Thursday, December 22, 2016

आलोक-अनुभूति-5

आलोक-अनुभूति-5
मनुष्य की बुद्धि मन और आत्मा के मध्य स्थित है | बुद्धि अगर मन के अनुसार कार्य करती है, तब वह भौतिकता का विकास करती है और मनुष्य को विभिन्न प्रकार के बंधनों में बाँध देती है | इन बंधनों के कारण वह एक क्या, सहस्रों मानव जन्म लेने तक भी मुक्त नहीं हो सकता | यही बुद्धि जब मन का परित्याग कर अपनी आत्मा के अनुसार कार्य करने लग जाती है, तब ही मनुष्य का वास्तविकता में विकास हो पाता है | आत्म-बोध (Self Realization) होते ही समस्त कामनाओं का नाश हो जाता है और एक ही मनुष्य जीवन में व्यक्ति तत्काल मुक्त हो सकता है-जीवन-मुक्त अर्थात विदेह, राजा जनक की तरह |
इस प्रकार प्रथम प्रश्न के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य का वास्तविक विकास आध्यात्मिक विकास है, न कि भौतिक विकास | बुद्धि व्यक्ति के मन के अनुरूप चलती है तो भौतिक विकास होता है और आत्मा के अनुसार चलती है तो आध्यात्मिक विकास | कामना का भौतिक विकास से संबंध अवश्य है परन्तु व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक विकास के लिए प्रत्येक कामना का त्याग करते हुए निर्विचार होना आवश्यक है |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, December 21, 2016

आलोक-अनुभूति-4

आलोक-अनुभूति-4
इस प्रथम प्रश्न का तीसरा भाग है, बुद्धि से सम्बंधित | बुद्धि का सम्बन्ध अवश्य ही मानव मस्तिष्क से है | विज्ञान कहता है कि सृष्टि के विकास के साथ ही मनुष्य की बुद्धि का विकास भी होता है | यदि इस बात को सत्य मान भी लिया जाये तो फिर यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों की बुद्धि का विकास क्यों नहीं हो पाया ? कुछ समय के लिए अगर हम विज्ञान को एक तरफ रख कर ज्ञान की दृष्टि से देखें तो जान पाएंगे कि प्रत्येक मानव जन्म में की गई कामनाओं को पूरा करने के लिए ही जन्म दर जन्म मनुष्य की बुद्धि का विकास हुआ है | मनुष्य को छोड़कर किसी भी अन्य प्राणी के सम्पूर्ण जीवन काल में कभी भी उसके भीतर किसी भी प्रकार की कामना पैदा ही नहीं होती है | इस कारण से उनकी बुद्धि का विकास नहीं हो सका | बुद्धि के विकास के लिए मन में कामना का जन्म लेना आवश्यक है |
हमारे ऋषि-मुनि कहते हैं कि प्रत्येक कामना का पूर्ण होना केवल उस एक जन्म में होना असंभव है जिस जन्म में वह कामना की गई है तथा साथ ही साथ यह भी सत्य है कि जीवन में एक कामना पूरी होते ही कई नई कामनाएं जन्म लेती रहती है | इस प्रकार प्रत्येक कामना की पूर्ति के लिए कई जन्म लेने आवश्यक हैं और उन कामनाओं को पूर्ण करने के लिए बुद्धि का भी विकसित होना आवश्यक है | इसी कारण से मनुष्य समय और कामना के अनुरूप अपनी बुद्धि को विकसित करता चला गया | यह प्रक्रिया आदिकाल से सतत चलती आ रही है और आज भी मनुष्य की विकसित हुई बुद्धि कामनाओं को पूरा करने में ही लगी हुई है और वह उसका सतत उपयोग भी कर रहा है | अब यह उसके विवेक पर निर्भर है कि वह इस बुद्धि का उपयोग भौतिकता के लिए करता है अथवा आध्यात्मिकता के लिए |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, December 20, 2016

आलोक-अनुभूति-3

आलोक-अनुभूति-3
कामना और मनुष्य का साथ आज से नहीं है बल्कि जब से मनुष्य का इस धरा पर आगमन हुआ है, तब से ही है | इनका आपस का साथ दिन प्रतिदिन प्रगाढ़ ही होता जा रहा है | कामना करना कहीं से भी अनुचित नहीं है बल्कि कामना किस प्रकार की है, यह अधिक महत्वपूर्ण है | कामना दो प्रकार की होती है-शुभ और अशुभ | शुभ कामना में व्यक्ति का निजी स्वार्थ नहीं होता, किसी को दुःख देने की भावना नहीं होती बल्कि मन में परमार्थ की भावना होती है जबकि अशुभ कामना व्यक्ति के केवल निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए होती है |
प्रत्येक कामना से कर्म जुडा रहता है | कामना है तो कर्म भी होगा और कर्म होंगे तो उनका परिणाम भी अवश्य मिलेगा और अगर कर्म का परिणाम प्राप्त करना ही है तो इस संसार में पुनः आना भी होगा | अशुभ कामना (Greed) सकाम कर्म कराती है और शुभ कामना (Good wishes) निष्काम कर्म | फल तो दोनों प्रकार के ही कर्मों का मिलना अवश्यम्भावी है | निष्काम–कर्म में परमार्थ की कामना होती है और सकाम कर्म में स्वार्थ की | बिना कामना के किसी भी प्रकार के कर्म का होना असंभव है | निष्काम–कर्म जब अकर्म बन जाते हैं तभी उनका फल प्राप्त नहीं होता | अकर्म वे कर्म होते हैं, जो बिना किसी कामना के किये जाते हैं और जिनको व्यक्ति अपने द्वारा किया हुआ न मानकर प्रकृति के गुणों द्वारा हुआ मानता है | मनुष्य कामना को विकास का आधार मानता है | हाँ, यह एक प्रकार से भौतिक विकास का आधार अवश्य है परन्तु भौतिक विकास को मनुष्य का वास्तविक विकास नहीं माना जा सकता | अशुभ कामना व्यक्ति को सुख-दुःख के संसाधन उपलब्ध करवा सकती है जबकि शुभ कामना आनन्द को | मनुष्य को अपने आध्यात्मिक विकास, जो कि वास्तविकता में उसका विकास है, के लिए सभी प्रकार की कामनाओं को त्यागना होगा क्योंकि कामनाएं बंधन पैदा करती है, कर्म-बंधन को | विकास बंधन में बंधे रहकर नहीं हो सकता, मनुष्य का विकास तो उसके मुक्त होने में ही है |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Monday, December 19, 2016

आलोक-अनुभूति-2

प्रथम प्रश्न -.
मैं असमंजस में हूँ कि अगर कोई व्यक्ति नई खोज के लिए कामना नहीं रखता है, कुछ नया करने का विचार उसके मन में पैदा नहीं होता है तो ऐसे में सम्पूर्ण मानव जाति का विकास कैसे होगा ? परमात्मा ने हमें बुद्धि दी, हमें इसका उपयोग क्यों नहीं करना चाहिये अन्यथा वह हमें बुद्धि ही क्यों देता ?
इस प्रश्न के तीन भाग हैं –विकास, कामना और बुद्धि | मानव के विकास के बारे में मैं कहना चाहूँगा कि कामना और मानव जाति के विकास में कोई गहरा सम्बन्ध नहीं है | हाँ, एक सीमा तक कामना रखकर संसार के भले के लिए कुछ किया जा सकता है परन्तु ऐसे को हम विकास नहीं कह सकते | आइन्स्टीन ने परमार्थ के लिए आणविक ऊर्जा के लिए सापेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित किया था | क्या उससे मानव का विकास हुआ है ? सुख के साधन जुटा लेना अथवा अत्यधिक मारक क्षमता के आयुध बना लेना कोई विकास नहीं है | आणविक ऊर्जा तो प्रत्येक पदार्थ में इस ब्रह्माण्ड के बनने के प्रारम्भ काल से ही है | आइन्स्टीन ने इस ऊर्जा को व्यक्त करने का उपाय खोज निकाला | सेव पेड़ से जमीन पर प्रारम्भ से ही गिरते आ रहे हैं परन्तु न्यूटन ने विचार करके गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को संसार के सम्मुख स्पष्ट कर दिया | इस सिद्धांत के आधार पर हमने इस संसार से बाहर अन्य ग्रहों की यात्रा प्रारम्भ कर दी परन्तु इससे मानव का कितना विकास हुआ ? वास्तव में विश्लेषण करें तो पाएंगे कि अभी तक विकास के नाम पर विनाश की ओर ही अग्रसर हुए हैं हम | इसलिए मैं यह कह रहा हूँ कि कामना और मानव के विकास का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है क्योंकि केवल भौतिक विकास को ही विकास कहना अनुचित है |
मानव का विकास तभी होगा जब प्रत्येक मनुष्य अपने आपको आध्यात्मिक रूप से विकसित करेगा | जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति आत्मिक रूप से विकसित हो जायेगा उस दिन ही सही मायने में इस संसार का विकास होगा | मनुष्य का विकास होगा आध्यात्मिक उत्थान से, भौतिक उत्थान से नहीं | बुद्धि का उपयोग कर मनुष्य इस विकास की ऊँचाइयों को छू सकता है | अब आते हैं, कामना के विषय पर | कामना को जाने बिना हम कर्म को नहीं जान पाएंगे |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Sunday, December 18, 2016

आलोक-अनुभूति-1

आलोक-अनुभूति-1 
मेरे अवकाश पर जाने से पूर्व कुछ मित्रों ने मेरी post पढ़कर कुछ प्रश्न किये थे | समयाभाव के कारण उनके उत्तर मैं तत्काल नहीं दे सका, क्षमाप्रार्थी हूँ | उन्हीं मित्रों में से मेरे एक मित्र हैं डॉ. आलोक गुप्ता | हम दोनों ने एक साथ ही बीकानेर मेडिकल कालेज से चिकित्सकीय शिक्षा प्राप्त की थी | फिर राजकीय सेवा में रहते हुए उनकी नियुक्ति जब तक रतनगढ़ में रही, तब तक बराबर मिलना होता रहता था | आजकल वे जोधपुर हैं और फेसबुक के माध्यम से हमारा संपर्क बना हुआ है | ‘न करोति न लिप्यते’ पर मेरी अंतिम post पढकर उन्होंने कुछ जिज्ञासा प्रकट की है | उन्होंने तीन प्रश्न किये हैं | जो इस प्रकार हैं-
1. मैं असमंजस में हूँ कि अगर कोई व्यक्ति नई खोज के लिए कामना नहीं रखता है, कुछ नया करने का विचार उसके मन में पैदा नहीं होता है तो ऐसे में सम्पूर्ण मानव जाति का विकास कैसे होगा ? परमात्मा ने हमें बुद्धि दी, हमें इसका उपयोग क्यों नहीं करना चाहिये अन्यथा वह हमें बुद्धि ही क्यों देता ?
2. क्या परमात्मा को प्राप्त करना एक कामना नहीं है ?
3. हम केवल आत्म-केन्द्रित होकर अपने स्वार्थ के लिए उच्च अवस्था को उपलब्ध होना चाहते हैं, क्या ऐसा करना हमारा स्वार्थ पूर्ण उद्देश्य नहीं है ? जबकि परमात्मा ने श्री कृष्ण के रूप में सदैव संसार की भलाई के लिए कार्य किया था |
बहुत ही गूढ़ विषय पर जिज्ञासा प्रदर्शित की है, मेरे मित्र ने | वैसे तीनों ही प्रश्न आपस में एक दूसरे से सम्बन्धित (Inter related ) हैं | अतः इनकी शंका का मैं व्यापक रूप से समाधान करना चाहूंगा | उनकी भी इस प्रकार की भावना है कि मैं post के माध्यम से इस विषय को स्पष्ट करूँ, जिससे उनकी तरह ही अन्य व्यक्ति लाभान्वित हो सके | वैसे मैं इतना ज्ञानी नहीं हूँ कि उच्च स्तर पर जाकर इस विषय पर अपने विचार रख सकूँ | फिर भी आचार्य जी के सान्निध्य और सनातन शास्त्रों के माध्यम से जो कुछ भी इस बारे में ज्ञान रखता हूँ, एक लघु श्रृंखला के माध्यम से प्रकट कर रहा हूँ |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Saturday, December 17, 2016

संसार-सागर

                              आज लगभग 40 दिनों बाद social media पर नियमित रूप से लौट रहा हूँ । इस काल का अनुभव बड़ा ही सबक देने वाला रहा । हम सांसारिक  कर्मों  की आड़ में किस प्रकार बंधनों में जकड़ जाते हैं, यह प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया जा सकता है । मकड़ी के  जाल की तरह  ही है इस संसार का ताना-बाना , जहाँ शिकारी भोजन की  तलाश करते करते ही किसी और शिकारी का शिकार बन जाता है । एक कर्तव्य आपके समक्ष आता है और उस कर्तव्य को पूर्णता प्रदान करने से पहले ही दूसरा कर्तव्य आपके समक्ष उपस्थित हो जाता है या यूँ कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कर दिया जाता है । आपका विवेक ही ऐसे सांसारिक कर्तव्यों के मक्कड़जाल  से बचा सकता है । यहाँ आकर यह आसानी से समझा जा  सकता है कि क्यों कर इस संसार को सागर कहा गया है जहाँ से पार होना कितना मुश्किल है ।  प्रायः हम इस संसार सागर में डूब ही जाते हैं ।
                               हरि : शरणम् के आचार्य श्री  गोविन्द राम शर्मा कहते हैं कि सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करना भी आपका एक धर्म है परंतु उन कर्तव्यों को अपने अनुसार पूरा करने का संकल्प ही आपको संसार में उलझा देता है । कर्तव्य  करने के लिए कर्म करें परंतु वह आपकी इच्छानुसार हो  पाता है अथवा नहीं,इस दुविधा में न  पड़ें । अगर  कर्तव्य-कर्म आपके मन  अनुसार हो गए तो फिर आप उन  कर्मों में आसक्त हो जायेंगे और अगर नहीं हो पाए तो फिर यह आपके दुःख का एक कारण होगा । इस दुःख से बाहर निकलने के लिए  फिर से आप कोई नया कर्म करेंगे ।  इस प्रकार आप एक से दूसरे और फिर तीसरे कर्तव्यों के लिए कर्म करते हुए इस संसार में उलझ कर रह जायेंगे । अपने आप को इस स्थिति से बचाने के लिए  आप कर्तव्य को निभाने के  लिए कर्म अवश्य  करें और उनका जो भी परिणाम हो,स्वीकार करें और पुनः संसार से बाहर निकल आएं । सभी प्रकार के संकल्पों और विकल्पों का त्याग करते हुए साक्षी-भाव से सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करें । 
                       ॥ हरि : शरणम् ॥ 
                             

Saturday, December 10, 2016

गृहस्थ / संन्यस्थ

                  एक सन्यासी और एक गृहस्थ होने में अंतर क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर आज मिला है | ऐसी एक धारणा बन गई है जिसके अनुसार गृहस्थी को एक बंधन माना जाता है और सन्यासी को मुक्त | वास्तव में यह धारणा ही पूर्ण रूप से गलत है | गृहस्थ भी मुक्त अवस्था में रह सकता है और सन्यासी भी बंधन में बंधा रह सकता है | केवल सन्यास का आँचल पकडे रहना भी एक बंधन है और इसी तरह केवल गृहस्थी में रमे रहना भी बंधन है | गृहस्थ भी मुक्त अवस्था में रह सकता है | लगभग छः माह पहले जब मेरे छोटे पुत्र के विवाह की तिथि 8 दिसम्बर को निश्चित की गई थी, तब मैं हरिः शरणम् गया था | मेरी धर्मपत्नी के आग्रह पर आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा ने मुझे कहा था कि अपने कर्तव्य का पालन करते हुए पहले पुत्र का विवाह करो और फिर आध्यात्मिकता के मार्ग पर आगे बढ़ना | उस समय मुझे यह लगा कि मैं पुनः उस संसार  में लौट रहा हूँ जहां से मैं शनैः शनैः निवृत हो रहा था | बीच में एक दो बार मैंने अपनी यह व्यथा उनके सामने दूरभाष पर प्रकट भी की थी परन्तु उन्होंने अपने कथन को परिवर्तित नहीं किया | आज जब मैं पुत्र का विवाह दो दिन पहले संपन्न कर चूका हूँ तब जाकर उनका कहना मुझे शत प्रतिशत सत्य नज़र आ रहा है | यह सत्य है कि सन्यास भी एक प्रकार का बंधन है जब तक कि आप अपने कर्तव्य से मुक्त न हो चुके हों |
                    गृहस्थ को ऐसा होना चाहिए जो सदैव सन्यस्थ होकर रहे और सन्यासी को भी ऐसा होना चाहिए कि जब कर्त्तव्य का पालन करना हो कुछ समय के लिए गृहस्थी में लौट जाये | इसी को गीता में समत्व योग कहा गया है | गीता में समता को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है |
        योगस्थः कुरु कर्माणि संगत्यक्त्वा धनंजय |
        सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || गीता 2/48 ||
अर्थात हे धनञ्जय ! तू आसक्ति को त्याग कर त्तथा सिद्धि असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व ही योग कहलाता है |
|| हरिः शरणम् ||
आप सभी मित्रों, बंधु-बांधवों और मेरे बुजुर्गों का आभार जिन्होंने अपना अमूल्य समय निकाल कर मेरे पुत्र के विवाह समारोह में पधारकर आशीर्वाद प्रदान किया | मैं उनका भी आभारी हूँ जिन्होंने मेरे जन्म दिन और पुत्र-विवाह पर विभिन्न माध्यमों से शुभकामनाएं प्रेषित की हैं | बहुत बहुत धन्यवाद | एक सप्ताह में सभी कार्यों से निवृत होकर आपके समक्ष पुनः लौटूंगा |

आपका- डॉ.प्रकाश काछवाल