Friday, February 28, 2014

भय की समाप्ति |

                                            एक बार एक राज्य में बड़ा ही बलवान पहलवान रहा करता था |उसकी पहलवानी के किस्से दूर दूर तक मशहूर थे |उस जैसा पहलवान आस पास के किसी भी राज्य में नहीं था |उसको अपनी पहलवानी का बड़ा गुमान था |उसने पूरे राज्य में एलान करवा रखा था कि पहलवानी में उसे कोई भी शिकस्त नहीं दे सकता |उसने आस पास के सभी राज्यों में मुनादी करवा दी कि उसे अखाड़े में जो कोई भी हरा देगा ,वह उसी दिन से पहलवानी छोड़ देगा और उस हराने वाले की गुलामी कबूल कर लेगा |मुनादी वाले दिन ही उस राज्य से एक संत गुजर रहे थे |उन्हें उस पहलवान का यह अहंकार अनुचित लगा |उन्होंने पहलवान की अखाड़े में कुश्ती लड़ने की चनौती स्वीकार करने के साथ साथ  उसे हराने की घोषणा भी कर दी |
                                     अब वे ठहरे एक संत |बिलकुल एक सींकिया पहलवान |लोगों ने संत को समझाया भी कि वह बड़ा खतरनाक पहलवान है |आप क्यों अपनी हड्डी पंसली एक करने पर तुले है ?आप तुरंत ही इस चुनौती को वापिस ले लें |लेकिन संत तो मन में जैसे कुछ और ही ठानकर बैठे थे |अखाड़े में भिड़ने का दिन तय हो गया |निश्चित दिन और स्थान पर तमाशा देखने को भीड़ जुट गई |तय समय से पहले ही संत पहुँच गए वहाँ,उस अखाड़े में |जाते ही अखाड़े के ठीक बीचों बीच पीठ के बल सीधे लेट गए |पहलवान आया और उन्हें कुश्ती के लिए भिडने की चुनौती देने लगा |संत निर्विकार भाव से पूर्ववत अखाड़े के बीच ही लेटे रहे |पहलवान ने उन्हें फिर से चुनौती दी |संत बोले-"भिडने से कौन इंकार कर रहा है?आ, मुझ से भिड़,और कर दे मुझे चित्त |" पहलवान ने कहा -"उठ |आकर मुझ से भिड़|" संत फिर उसी अंदाज़ में बोले-"अरे!जीतने का शौक तो तुझे है और जिसको जीतना है,वह आये और भिडे |" पहलवान यह सुनकर अपने बाल नोचने लगा |बोला-"आप तो पहले से ही चित्त हुए अखाड़े में लेटे हैं ,चित्त हुए को चित्त कैसे किया जा सकता है ?"
                                        संत बोले-"इसका मुझे पता नहीं |अगर जीतना है ,तो आकर मुझे चित्त कर | तब ही मैं अपनी हार मानूँगा  |"पहलवान ने लाख कोशिशे की परन्तु संत तो टस से मस नहीं हुए |अंत में पहलवान ने अपनी हार मान ली | वह पहलवान उन संत से भिड़ ही नहीं सका था |बिना लड़े-भिडे कैसी जीत |इस तरह वह संत को कुश्ती में  हरा नहीं सका | बिना लड़े-भिडे कौन किसको और कैसे हरा सकता है ?इस कहानी में हार हुई-पहलवान के अहंकार की और जीत हुई संत के भय-मुक्त मन की | यद् रखना,केवल भौतिकता  ही हार-जीत का मापदंड नहीं होती |
                                           यहाँ आकर यह कहानी समाप्त हो जाती है और संत हमें एक महत्वपूर्ण सन्देश दे जाते हैं कि जिंदगी में हार-जीत का ख्याल मन से निकाल दो, सुख-दुःख का मत सोचो, पाने-खोने की कभी भी चिंता न करे ,भय अपने आप दिल से निकल जायेगा | भय-मुक्त व्यक्ति ही जिंदगी में कभी भी नहीं हारेगा ,कभी भी दुःख उसके द्वार पर नहीं झांकेगा | इस संसार में हमेशा दो पहलू साथ-साथ रहेंगे | यथा-हार-जीत,सुख-दुःख,पाना-खोना,जीना-मरना आदि |अगर आपको भयमुक्त होना है तो जो आप अपने साथ होने देना नहीं चाहते है ,उसे भी ह्रदय से स्वीकार करना सीखो |अगर आप कोई काम शुरू कर रहे हैं तो आप उस कार्य में निम्नतम आपके साथ क्या हो सकता है उसको प्राप्ति के रूप में स्वीकार करना सीखो |फिर आपको किसी भी प्रकार का भय नहीं सताएगा |इस कहानी में संत शुरु से  ही जानते थे कि पहलवान को हराना उनके लिए संभव नहीं है |इसलिए उन्होंने पहले ही परिणाम को समझते हुए स्वीकार कर लिया और भयमुक्त हो गए |उन्हें अपनी बहादुरी का कोई भ्रम नहीं रहा |इसी कारण से भय मुक्त होकर ही उन्होंने अपनी जीत हासिल की|आप कहेंगे,बिना लड़े भी कभी कोई जीत होती है | मैं भी कहता हूँ कि कोई जीत बिना संघर्ष के कैसे हो सकती है ?परन्तु यहाँ जीत हो रही है ,मन पर छाये भय से और जिसने मन के भय को जीत लिया,फिर उसे संसार की कोई ताकत हरा नहीं सकती |इस संसार में जीतता वही है जो अपने भीतर के भय को समाप्त करदे | भय-मुक्त जीवन ही उन्मुक्त-जीवन है |भयरहित जीवन ही वास्तविक जीवन है |
                                             || हरिः शरणम् || 

Thursday, February 27, 2014

भय का विश्लेषण |

          भय हमारे मन-मस्तिष्क को अवरुद्ध कर देता है और हम गलत निर्णय लेने लगते हैं। इसलिए अपने प्रति सजगता रखें, ताकि डर का कारण समझ कर अभय प्राप्त कर सकें। आइये, देखें , क्या है इस सम्बन्ध में जाने-माने विचारक और दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति का चिंतन..
             हमें डर लगता है। केवल बाहरी कारणों से ही नहीं, अपने अंदर से भी। नौकरी-धंधा छूट जाने का डर, भोजन-पानी से महरूम हो जाने का डर, पद को गंवा देने का डर,अफसरों के फटकारे जाने का डर..। तरह-तरह के बाहरी डर बने ही रहते हैं। इसी तरह हम अंदर से भी डरे रहते हैं - सफल न हो पाने का डर, मौत का डर, अकेलेपन का डर, प्यार न मिलने का डर आदि।
               सबसे पहले शारीरिक डर आता है, जो दैहिक प्रतिक्रिया है। हममें बहुत कुछ पशुओं जैसा ही होता है। हमारी दिमागी संरचना का एक बड़ा हिस्सा किसी पशु के दिमाग जैसा ही है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। पशु लोलुप होता है। उसे पुचकारा जाना, थपथपाया जाना अच्छा लगता है। ऐसा ही हम मनुष्यों के साथ भी है। पशु समूह में रहना पसंद करते हैं, मनुष्य भी। पशुओं की अपनी एक सामाजिक संरचना होती है, मनुष्य की भी। हममे बहुत कुछ अभी भी पशुवत ही है।
                  अब प्रश्न उठता है कि क्या हम पशु से विरासत में पाए प्रभाव और मानवीय समाज की सभ्यता-संस्कृति से अपने पर पड़े प्रभावों से मुक्त हो सकते हैं? क्या यह संभव है कि हम पशु-वृत्तियों से ऊपर उठ पाएं? एक जुबानी जिज्ञासा के समाधान के रूप में ही नहीं, बल्कि यथार्थ में यह खोज पाएं कि क्या हमारा मन उस समाज के प्रभाव से, उस संस्कृति के प्रभाव से परे जा सकता है, जिसमें हम पले-बढ़े हैं? क्योंकि जो है, उससे बिल्कुल भिन्न आयाम की स्थिति की संभावना के लिए भयमुक्त होना आवश्यक है।
               यह बात साफ है कि आत्मरक्षा यानी अपनी देह की रक्षा के लिए की गई प्रतिक्रिया डर नहीं होती। रोटी, कपड़ा और मकान, यह हम सभी की जरूरत है, केवल अमीर लोगों की ही नहीं। ये डर तो बुद्धिसंगत हैं, समस्या तो वे डर हैं, जो इनसे इतर दिमागी फितूर होते हैं।
               इसलिए मनुष्य को इन डरों से भी मुक्त होना होगा। परंतु यह बहुत ही कठिन है, क्योंकि अधिकांशत: हम जान ही नहीं पाते कि हम डरे हुए हैं। कई बार यह भी नहींजानते कि हम किस बात से डरे हैं। यदि हम जान भी जाएं, तब करें क्या, यह नहीं जानते। अत: हम जो हैं, उससे दूर भागने लगते हैं। पलायन करने लगते हैं। डर तो हमारे अंदर ही हैं, भागकर जहां भी जाएंगे डर बढ़ा हुआ मिलेगा। दुर्भाग्यवश हमने पलायनों का एक जाल फैला लिया है।
            आने वाले कल का डर, रोजी-रोटी छूट जाने का डर, रोगग्रस्त हो जाने का डर, दर्द का डर। डर में बीते हुए और आने वाले समय के विषय में विचारों की एक प्रतिक्रिया समाई रहती है। डर आता कैसे है? डर का हमेशा किसी न किसी चीज से संबंध होता है, वरना डर होता ही नहीं। विचार है डर का जन्मदाता।
            मैं अपनी नौकरी या काम-धंधा छूट जाने के बारे में या इसकी आशंका के बारे में सोचता हूं और यह सोचना, यह विचार डर को जन्म देता है। इस प्रकार विचार खुद को समय में फैला देता है, क्योंकि विचार समय ही है। मैं कभी किसी समय जिस रोग से ग्रस्त रहा, मैं उस विषय में सोचता हूं, क्योंकि उस समय का दर्द या बीमारी का अहसास मुझे अच्छा नहीं लगता, इसलिए मैं डर जाता हूं कि मुझे फिर वही बीमारी न हो जाए। दर्द का एक अनुभव मुझे हो चुका है, उसके विषय में विचारना और उसे नापसंद करना डर पैदा कर देता है। डर का सुख-विलासिता से करीबी रिश्ता है, निकट का संबंध है। हममें से अधिकांश लोग सुख-विलास से प्रेरित रहते हैं, संचालित रहते हैं। किसी पशु की भांति ऐंद्रिक सुख हमारे लिए सर्वोच्च महत्व रखते हैं। यह सुख विचार का ही एक हिस्सा होता है। जिस चीज से सुख मिला हो, उसके बारे में सोचने से सुख मिलता है। क्या आपने ध्यान दिया है, आपको किसी ऐसे इंद्रिय सुख का अनुभव हुआ हो, तो उसके बारे में सोचना, उस सुख को बढ़ा देता है। जैसे आपके द्वारा अनुभूत किसी पीड़ा के बारे में सोचना डर पैदा करता है, उसी तरह।
              अतएव विचार ही मन में पैदा होने वाले सुख का या डर का जनक है। विचार ही सुख की मांग करने और उसकी निरंतरता चाहने के लिए जिम्मेदार है। वह भय को जन्म देने के लिए, डर का कारण बनने के लिए जिम्मेदार है। मैं यह सब जानता हूं, पर क्या ऐसा संभव है कि सुख या दुख-दर्द के बारे में मैं सोचूं ही न? क्या यह संभव है कि जब विचारणा की जरूरत हो तब ही सोचा जाए, अन्यथा बिल्कुल नहीं? जब आप किसी दफ्तर में काम करते हैं, आजीविका में लगे होते हैं, तब विचार जरूरी होता है, वरना आप कुछ नहीं कर सकेंगे। जब आप बोलते हैं, लिखते हैं, बात करते हैं, कार्यालय जाते हैं, तब विचार जरूरी होता है। वहां विचार को ऐन सही ढंग से, निर्वैयक्तिक रूप से काम करना होता है। वहां उसे किसी आदत के हिसाब से नहीं चलना होता। वहां विचार सार्थक है, परंतु क्या किसी भी अन्य क्रिया के क्षेत्र में विचार आवश्यक है?
                इसे समझें। हमारे लिए विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमारे पास यही तो एकमात्र उपकरण है। यह विचार उस स्मृति की प्रतिक्रिया है, जो अनुभव, ज्ञान और परंपराओं द्वारा संचित कर ली गई है। स्मृति होती है समय का परिणाम। इसी पृष्ठभूमि से हम प्रतिक्रिया करते हैं। यह प्रतिक्रिया विचारगत होती है। विचार कुछ निश्चित स्तरों पर तो जरूरी होता है, परंतु जब यह बीते और आने वाले समय में, अतीत और भविष्य में स्वयं को मानसिक तौर पर फैलाने लगता है, तब यह डर पैदा करता है और सुख भी। परंतु इस प्रक्रिया में मन मंद हो जाता है और इसी वजह से अपरिहार्यत: अकर्मण्यता आ जाती है।
              डर विचार की पैदाइश है, तो क्या विचार आत्मरक्षात्मक रूप से भविष्य के विषय में सोचना बंद कर सकता है? चीजों, व्यक्तियों और विचारों पर निर्भरता भय को जन्म देती है। निर्भरता उपजती है अज्ञान से, खुद को न जानने के कारण। डर, दिल-दिमाग की अनिश्चितता का कारक बनता है और यह अनिश्चितता संप्रेषण और समझ-बूझ में बाधक बनती है। 'स्व' के प्रति सजगता द्वारा हम खोजना शुरू करते हैं और इससे डर की वजह को समझ पाते हैं - केवल सतही डरों को ही नहीं, बल्कि गहरे कारणों से उत्पन्न और सदियों से सँचित डरों को भी। डर अंदर से भी पैदा होता है और बाहर से भी आता है। यह अतीत से जुड़ा होता है। अत: अतीत से विचार भावना को मुक्त करने के लिए अतीत को समझा जाना आवश्यक है और वह भी वर्तमान के माध्यम से। अतीत सदैव वर्तमान को जन्म देने को आतुर रहता है जो 'मुझे', 'मेरे' और 'मैं' की तद्रूप स्मृति बन जाता है। यह सारे भय का मूल है।
               || हरिः शरणम् ||

Wednesday, February 26, 2014

भय का कारण |

                                             चाहे कोई कितना ही प्रयास करले भय से मुक्त होना आसान नहीं है |जब तक भय से मुक्त नहीं हो पाओगे तब तक भ्रम-जाल से निकल नहीं पाओगे|भ्रम-जाल में केवल छटपटाहट ही है,आनंद कहीं नहीं |आनंद तो भ्रम-जाल से मुक्त होने पर ही उपलब्ध होता है |जिस किसी को भी आप कहेंगे कि आपको भय है ,आप डरते हैं ,तब वह व्यक्ति अपने आप को बहादुर दिखाने का प्रयास करेगा |वास्तविकता में वह बहादुर होता नहीं है बल्कि बहादुर होने का उसे भ्रम ही होता है |जो भी अपने आपको बहादुर और भय-मुक्त प्रदर्शित करता है ,समझ लो वह वास्तव में सबसे ज्यादा भय ग्रस्त है |वह इस बहादुरी का भी भयवश एक भ्रम पाले हुए है अन्यथा बहादुरी  प्रदर्शित करने की कोई आवश्यकता भी नहीं है |
                                                अब हम जानने का प्रयास करेंगे कि भय मन से निकलने के स्थान पर दिन प्रतिदिन बढता ही क्यों जाता है ?भय का कारण क्या है,उसका भोजन क्या है, जो उसका निरंतर पोषण करता रहता है ?इस संसार में शिशु जब जन्म लेता है,तब वह भयरहित होता है |उसे किसी भी बात का भय नहीं सताता है |फिर बड़ा होकर वह इतना भयग्रस्त क्यों हो जाता है?जीवन के प्रारंभ से ही हम बच्चे को भयग्रस्त करना शुरू कर देते है |प्रारम्भ हम करते है अँधेरे के भय से,भूत के भय से |जबकि हम सभी जानते हैं की अँधेरे से भय किस काम का |और भूत का.....किसने देखा है आज तक उसे ?जिसने भी देखा है या देखने का दावा करता है क्या उसने किसी को भूत दिखाया भी है?अगर नहीं तो फिर भूत के अस्तित्व को स्वीकार भी किस आधार पर किया जाये |परन्तु इनके भय से बच्चे में भय का और भ्रम का बीजारोपण अवश्य हो जाता है |बड़ा होने पर वह इनसे भय खाना तो बंद कर सकता है,परन्तु एक बार जो उसके मन में भय का बीजारोपण जो हो गया है वह ताउम्र कभी भी खत्म नहीं होगा |
                              अब युवावस्था आते आते कुछ खोने का भय उसमे स्थान बना लेता है |और उस भय का पोषण करती है मन में पैदा होने वाली कामनाएं और इच्छाएं|अगर कुछ कामनाएं पूरी हो भी गई तो उनके खोने का भय सताता है |बेटा हो गया तो उसके अस्वस्थ हो जाने का भय,अच्छी बहु मिल गई तो बेटे के खो जाने का भय,पैसा कमा लिया तो उसके खो जाने का भय ,अगर आर्थिक रूप से सबल हो गए तो उस स्थान पर बने रहने का भय .....और अंत में सब कुछ पा लिया तो मर जाने पर इन सबके खो जाने का भय |इस प्रकार उसकी ये सब कामनाएं उसमे अपने प्रति एक मोह पैदा करदेती है |यह मोह ही भय का सबसे बड़ा कारण है |
                                       समस्त भय और भ्रम के मूल में यह मोह ही होता है,यह चाह ही होती है |चाह और मोह भी एक दूसरे के पूरक हैं |चाह पूरी हुई तो प्राप्त फल के साथ मोह और अगर चाह पूरी न हुई तो उस चाह का मोह |भय चाह पूरी न होने का या फिर चाह के उपरांत मिले फल के साथ मोह पैदा हो जाने से उस फल के खो जाने का भय |इस तरह यह चाह,मोह,भय ,भ्रम और फिर से एक नई चाह -इस तरह  कभी भी न टूटने वाला चक्र बन जाता है |यही भ्रम-जाल है |
                                  इस प्रकार हमने जाना कि भय का मूल कारण संसार से उत्पन्न चाह और संसार के प्रति मोह होना ही है |जिस दिन व्यक्ति के मन से समस्त चाह, इच्छाएं, अपेक्षाएं और कामनाएं नष्ट हो जायेगी तब मोह भी समाप्त हो जायेगा,भय भी समाप्त हो जायेगा और इनसे पैदा हुआ भ्रम भी |
                       || हरिः शरणम् || 

Tuesday, February 25, 2014

मृत्यु-भय |

                                  महाभारत युद्ध के प्रारंभ होने से पहले जब अर्जुन ने अपने सारथी श्रीकृष्ण को कहा कि रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलिए,मैं समग्रता के साथ देखना चाहता हूँ कि कौन कौन इस युद्ध मैदान में किस किस के सामने आ खड़े हुए हैं ? इस स्थिति में मात्र यही समझा जायेगा कि अर्जुन अपनी और अपने दुश्मन की सेनाओं का आकलन करेगा और उसी के अनुरूप ही अपनी युद्ध-नीति को निर्धारित करेगा |युद्ध-भूमि में आने तक अर्जुन के मन में किसी भी प्रकार की दुर्लबता नहीं थी | लेकिन जब उसने युद्ध-भूमि में अपने ही परिजनों को अपने दुश्मनों के रूप में देखा तब उसमे एक उनके प्रति प्रकार का मोह पैदा हुआ |आप जिससे मोह करने लगते हैं ,उसकी कुशलता को लेकर आप सदैव ही चिंतित रहते हैं | यह चिंता अपने परिजनों की मृत्यु को लेकर भय पैदा करती है और यह भय ही कायरता को जन्म देता है | मोह और भय दोनों मिलकर व्यक्ति को भ्रमित कर देते हैं |यह भ्रम फिर मनुष्य की सोचने और समझने की क्षमता को भी भ्रमित कर देता है |अर्जुन भी इसी प्रकार भ्रम-जाल में उलझ गया |वह भ्रमित होते हुए युद्ध के परिणाम को अलग ही सन्दर्भ में देखने लगा | तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसके भ्रम को तोड़ने का निर्णय लिया |
                    गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को इस अज्ञान के बारे में समझाते हुए कहते है-
                                    अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषस्य |
                                    गतासूनगतासूंश्च    नानुशोचन्ति   पण्डिताः || गीता २/११||
                           अर्थात्,हे अर्जुन ! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पंडितों के से वचनों को कहता है ;परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं ,उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं ,उनके लिए भी पंडितजन शोक नहीं करते हैं |
                     गीता का समस्त ज्ञान मनुष्य के भय और भ्रम को दूर करने के लिए ही है |मैंने पहले ही यह स्पष्ट किया था कि मृत्यु का भय मनुष्य को सबसे अधिक होता है ,चाहे वह मृत्यु स्वयं की हो,परिजनों की हो या अन्य किसी की |इस भय से दूर भागने के लिए वह भ्रम का सहारा लेता है |उस मृत्यु का भय दूर करने के लिए वह मृत्यु से बचने की कोशिश करता है |जिस कारण से ही वह दूसरे क्रिया-कलापों का सहारा लेता है,जैसे मनोरंजन करना ,सांसारिक कार्यों में उलझे हुए रहना,पुस्तके पढते हुए ज्ञानार्जन करना आदि | परन्तु वह इन सब के बाद भी मृत्यु के भय से मुक्त नहीं हो पाता है |श्रीकृष्ण यहाँ पर अर्जुन को यही समझा रहे हैं कि किसी की भी मृत्यु का शोक करना उचित नहीं है |जो मर चुके हैं उनके लिए शोक करने का कोई औचित्य नहीं है और जो जिन्दा है उनके लिए भी किसी प्रकार का दुःख न करे,क्योंकि उन्हें भी एक न एक दिन मरना ही है |इसलिए किसी के भी लिए शोक न कर,क्योंकि मनुष्य शोक करने के योग्य ही नहीं है |भगवान यहाँ यही कहना चाहते हैं कि जिसने यहाँ जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी होना निश्चित है |अतः तू शोक न करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक क्यों कर रहा है ?
                                  एक गडरिया था | वह प्रतिदिन एक भेड़ को काटकर उसका मांस बेचा करता था |  उसके जीवनयापन के लिए यह आवश्यक भी था |जब वह किसी एक भेड़ को पकड़ने आता तो सभी भेड़े उससे दूर भागती |जिससे उसे किसी एक भेड़ को पकडने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती |इससे परेशान होकर वह अपने गुरु के पास गया |गुरु ने कहा कि प्रत्येक जीव की यह मानसिकता होती है कि वह मृत्यु के भय से भागता है |तुम अपनी प्रत्येक भेड़ को अलग से ले जाकर यह समझा दो कि मैं तुम्हे नहीं मारूंगा,किसी अन्य को ही पकड़ कर मारूंगा | गुरु की बात मानते हुए गडरिये ने सभी भेड़ों को अलग अलग लेजाकर प्रत्येक के कान में यह बात कह दी |दूसरे दिन जब वह गडरिया किसी एक भेड़ को मारने के लिए पकडने को आया तो सब भेड़े खड़ी खड़ी आराम से चरती रही |उसने आसानी के साथ एक भेड़ को पकड़ लिया |उसे आश्चर्य हुआ कि आज भेड़े उससे बचने के लिए इधर उधर नहीं भागी |कारण क्या था ,आप समझ ही गए होंगे ?प्रत्येक भेड़ यह सोच रही थी कि मुझे तो यह गडरिया मारेगा नहीं,क्योंकि उसने मुझे न मारने का आश्वासन दे रखा है |यह भ्रम भेड़ों की भयमुक्ति के लिए काफी था | परन्तु वह पशु है और मनुष्य एक इंसान | फिर भी मनुष्य भी ऐसे ही भ्रम में जी रहा होता है कि मेरी मृत्यु अभी कहाँ ? मर तो अन्य लोग रहे हैं |परन्तु यह मात्र भय से मुक्त होने के लिए भ्रम मात्र है , भय कही भीतर बैठा साँस ले रहा है |इस भ्रम से मुक्ति के लिए संत यही कहते हैं कि मृत्यु शाश्वत सत्य है,इससे भागो मत |मृत्यु का शोक मत करो |मृत्यु को सदैव याद रखें |
                             अब प्रश्न यह उठता है कि मृत्यु का शोक नहीं करें,तो क्या हम भयमुक्त हो जायेंगे ? नहीं, बिलकुल भी नहीं |मृत्यु को जब तक हम समझ नहीं पाएंगे तब तक इस भ्रम से निकल पाना मुश्किल है |सभी संत लोग कहते हैं कि मृत्यु को सदैव याद रखे |उनका कहने का अर्थ साफ है कि मृत्यु कभी भी आ सकती है क्योंकि यह शाश्वत सत्य है |अतः इससे डरे नहीं बल्कि इसको समझे | मृत्यु को एक अवस्था की तरह समझना-जैस बालक,युवा ,प्रोढ,वृद्धावस्था और अंत में शरीर की मृत्यु और फिर नया शरीर | जिस दिन मृत्यु को आप समझ लेंगे तब आपके मन से भय और भ्रम दोनों ही समाप्त हो जायेंगे | भय और भ्रम के जाते ही सत्य आपके सामने होगा | वही सत्य आपको अपनी वास्तविकता से परिचय करायेगा |
                                  || हरिः शरणम् ||

Monday, February 24, 2014

मोह-भ्रम |

                                    संसार में जितनी भी भ्रांतियां है ,उन सबके मूल में भय है | यह भय न जाने कितने कारणों से पैदा होता है |परन्तु भय के पैदा हो जाने पर व्यक्ति को ऐसा भ्रम होता है मानो वह जो भी विचार कर रहा है,वही सत्य है |भ्रम, सत्य का विलोम ही तो है |आप भ्रम को ही एक सत्य के रूप में प्रस्तुत करने लगते है | अपने एक भ्रम को सत्य साबित करने के लिए वह दूसरा भ्रम पाल लेता है | सैकड़ों भ्रम एक साथ भी मिल जाये तो भी वे कभी भी एक सत्य नहीं बन सकते |यह भ्रम व्यक्ति की पलायनवादी मानसिकता को ही दर्शाता है |
                  भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं-
                                   कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |
                                   अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन            || गीत२/२||
                                   क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते |
                                   क्षुद्रं   हृदयदौर्बल्यं   त्यक्त्वोत्तिष्ठ   परन्तप || गीता २/३||
                  अर्थात्,हे अर्जुन!तुम्हे इस असमय में यह मोह किस हेतु से उपलब्ध हुआ ? क्योंकि यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है , न स्वर्ग को देनेवाला है और न ही कीर्ति करने वाला है | हे अर्जुन!नपुसंकता को मत प्राप्त हो,तुझमे यह उचित नहीं जान पड़ती |हे परंतप !ह्रदय की इस तुच्छ दुर्लबता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़ा हो जा |
                  श्रीमद्भागवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से यही श्लोक सबसे पहले निकले हैं |जब अर्जुन अपनी विरोधी सेना में अपने ही भाई-बंधुओं,सगे-सम्बन्धियों और नाते-रिश्तेदारों को ही देखता है ,तो उसके मन में युद्ध न करने के भाव आ जाते हैं | वह सोचने लगा था कि अपने भाइयों को मारकर अगर उसे सारा साम्राज्य मिल भी गया ,तो भी वह मेरे लिए नरकगामी ही होगा |अतः वह युद्ध नहीं करना चाहता था |वह अपने इस विचार को शास्त्रोक्त बता रहा था |यह अर्जुन का ज्ञान के प्रति असमय पैदा हुआ मोह था |अर्जुन एक योद्धा था और युद्ध करना ही उसका धर्म था |युद्ध न करना उसको बदनाम कर सकता था |इस कारण से इसे अर्जुन की दुर्लबता कहा गया है |अर्जुन में यह मोह और दुर्लबता ,दोनों ही भय के कारण पैदा हुए | वह भय था-अपने ही हाथों होने वाली परिजनों की मृत्यु का |इस भय ने उसके मस्तिष्क में एक प्रकार का भ्रम पैदा कर दिया | उस भ्रम के कारण ही उसे शास्त्र ज्ञान याद आया, जिससे वह अपने निर्णय को सत्य साबित कर सके |जबकि वास्तविकता यह थी कि एक योद्धा होने के कारण शास्त्रोक्त यही था कि वह युद्ध करे | परन्तु भ्रम के कारण वह युद्ध न करने को सही बता रहा था | जबकि युद्ध न करना एक योद्धा के लिए अनुचित था |युद्ध न करना पलायनवादी मानसिकता दर्शाता है |
                   वह युद्ध करने से कभी भी नहीं डरता था |इससे पहल्र भी उसने कई युद्ध लड़े थे |परन्तु महाभारत में उसे युद्ध अपने ही भाई-बंधुओं से करना था |भाइयों के मरने की कल्पना मात्र से ही वह भयभीत हो जाता है |तब  उसे शास्त्र याद आते हैं | उनकी आड़ में वह युद्ध से पलायन कर अपने भ्रम को सही साबित करने की एक कोशिश कर रहा था |लेकिन श्रीकृष्ण जैसे सारथी और सखा होने के कारण यह संभव नहीं हो सका |अगर श्रीकृष्ण के स्थान पर आज के कोई तथाकथित पंडित-ज्ञानीजन होते तो शायद अर्जुन के निर्णय को उचित बताते हुए स्वीकार भी कर लेते |
                    इस संसार में उचित और अनुचित के मध्य विभाजन रेखा बड़ी ही सूक्ष्म है ,जिस कारण से उचित को अनुचित और अनुचित को उचित बता देना बड़ा आसान है |अपने स्वर्थानुसार लोग इसे स्वीकार भी कर लेते हैं |आज आवश्यकता है कि इस रेखा को सही तरीके से समझकर ही उचित अनुचित का निर्णय किया जाय ,अन्यथा इस भ्रमजाल से कभी भी मुक्ति नहीं मिल सकेगी | बिना भय और भ्रम से मुक्त हुए सत्य को पाना असंभव है |
                                     || हरिः शरणम् ||

Sunday, February 23, 2014

भय की वास्तविकता |

                                             आप अपना वास्तविक जीवन केवल इसी लिए नहीं जी पा रहे हैं क्योंकि आपको दूसरों की देखा देखी जीना ही उचित लगता है |लेकिन ऐसा जीवन क्या आपको जीने की संतुष्टि दे सकता है ?नहीं,कदापि नहीं| ऐसा जीना आपको जीने का भ्रम ही देता है ,संतुष्टि नहीं |ऐसे जीवन से आप संतुष्ट हो ही नहीं सकते क्योंकि ऐसा जीवन आप दूसरों के अनुसार जी रहे है.स्वयं के अनुसार नहीं |जब तक मनुष्य स्वयं के अनुसार कुछ नहीं कर लेता तब तक उसे संतुष्टि मिल ही नहीं सकती |स्वयं के संतुष्ट हो जाने को ही आत्मसंतुष्टि कहा जाता है |आत्म संतुष्टि तभी मिल पायेगी जब आप इस भ्रम-जाल से मुक्ति पा लेंगे |इस भ्रम-जाल को निर्मित करने में भय की मुख्य भूमिका होती है अतः सबसे पहले भय की वास्तविकता जाननी होगी |भय को जाने बिना हम भ्रम से बाहर नहीं निकल सकते |
                                    भय को कई तरीकों से वर्णित किया जा सकता है -जैसे संसार का भय ,किसी इंसान या जानवर का भय,परिवार से बिछडने का भय,मरने का भय,इज्जत का भय,किसी काम के गलत हो जाने का भय आदि | सभी प्रकार के भय केवल मात्र एक ही कारण के अंतर्गत आ जाते है |वह है "कुछ या सब कुछ खो जाने" का भय |यही भय की वास्तविकता है |जब तक मानव मन से यह खो जाने का भय नहीं निकल जायेगा तब तक उसका अपने ही स्वभाव से जीना नहीं हो पायेगा | जिस दिन व्यक्ति सब कुछ खो जाने को तैयार हो जाता है, उस दिन से वह भय-मुक्त हो जाता है |फिर उसे न तो मरने का भय रहता है और न ही किसी प्रकार की झूठी इज्जत का |वह संसार में प्रत्येक भय से मुक्त हो जायेगा और यह भय से मुक्ति उसे भ्रम से भी मुक्ति दिला देगी |
                                     जब मानव इस संसार में जन्म लेता है तब उसका भविष्य पहले से ही तय होता है | उसके इस जीवन में क्या होना है,क्या करना है और कब तक और कैसे जीना है ,सब कुछ पहले से ही निर्धारित किया जा चूका होता है |इसलिए मानव को अपने इस जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं सोचना चाहिए जो एक प्रकार का भय पैदा करे | भय मुक्त जीवन ही उन्मुक्त जीवन है |ऐसे उन्मुक्त जीवन में भ्रम का कोई स्थान नहीं है |
                                       || हरिः शरणम् || 

Saturday, February 22, 2014

भय और भ्रम |

                                           संसार में हम जितने भी कार्य करते हैं ,प्रायः कार्य किसी न किसी भय के वशीभूत होकर ही करते हैं |"लोग क्या कहेंगे ?" ऐसा हम सभी अपने जीवन में सदैव ही सोचते और कहते रहते हैं |यह "लोग क्या कहेंगे ?"ही सबसे बड़ा भय है ,जो व्यक्ति को सबसे ज्यादा भ्रमित करता है |इस भय के कारण ही कोई भी इंसान अपने स्वभावानुसार जी नहीं पा रहा है |मैं जानता हूँ कि आप में से कई व्यक्ति मेरी इस बात से कतई सहमत नहीं होंगे |लेकिन यह कटु सत्य है |हम में से ज्यादातर लोग दूसरों के हिसाब से ही अपना जीवन जी रहे हैं,बहुत ही कम लोग ऐसे मिलेंगे जो अपना जीवन अपने अनुसार ही जी रहे हैं|कहेंगे सभी कि हम स्वयं के स्वभावानुसार जी रहे है ,लेकिन जरा दिल पर हाथ रखकर दो मिनट के लिए सोचिये कि क्या आप सही कह रहे हैं ?
                      अगर आप सही कह रहे हैं तो मैं आपसे सिर्फ यही पूछना चाहता हूँ कि आपको सबसे ज्यादा गुस्सा अपने आप ही आता है या कोई दिलाता है ?आपका जवाब मैं जानता हूँ कि क्या होगा?आप कहेंगे कि किसी की अनुचित बात पर मुझे गुस्सा आता है |अब आपही सोचिये कि जब गुस्से पर नियंत्रण भी किसी दूसरे का है तो ऐसे में आपके जीवन का नियंत्रण भी तो किसी और के हाथ में हो सकता है |आप बाहर जाने से पहले अपने आप को क्यों सजाते संवारते हैं ?इसलिए न कि आप लोगों को यही दिखाना चाहते है कि आपका जीवन कितना सुव्यवस्थित है | अगर आपका जीवन इतना ही सुव्यवस्थित है तो फिर किसी को सुव्यवस्थित दिखाने की आवश्यकता भी क्या है ?आवश्यकता है,क्योंकि आपका जीवन सुव्यवस्थित नहीं है,इस लिए आप अपने को सुव्यवस्थित दिखाने का भ्रम पैदा करते हैं |और यहीं से आपकी मानसिक अवस्था बदलना शुरू हो जाती है |आप धीरे धीरे इस डर से कि कोई क्या सोचेगा ,अपने आपको वास्तविकता से परे करते जाते है और यह दूसरों का कथित भय आपको भ्रम-जाल में उलझाता चला जाता है |
                       आपने एक बात अपने संज्ञान में ली होगी कि जब आप कभी अकेले किसी एक अँधेरी रात में निर्जन क्षेत्र से गुजर रहे होते हैं तब अचानक ही आपके गले से कुछ स्वर निकलने प्रारम्भ हो जाते है,चाहे वह किसी गाने के बोल हो,भजन हो या सीटीकी आवाज़ हो |कभी आपने इस पर गौर किया है कि ऐसा क्यों होता है ?ऐसा इसलिए होता है,जिससे कि आपको  उन स्वरों को सुनकर अकेले होने का अहसास न हो | आप अपने आप ही ऐसा भ्रम पाल लेते हैं जैसे इस रास्ते पर आपके अलावा कोई अन्य भी है | ऐसा भ्रम आप इसलिए पैदा कर लेते हैं ,जिससे आपको भय न लगे |भय और भ्रम का आपस में चोली दामन का साथ है |जहाँ भय है वहाँ भ्रम भी है | जिस दिन आपके मन से सारा भय दूर हो जायेगा ,भ्रम अपने आप ही तिरोहित हो जायेगा |
                            भ्रम से बाहर निकलने का सबसे आसान और एकमात्र तरीका यही है कि आप भयमुक्त हो जाएँ |भयवश भगवान की उपासना,पूजा भी एक भ्रम पालने से अधिक कुछ भी नहीं है | जहाँ भय है वहाँ प्रेम का पदार्पण कभी भी नहीं हो सकता |जहाँ प्रेम नहीं वहाँ परमात्मा भी नहीं |
                          ||हरिः शरणम् ||