान व्यक्ति को बांधता ही है,मुक्त नहीं करता ।
                               अब प्रश्न यह उठता है कि इस प्रकार का दान बांधता कैसे है ,जबकि धन का त्याग तो इस प्रकार से किये हुए  दान में भी होता है । इस विधि से दिए गए दान से आपका निजी स्वार्थ जुड़ा होता है और स्वार्थ सदैव ही मोह पैदा करता है । मोह ही बंधन पैदा करता है । अतः इस प्रकार से किये गए दान में धन का त्याग होते हुए भी धन के प्रति आसक्ति बनी रहती है और आसक्ति बंधन पैदा करती है । इस दान मैं व्यक्ति धन का त्याग करके भी धन से मुक्त नहीं हो पाता ।
                               फिर कौन सा दान अच्छी श्रेणी का माना जाता है ? वह दान जो बिना किसी कामना के पात्र और योग्य व्यक्ति को उसकी आवश्यकता को देखते हुए दिया जाता है वह दान सात्विक दान कहलाता है । ऐसे दान में न तो उपकार की भावना मन में होनी चाहिए और न ही बदले में कुछ प्राप्त हो जाने की कामना ही होनी चाहिए । आत्म प्रसंशा की कामना तो करना अनुचित है ही ।दान ,पात्र व्यक्ति की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर और उसी अनुरूप आवश्यकता को पूरा करने वाला होना चाहिए ।  इस दान के बारे में कहा जाता है कि ऐसा दान अगर आप दायें हाथ से कर रहे हो तो इसकी खबर बाएं हाथ को भी नहीं होनी चाहिए । इस प्रकार के दान में धन का त्याग पूर्णतया हो जाता है और दान किये हुए धन में आसक्ति पूर्णतया समाप्त हो जाती है । ऐसा दान ही व्यक्ति को मुक्त कर सकता है ।
क्रमशः
                                         ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Saturday, June 28, 2014

धन |-७

                                  धन के उपार्जन और सृजन के बारे में हमने विचार किया और पाया कि अगर इसका उपार्जन उचित तरीके से किया जाये और संग्रहण भी व्यवस्थित हो तो व्यक्ति का जीवन सुखमय व्यतीत हो सकता है । धन के बारे में एकदम स्पष्ट है कि यह अस्थाई होता है और स्थान परिवर्तन करना इसकी विशेषता है । एक जगह यह कभी भी टिकता नहीं है । इसका विसर्जन होना निश्चित है । धन संग्रह करने वाले व्यक्ति को यह एक दम स्पष्ट होना चाहिए । एक उक्ति भी है कि आप चाहे जितना भी धन इक्कट्ठा कर ले,साथ में एक पैसा भी नहीं ले जाओगे । इस संसार को छोड़कर खाली हाथ ही जाना होगा । अन्तिम वस्त्र ,कफ़न के किसी भी प्रकार की कोई जेब नहीं होती है । अतः आपके इस अर्जित और सृजित किये हुए धन का विसर्जन होना निश्चित है ।
                                   धन का विसर्जन इतना आसन नहीं है । व्यक्ति का धन के प्रति लगाव अर्थात धन में आसक्ति इसके विसर्जन को प्रतिबंधित करती है । आसक्ति,धन का विसर्जन होने ही नहीं देती । धन की आसक्ति केवल उसके अर्जन और सृजन में ही विश्वास रखती है । इसी कारण परिवार में धन अथाह रूप से बढ़ता रहता है और आसक्ति के कारण खर्च कम होता है । खर्च कम इसलिए होता है क्योंकि संग्रहित धन में कमी आ जाने का सदैव ही भय बना रहता है । धन को तो सदैव एक व्यक्ति के पास तो रहना नहीं है ,वह तो समयबद्ध तरीके से व्यक्ति बदलता रहता है । इसी तरह एक दिन आपके द्वारा अर्जित और सृजित धन-संपदा को भी किसी अन्य व्यक्ति के हाथों में जाना निश्चित है । जब धन का विसर्जन होना निश्चित ही है,तो फिर यह विसर्जन क्यों न आपके अनुसार और आपके अनुकूल हो ?
                                  धन के विसर्जन को अगर समय रहते पूरा कर लिया जाये तो इस भौतिक शरीर की मृत्यु के समय व्यक्ति को किसी प्रकार का धन के प्रति मोह नहीं रहेगा । धन का मोह अन्य सभी के प्रति मोह पैदा करता है । धन के विसर्जन के साथ ही अन्य वस्तुओं और प्राणियों से मोह भी धीरे धीरे कम होने लगता है । इसीलिए अगर सभी प्रकार की ममता और मोह समाप्त करना है तो धन से वैराग्य पैदा होना आवश्यक है ।धन-सम्पति हमें परिवार के साथ बांधती है और इससे वैराग्य पैदा  होना हमें परिवार के बंधन से मुक्त करता है । अतः मुक्ति की प्रथम सीढ़ी धन से वैराग्य पैदा होना ही है । 
                                धन से वैराग्य होना,इसके विसर्जन का ही दूसरा नाम है । विसर्जन किस प्रकार और क्यों होता है ? विसर्जन इसलिए होता है कि यह धन यानि लक्ष्मी का चंचल स्वभाव माना जाता है । इसकी प्रकृति भी जड़ अर्थात अपरा कही गयी है । अपरा प्रकृति सदैव ही परिवर्तनशील होती है । इसी परिवर्तनशीलता के गुण के कारण धन का विसर्जन होना सदैव ही निश्चित होता है ।  विसर्जन या तो व्यक्ति स्वयं की मन मर्जी से कर सकता है नहीं तो यह अपने आप ही होजाता है । यह व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर है कि वह धन का विसर्जन स्वयं करना चाहता है या नहीं । धन का स्वयं के द्वारा किया जाने वाला विसर्जन उसे मुक्ति की राह पर ले जा सकता है ,नहीं तो वह धन के इस बंधन से जीवन में मुक्त नहीं हो पायेगा ।
क्रमशः
                                ॥ हरिः शरणम् ॥   

Friday, June 27, 2014

धन |-६

                                   धन उपार्जित करना भी अनुचित नहीं है तथा  सृजित और संग्रहित करना भी अनुचित नहीं है । फिर अनुचित क्या है ? धन के बारे में कहा जाता है कि इसका होना ,नहीं होने से अधिक दुखदाई है । चौंक गये न आप ! जी हाँ,मैं बिलकुल सत्य कह रहा हूँ । धन के न होने से व्यक्ति के जीवन में मात्र एक ही दुःख होता है -धन के अभाव का दुःख ,उसके न होने का दुःख ।  और जब एक बार धन का आगमन प्रारम्भ हो जाता है तब व्यक्ति की विलासिता भी आवश्यकता बनने लग जाती है ।  मैं इस बात से सहमत हूँ कि धन का दैनिक आवश्यकता पूर्ति के लिए होना आवश्यक है । आपकी दैनिक आवश्यकताएं धन के अभाव में पूरी होना असंभव है । परन्तु जब धन का आगमन तीव्र गति से बढ़ता है तब व्यक्ति उस अतिरिक्त धन को विलासिता पर खर्च करने लग जाता है । विलासिता उस को कहते हैं जो इस शरीर के लिए तो कतई आवश्यक नहीं है बल्कि क्षण भर के लिए,थोड़े समय के लिए इस शरीर और मन को सुख देने वाली होती है ।
                              व्यक्ति को एक छोटा सा घर भी पर्याप्त होता है ,रहने के लिए । परन्तु अतिरिक्त धन से वह बंगला खरीदता है । मनोरंजन के लिए वह अत्यल्प खर्च करके भी उसे प्राप्त कर सकता है परन्तु धन की अधिकता को वह होम थियेटर बनाने में खर्च करता है । उसका एक छोटे से स्कूटर या छोटी कार से समस्त कार्य हो सकते है परन्तु वह लग्जरी कार खरीदना पसंद करता है । समाज में झूठी शान शौकत के प्रदर्शन के लिए वह अपने बेटे बेटी की शादी में फिजूलखर्ची करता है । यह सब विलासिता के अंतर्गत आता है । एक स्थिति ऐसी आती है जब यह विलासिता ही उसकी आवश्यकता बन जाती है । जब किसी कारणवश धन का आगमन नियंत्रित हो जाता है तब उसे यह विलासिताएं अपनाना भारी पड़ता है और वह उन्हें त्यागना भी चाहता है परन्तु त्याग नहीं सकता । विलासिताओं का त्याग करना संभव नहीं हो पाता क्योंकि विलासितापूर्ण जीवन जीने के लिए जो साधन काम में लिए जाते है वे समस्त चीजें अब व्यक्ति की आवश्यकताऐं बन चुकी होती हैं । जब विलासिताएं,आवश्यकताएं बन जाती है तो जीवनयापन बड़ा ही कठिन और दुखदाई हो जाता है। यही कारण है कि धन का अभाव ज्यादा अच्छा है बजाय धन का बाहुल्य होने से ।
                               अब प्रश्न यह उठता है कि धन के तीव्र आगमन के दौरान इसके इस प्रभाव से कैसे बचा जाये ? धन का उपभोग करना कहीं से भी अनुचित नहीं है, परन्तु उस उपभोग का आदी हो जाना अनुचित है । सुविधाओं का गुलाम बन जाना ही विलासिता को आवश्यकता बना देता है । आप प्रत्येक पैसे से सुख प्राप्त करना चाहते हैं , परन्तु उस क्षणिक सुख को ,उस तात्कालिक सुख को स्थाई न समझे । ऐसा होते ही आप प्रत्येक परिस्थिति में सुखी रहेंगे-धन होने पर भी और न होने पर भी । धन की प्राप्ति प्रारब्ध और पुरुषार्थ से ही संभव है,मैं तो यहाँ तक कहूँगा की धन केवल पुरुषार्थ से ही अर्जित किया जा सकता हैक्योंकि प्रारब्ध भी तो पूर्व जन्म में किये गए पुरुषार्थ से ही बनता है । अतः अपने द्वारा किये गए पुरुषार्थ के परिणाम द्वारा आप स्वयं संचालित न हो,यही ध्यान रखें । फिर यही पुरुषार्थ ,यही धन दुखदाई न होकर आनंद देने वाला साबित होगा ।
क्रमशः
                                ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Thursday, June 26, 2014

धन |-५

                                           धन का उपार्जन और संग्रह दोनों ही अनुचित नहीं है । धन का उपार्जन उचित तरीके से ही होना चाहिए ,किसी को धोखा देकर नहीं,किसी की चोरी करके नहीं, न ही किसी की अमानत में खयानत करके और न ही किसी का दिल दुखाकर । धन को कमाने के बाद उसका संग्रह आवश्यक समझा जाता है जिसको हम बचत करना कहते हैं । यह बचत  भविष्य में पड़ने वाली धन की आवश्यकता को ध्यान में रखकर की जाती है । बचत करना किसी भी रूप में हो सकता है । प्रायः लोग बचत करने के साथ साथ धन में सतत वृद्धि भी होती रहे,ऐसा सोचते हैं । यह भी किसी रूप में अनुचित नहीं है । धन का निवेश बचत के लिए और धन में वृद्धि के लिए किया जाये तो उत्तम है । इस धन के निवेश को सृजन कहते हैं । सृजन से धन में वृद्धि भी होती रहती है और भविष्य की सुरक्षा भी । सृजन करने के कई तरीके होते हैं । प्रायः व्यक्ति अपनी बचत का धन भूमि आदि खरीदने में लगाता है या कोई कीमती धातु आदि खरीद कर रख लेता है जिसे आवश्यकता के समय बेचकर उस धन को उपयोग में लाया जा सकता है । यह तरीका सुरक्षित भी है और सही भी । कुछ व्यक्ति लोभवश किसी जरूरतमंद व्यक्ति को अपन धन उच्च ब्याजदर पर उपलब्ध करवाते है । यह रास्ता अनुचित भी है और सुरक्षित भी नहीं है । अतः ऐसे रास्ते में किये जाने वाले धन के निवेश के परिणाम प्रायः दुखद ही होते हैं ।
                                         धन एक प्रकार से व्यक्ति की सेवा के लिए होता है न कि व्यक्ति उस धन की सेवा करने लग जाये । धन से व्यक्ति को सुख के साधन प्राप्त होते हैं परन्तु जब धन को केवल संग्रहित ही ककरने लग जाएँ और उससे सुख प्राप्त करने के लिए व्यय न करे तो ऐसी स्थिति में यही धन आपके लिए दुःख का कारण बन जाता है । व्यक्ति को दिनरात उसकी सुरक्षा की चिंता रहती है और इस चिंता में उसके भौतिक शरीर का क्षय होने लगता है । इसलिए आवश्यक है कि धन को केवल उपार्जित और संग्रहित करने में ही न लगे रहे बल्कि उसका सदुपयोग भी साथ साथ करते रहें । धन के सदुपयोग से आपको शारीरिक सुख के साथ साथ मानसिक शांति भी प्राप्त होगी । ऐसे में जो मानसिक शांति प्राप्त होती है वह अमूल्य होती है ।
                         संस्कृत का एक बहुत ही लोक प्रिय श्लोक है -
                                अलसस्य कुतो विद्या,अविद्यस्य कुतो धनम् ।
                                अधनस्य कुतो मित्रम्,अमित्रस्य कुतो सुखम् ॥
अर्थात,जो कार्य करने में आलसी है वह विद्या प्राप्त नहीं कर सकता ,बिना विद्या के धन की प्राप्ति होना असंभव है ,बिना धन पास में हुए कोई भी मित्रता नहीं रखेगा और बिना किसी मित्र के सुख कैसे मिल सकता है ? आपके पास अगर धन संग्रहित किया हुआ है तो आपके पास मित्रों की कोई कमी नहीं होगी । मित्र आपके सुख-दुःख के साथी होते है ,इसीलिए यह कहा जाता है कि मित्र ही सुख प्रदान कर सकता है । चूँकि धन के कारण ही आपको मित्र मिलते है इसी लिए धन को ही मनुष्य का सबसे अच्छा मित्र कहा गया है ।
क्रमशः
                                       ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Wednesday, June 25, 2014

धन |-४

                             धन को उपार्जित करने के कई तरीके हैं । बिना मन की उपस्थिति के केवल तन के द्वारा पुरुषार्थ कर धन का उपार्जन असंभव है । अतः धन कमाने के लिए व्यक्ति की मानसिक अवस्था का सही होना आवश्यक है । जब तक मन का तन के साथ सही सामंजस्य नहीं होगा तब तक व्यक्ति चाहे कितना ही प्रयास करले,अर्थार्जन की सही राह पकड़ ही नहीं सकता । बिना मन और पुरुषार्थ के पास में आई धन संपदा भी हाथ से निकल सकती है । केवल अर्थाभाव को हम भाग्य का खेल कहकर चुप नहीं बैठ सकते । हाँ,कुछ हद तक यह भाग्य का खेल है भी,परन्तु भाग्य भी तो पूर्वजन्म में किए गए प्रयास और पुरुषार्थ से ही तो निर्मित होता है । अतः धन उपार्जन का सीधा सम्बन्ध इस तन और मन दोनों से ही है । इसी लिए इन तीनों,तन,मन और धन की संगति कही जाती है । इन तीनों का आपस में इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि एक की अनुपस्थिती दूसरे के अस्तित्व के लिए प्रश्नचिन्ह बन जाती है,एक के बिना दूसरे का अस्तित्व भी संकट में पड़ सकता है  और व्यक्ति का इस संसार में जीना तक कठिन हो जाता है ।
                           हमारी सबसे बड़ी कमी यह है कि हमारे इस जीवन के लिए जिन तीन तत्वों की महत्वता है ,उन्ही को हम निन्दित करते आये हैं । तन,मन और धन की निंदा क्यों करते हैं,मैं आज तक समझ नहीं पाया हूँ । संसार में सभी व्यक्ति इन तीनों का उपयोग करते आये हैं और साथ ही साथ निंदा भी । उपयोग में आने वाले तत्वों की निंदा करना-मेरी तो समझ से बाहर है । बिना तन रुपी मशीन के जीवन संभव नहीं है ,बिना मन के कर्म संभव नहीं है और बिना धन के इस तन और मन को किसी कर्म के लिए सुरक्षित रखना मुश्किल है । ये तीनो तत्व एक दूसरे के पूरक भी हैं और आपस में सम्बंधित भी । अतः इनके महत्त्व को देखते हुए इनकी निंदा करनी अनावश्यक है ।
                   गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं-
                               कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
                               लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ गीता ३/२० ॥
अर्थात,जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे । इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने को ही योग्य है अर्थात तेरे लिए कर्म करना ही उचित है ।
                                      यहाँ भगवान स्पष्ट रूप से कहते हैं कि परम सिद्धि के लिए भी कर्म करना आवश्यक है और लोक संग्रह की दृष्टि से भी कर्म करना उचित है । लोक संग्रह अर्थात अर्थोपार्जन और उसका सृजन व संग्रह । भगवान ने कहीं भी अर्थार्जन यानि धन कमाने और उसको संगृहित करने को अनुचित नहीं बताया है बल्कि इसे उचित ही कहा है ।अतः किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह इस धन के उपार्जन और संग्रह को निन्दित करे ।
                        फिर भी धन निन्दित है ,इसका कारण उसके अर्जित करने के तरीके,सृजित करने के उद्देश्य और विसर्जन करने के तौर तरीके में छुपा हुआ है । जब तक हम धन शास्त्रोक्त तरीके से उपार्जित नहीं करेंगे तब तक इसकी निंदा होगी । आज संसार में प्रत्येक व्यक्ति इसको येन केन प्रकारेण कमाने में लगा है । इसके लिए वह चोरी करना,झूठ बोलना और अतिरिक्त लाभ के लिए अनुचित रूप से आवश्यक वस्तुओं की कमी कर देना  और जरुरतमंदों को ऊँची कीमत लेकर बेचना,किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर धन कमाना , दूसरे की सम्पति को छीन लेना आदि गलत तरीके है और ऐसे धन के उपार्जन की निंदा आवश्यक है ।
क्रमशः
                                     ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Tuesday, June 24, 2014

धन |-३

                                   इस कहानी के आधार पर हम धन में आसक्ति को समझ सकते हैं । "९९ का फेर " धन में आसक्ति होने का सबसे बड़ा प्रमाण है । जब तक मनुष्य की गांठ में धन नहीं होगा तब तक उसमे आसक्ति होने का प्रश्न ही नहीं होता । आसक्ति किसी भी वस्तु में हो,सबसे अनुचित है । क्योंकि आसक्ति व्यक्ति की मनोदशा ही बदल डालती है । इस आसक्ति के कारण व्यक्ति दिनभर उलझन में फंसा रहता है जिस कारण वह न तो दिन में चैन से बैठ पाता है और न ही रात को चैन से सो पाता है ।
                            जिंदगी में धन उपार्जन करना कोई मुश्किल काम नहीं है । ईश्वर ने सुगठित तन व्यक्ति को पुरुषार्थ करने के लिए ही दिया है और पुरुषार्थ कर व्यक्ति धन अर्जित कर सकता है । प्रत्येक व्यक्ति जिंदगी में इतना धन कमाना चाहता है जिससे उसका जीवन सुखद बन सके । परन्तु क्या और कहाँ तक सीमा है उस धन की,जो उसके जीवन को सुखी रख सके ? धन को व्यक्ति अर्जित कर सृजित और संरक्षित करता है,भविष्य में विसर्जन के लिए ,अपने उपयोग के लिए। परन्तु जब वह एक सीमा तक धन को इक्कट्ठा कर लेता है तब उसे इसी धन के कम हो जाने का भय सताता है । धन एक ऐसी सम्पति है जिसमे स्थायित्व का अभाव है । यह आवागमन के गुण से युक्त है । आज आपके पास जो धन-सम्पति है,कल वह किसी अन्य के पास थी और भविष्य किसी और व्यक्ति के हाथों में होगी ।इसी कारण से मन की तरह धन को भी चंचल कहा गया है । स्थाई रूप से यह एक जगह नहीं रूकता ।
                              धन के इसी लक्षण को जानते और समझते हुए भी व्यक्ति यह भ्रम पाल लेता है कि वह इसको स्थाई रूप से अपने पास रख सकता है । इसलिए वह आपने पास सृजित धन को स्थायित्व प्रदान करने के लिए इस तन से कठोर पुरुषार्थ करता रहता है । जिस कारण से उसका तन धीरे धीरे क्षय होता रहता है । इस बात का अनुमान उस व्यक्ति को नहीं होता । तन ,एक दिन बीमार हो जाता है और जिस धन को सुख के लिए सृजित किया गया था वह दवाओं की भेंट चढ़ जाता है । तन को परेशानी तो उठानी ही पड़ती है साथ ही साथ व्यक्ति की मनोदशा भी ख़राब हो जाती है । यही सृजित धन अब सुख के स्थान पर दुःख का कारण बन जाता है ।
                             अतः आज आवश्यकता इस बात कि है कि प्रत्येक व्यक्ति यह समझे कि धन उपार्जन और सृजन करना कतई अनुचित नहीं है । परन्तु साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि कहीं इस धन के उपार्जन,सृजन और संरक्षण के पीछे हम अपने बहुमूल्य तन को तो नहीं गवां रहे है ? बुजुर्गों ने कितना सत्य कहा है कि-"पहला सुख निरोगी काया,दूसरा सुख घर में माया ।"अर्थात यह तन निरोग रहेगा तो यह सबसे बड़ा सुख होगा । शरीर रोगमुक्त है तभी अर्जित और सृजित धन सुख प्रदान कर सकता है अन्यथा तो धन दुखदायी ही साबित होगा ।
क्रमशः
                                 ॥ हरिः शरणम् ॥