Monday, April 7, 2014

मन और अस्तेय |

                अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना। किसी वस्तु का मूल्य चुकाए बगैर या परिश्रम किए बिना उस वस्तु को प्राप्त करना भी चोरी है। जिस वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं हैं उसे पाने की इच्छा बीजरूप में चोरी ही मानी जाएगी। मन पर काबू करते हुए इस दुर्गुण से बचना अस्तेय व्रत है। काम, क्रोध, लोभ आदि मनोविकारों के कारण अपराधों में वृद्धि हो रही है। सभी इंद्रियों में मन अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण इससे होने वाली चोरी सूक्ष्मतम होती है।
               किसी वस्तु को देखकर मन ललचाता है। लालच या प्रलोभन के वशीभूत होने पर अस्तेय का पालन संभव नहीं है। किसी चीज की जरूरत न होने पर भी उसे हड़प कर फालतू चीजों का अंबार लगा लेना परिग्रह कहलाता है, जो अस्तेय व्रत का शत्रु है। आज भी यदि हमें नैतिक मूल्यों को स्थापित करना है तो आर्थिक मर्यादा निश्चित करते हुए संयम आवश्यक है। तभी न केवल हमारे तनाव दूर होंगे, बल्कि हमें सुख व संतोष भी प्राप्त होगा।
              आज उपभोगवाद का दौर चल रहा है। ऐसे समय में अस्तेय व्रत की प्रासंगिकता बढ़ गई है। इसके द्वारा ही हम उपलब्ध साधनों का सीमित उपभोग करते हुए सुखी और संतुष्ट जीवन बिता सकते हैं। महात्मा गांधी ने अपने एकादश व्रतों में अस्तेय को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। महर्षि पतंजलि ने योग-दर्शन में सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के साथ अस्तेय को जीवन का अभिन्न अंग माना है। अस्तेय एक मानसिक संकल्प है, जिससे मन पर नियंत्रण किया जा सकता है, क्योंकि संसार का समस्त कार्य-व्यापार मन ही संचालित करता है। मन ही कर्ता, साक्षी और विवेकी है।
              मन के वश में होने पर अस्तेय व्रत का पालन सब प्रकार से किया जा सकता है। मन को हम सत्य द्वारा पवित्र बना सकते हैं। अस्तेय व्रत साधने के लिए संतोष का सद्गुण अपनाना होगा। हम जानते हैं कि सारे व्रत या संकल्प एक दूसरे से जुड़े हैं। इसलिए अस्तेय की प्राप्ति के लिए सत्य, अहिंसा आदि व्रतों का भी पालन करना होगा। संतोष के बिना परिग्रह समाप्त नहीं किया जा सकता है और न ही चोरी समाप्त हो सकेगी। इसलिए सुखमय जीवन और स्वस्थ समाज के लिए अस्तेय व्रत परमावश्यक है।
                       || हरिः शरणम् ||

Sunday, April 6, 2014

चिन्तन-मनन |

                  चिंतन का अर्थ है सोचना या विचारना। किसी सुने हुए, पढ़े हुए या विचारणीय विषय पर एकांत स्थान में बैठकर गंभीर विचार करना मनन है। मननशीलता का गुण होने के कारण मानव को मनुष्य कहा जाता है। जैसा मन का स्वभाव या गुण होता है वैसा ही मनुष्य होता है।
                  मन आत्मा का सर्वोपरि साधन है। मन का कार्य है आत्मा से प्राप्त संदेशों को क्रियान्वित कराने का संकल्प करना। मन ज्ञानेंद्रियों और कर्मेद्रियों के जरिये कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। मन की गुणवत्ता पर ही मनुष्यता निर्भर करती है, अन्यथा मन के पतित होने पर मानव का व्यवहार भी पशुवत हो जाता है। हमारे अंत:करण के अंतर्गत मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को शुमार किया जाता है। कार्य के विभाजन को देखते हुए मन और चित्त भिन्न-भिन्न हैं।
                 चित्त का काम चिंतन करना है और मन का काम मनन करना है। चिंतन चित्त में होने के कारण उसके साथ बुद्धि का समावेश रहता है। शास्त्रों में बुद्धि को निश्चयात्मक बताया गया है। इस गुण के कारण यह किसी भी विषय का निश्चय करा देती है। चिंतन निर्विकल्प स्थिति है, जो ज्ञानपूर्वक होती है। आध्यात्मिक जगत में केवल आत्मा और परमात्मा का चिंतन होता है, किसी अन्य विषय का नहीं। मनुष्य ज्ञानरहित अवस्था में ही चिंता करता है। वेदों में कहा गया है कि मनुष्य चिंता न करे, क्योंकि यह हमें पतन की ओर ले जाती है।
                शास्त्रों में चिंता और चिता पर विचार करते हुए बताया गया है कि मनुष्य चिंता करके चिता की स्थिति तक पहुंच जाता है, परंतु यदि वह चित्त में चिंतन करे तो परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। चिंतन साधना की प्रारंभिक अवस्था है। व्यक्ति अपने चित्त को योग साधना के माध्यम से बाहरी कार्यों और विषयों से हटाकर अपनी चित्तवृत्तियों का निरोध कर लेता है। इस स्थिति को गीता में कामनाओं से रहित होकर योगनिष्ठ होना बताया गया है। ऐसा योगनिष्ठ साधक आत्मानंद का अनुभव प्राप्त करते हुए अपने जीवन के मुख्य लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। वेदों के अनुसार मन हृदय में स्थित है, मस्तिष्क में नहीं। आत्म तत्व को सुसारथि बताया गया है जो चिंतन-मनन के विवेक से परिपूर्ण होकर जीवन रूपी रथ का संचालन करता है।
                          || हरिः शरणम् ||

Saturday, April 5, 2014

मन-एक परमात्म तत्व |

                    मिथ्या है अभिमान। मानव वही है जो दूसरों के भी काम आए और दूसरों का दुख-दर्द समझे। किसी भी प्रकार से किसी को दुख या कष्ट न पहुंचाए। जो सुखाभिमानी दूसरों को दुख में देखकर प्रसन्न होता है उसे एक दिन स्वयं भी दुखी होना पड़ता है। प्रभु प्रेम में आंसू बरसाने वाले को दुख के आंसू नहीं बरसाने पड़ते।
                    जीवों पर करुणा व दया बरसाएं। पूर्ण रूपेण अहिंसा व्रत का पालन करें। मन की चंचलता को रोकें। मन, परमात्मा की अमानत है। इसे परमात्मा में ही लगाएं। इसे संसार, सांसारिकता, भोग-विलासों में लगाने पर अंतत: दुखी होना पड़ेगा। छोटी-छोटी बातों से अपने प्रेम, एकता व सद्भाव को समाप्त न करें। श्रद्धा व विश्वास से ही अंत:करण में स्थित ईश्वर की अनुभूति कर सकते हैं। अभिमान प्रभु की प्राप्ति में बाधक है। अभिमान चाहे किसी भी प्रकार (जैसे धन, वैभव, तप और ज्ञान आदि) का क्यों न हो, ठीक नहीं होता। मानव के जीवन पर संगति का प्रभाव अवश्य पड़ता है। इसलिए अच्छा देखें, अच्छा सुनें, अच्छा बोलें, अच्छा विचारें और अच्छी संगति करें।
                    खान-पान व जीवन को सात्विक, शुद्ध और संयमित बनाएं। प्रकृति के नियमों का पालन करें। शांति को जीवन में प्रमुखता से स्थान दें। अशांत व्यक्ति को कहीं भी सुख नहीं मिलता। सत्य परमात्मा का स्वरूप है। सत्य जहां भी जुड़ेगा वहां विकृति नहीं आएगी। जिसे सदाचारी व्यक्ति का संग मिले उसका जीवन धन्य है। जिसके जीवन में करुणा, क्षमा, उदारता, कोमलता, सेवा, परोपकार, और परमार्थ का भाव है वही संत है। जीना भी एक कला है। गिरना व गिराना बहुत सरल है, परंतु उठना व उठाना उतना सरल नहीं है। स्वयं जागो व औरों को जगाओ, अपने कल्याण के साथ औरों के कल्याण के भी भागीदार बनो। कठिनाइयों, बाधाओं व परीक्षाओं से न घबराकर निरंतर चलते रहो, जब तक कि आपको आपका लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
                    लक्ष्यविहीन मानव का जीवन पेंडुलम की भांति है, जो हिलता-डुलता है। धर्म वह अखंड धारा है, जो कभी टूटती नहीं। धर्म वही है जो जीवन में धारण किया जाए। धर्म व परमात्मा को मात्र मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च या सत्संग तक ही सीमित न करें। धर्म को जीवन का अभिन्न अंग बनाएं। धर्म निरंतर सदा-सर्वदा, यत्र-तत्र-सर्वत्र हमारे साथ रहेगा, तभी समाज में आ रही विकृतियों से बच सकेंगे।
                             || हरिः शरणम् ||

Friday, April 4, 2014

खुशी-एक मनोदशा |

                    वस्तुत: प्रसन्नता या खुशी आपकी मनोदशा पर निर्भर करती है। इसलिए खुश रहना एक हुनर है। तमाम लोगों की धारणा है कि अमुक-अमुक वस्तुओं को हासिल करने से उन्हें खुशी मिलेगी तो उनकी ऐसी सोच बेबुनियाद है। इसका कारण यह है कि खुशी का अहसास किसी वस्तु विशेष पर निर्भर नहीं करता।
                    दुनिया में तमाम ऐसे धनवान व्यक्ति हैं जिनके पास समस्त भौतिक व विलासितापूर्ण वस्तुएं उपलब्ध हैं। इसके बावजूद आए दिन अखबारों व अन्य प्रचार माध्यमों में इस आशय की खबरें प्रकाशित होती रहती हैं कि अमुक धनवान व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली। स्पष्ट है कि ऐसे लोग स्वयं से या हालात से अप्रसन्न होने की स्थिति में ही आत्महत्या करते हैं। इस प्रकार यह बात स्वत: ही स्पष्ट हो जाती है कि प्रसन्नता का कारण सिर्फ धन या वैभव ही नहीं है। वस्तुत: खुशी एक सकारात्मक मनोदशा है, जिसमें आप शांति व आनंद की अनुभूति करते हैं।
                    यदि आपके जीवन में अथक प्रयासों के बाद भी खुशी का अहसास नहीं हुआ है तो इसका अर्थ है कि आपने जीवन के आधारभूत तत्वों की उपेक्षा की है। बात चाहे संबंधों की प्रगाढ़ता की हो या परिस्थिति विशेष से निबटने में कार्यकुशलता की, आप बेहतर तभी कर सकते हैं जब खुश हों। सच तो यह है कि खुश रहना या नहीं रहना आप पर निर्भर है। जीवन में चाहे आप जो भी पा लें, यह मायने नहीं रखता। यदि आप खुश हैं, कुछ और नहीं भी हासिल करते हैं तो आपका क्या बिगड़ जाता है? खुश रहना आपका स्वभाव है। इसलिए आप खुश रहना चाहते हैं। जब आप छोटे थे तो खुश थे, लेकिन जीवन-यात्र में खुशियों को आपने कहीं खो दिया है, क्योंकि आपका मन और शरीर आपकी पहचान को आसपास की चीजों से जोड़कर देखने का आदी हो चुका है। जिसे आप मन कहते हैं उस पर सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। आप जैसे समाज में पले-बढ़े हैं, आपके मन-मस्तिष्क की अवधारणा वैसी ही होगी। आपके मन-मस्तिष्क में भी वही है जो आपने समाज में देखा है। आप इन चीजों से इतने गहन रूप में जुड़ गए हैं कि यह प्रवृत्ति आपकी परेशानियों का मूल कारण बन गई है।
                         II हरि:: शरणम् II

Thursday, April 3, 2014

कामना और वासना |

                         मनुष्य का सारा जीवन उम्मीद पर टिका रहता है। यह सही है कि आशा जीवनी-शक्ति प्रदान करती है और मनुष्य को बहुत कुछ करने के लिए प्रेरित करती है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि आशा और कामना की एक कड़ी पार करते ही मनुष्य अनंत आशाओं के चक्रव्यूह में फंसता चला जाता है।
                        जीवन में अगर रचनात्मक व क्रियात्मक आशाएं संजोई जाएं तो सफलता मिलती है, लेकिन जब समुद्र की लहरों की तरह मन में आशा की अनंत लहरें उठने लगती हैं, तो उन्हें पूरा करना संभव नहीं होता। जब एक-दो बार आशा पूरी हो जाती है, तब मनुष्य स्वभावत: अहंकारी हो जाता है। वह प्रतिक्षण अपने मन में उठते मनोवेग की तरह वह सब कुछ पा लेना चाहता है, जिसकी वह कल्पना करता है। प्रत्येक मनुष्य धन कमाना चाहता है। एक बार जब धन की प्राप्ति हो जाती है, तब वह और धन प्राप्त करना चाहता है। मनुष्य की चाह का कोई अंत नहीं है। कामना और वासना दो ऐसे मनोवेग हैं, जो कभी पूरे नहीं होते।
                        आज तक धन की कामना और वासना की पूर्ति से कभी कोई संतुष्ट नहीं हुआ। इस कामना और वासना की पूर्ति में मनुष्य अपना सारा जीवन नष्ट कर देता है और उसे सुख कभी नहीं मिलता। सुख की खोज में भटकते-भटकते मनुष्य अंत में दुख प्राप्त करके घर लौटता है। आज हमारे समाज में इतने दुखी, अशांत, चिंताग्रस्त और बीमार लोग इसलिए दिखाई पड़ रहे हैं क्योंकि वे अपनी कामनाओं को पूरा नहीं कर सके। आम तौर पर पहली सफलता मिलते ही मनुष्य अहंकारी बन जाता है और वह चाहता है कि उसे सब कुछ प्राप्त हो जाए जो वह चाहता है। जब कभी उसे कोई सफलता नहीं मिलती तो वह आक्रामक हो जाता है, आहत हो जाता है और हीन भावना से ग्रस्त हो जाता है। हीन भावना से ग्रस्त लोग ही विध्वंसक होते हैं। आशावादी होना अच्छा है, लेकिन आशा जब परवान चढ़ने लगे, आशा जब समुद्र की लहरों की तरह अनंत बन जाए, तो जीवन के लिए खतरनाक बन सकती है। आज प्रत्येक परिवार में इतना कलह, इतना विषाद इसलिए है क्योंकि परिवार के प्रत्येक सदस्य अपने-अपने अहंकार की पूर्ति की आशा में बैठे हैं। जहां इस आशा की पूर्ति में थोड़ा अवरोध पैदा हुआ कि झगड़े शुरू हो जाते हैं। आज परिवार इसलिए विघटित हो रहे हैं, क्योंकि लोग अपनी आशाओं की पूर्ति के लिए अहंकार के घोड़े पर सवार हैं।
                         || हरिः शरणम् ||

Wednesday, April 2, 2014

इच्छाशक्ति |

                 इच्छाशक्ति आत्मा और मन का संयोग। जीवन में सफलता और विफलता के निर्णायक तत्वों में इच्छाशक्ति का स्थान सर्वोपरि है। इच्छाशक्ति के माध्यम से व्यक्ति असंभव लगने वाले कार्यो को संभव बना सकता है। इच्छाशक्ति के अभाव में व्यक्ति सब कुछ होते हुए भी दुर्भाग्य का रोना रोता रहता है।
                 इच्छाशक्ति का अभाव जीवन की विफलताओं और संकटों का मूल कारण है। इसके रहते व्यक्ति छोटी-छोटी आदतों व वृत्तियों का दास बनकर रह जाता है। छोटी-छोटी नैतिक व चारित्रिक दुर्बलताएं जीवन की बड़ी-बड़ी त्रसदियों को जन्म देती हैं। इच्छाशक्ति की दुर्बलता के कारण ही व्यक्ति छोटे-छोटे प्रलोभनों के आगे घुटने टेक देता है और उतावलेपन में ऐसे-दुष्कृत्य कर बैठता है कि बाद में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगता।
                     जीवन की इस मूलभूत त्रासदी की स्वीकारोक्ति महाभारत में दुर्योधन के मुख से भगवान श्रीकृष्ण के सामने होती है- 'धर्म को, क्या सही है, इसको मैं जानता हूं, किंतु इसे करने की ओर मेरी प्रवृत्ति नहीं होती। इसी तरह अधर्म को, जो अनुचित व पापमय है, इसको भी मैं जानता हूं, किंतु इसको करने से मैं नहीं रोक सकता।'
                     दुर्योधन की इस स्वीकारोक्ति में मानवीय इच्छाशक्ति की दुर्बलता व विफलता का मर्म निहित है। जीवन की सफलता के लिए एकमात्र रास्ता इच्छाशक्ति का विकास रह जाता है। इसके विकास से पूर्व प्रथम यह जानना उचित होगा कि इच्छाशक्ति है क्या? दर्शनकार की भाषा में यह माया यानी प्रकृति से संयुक्त होने वाली आत्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है।
                     स्वामी विवेकानंद के शब्दों में- इच्छाशक्ति आत्मा और मन का संयोग है। व्यवहारिक जीवन में इच्छाशक्ति मन की वह रचनात्मक शक्ति है, जो निर्णित क्रिया को एक निश्चित ढंग से करने की क्षमता देती है। इच्छाशक्ति के विकास के संदर्भ में दूसरा तथ्य यह है कि इसको प्रत्येक व्यक्ति द्वारा बढ़ाया जा सकता है। इच्छाशक्ति के विकास में एकाग्रता बहुत सहायक है। हम जो भी कार्य करें, उसे पूरे मन से करें। इससे इच्छाशक्ति के विकास में बहुत सफलता मिलेगी। साथ ही ऐसे कार्यो से बचें, जिनमें ऊर्जा अनावश्यक क्षय होती है। स्पष्ट है, जब आप आत्मजागरण, आत्म-विकास व ईश्वरभक्ति में संलग्न होंगे, उतना ही इच्छाशक्ति के विकास का पथ प्रशस्त होता जाएगा और उतना ही हमारा जीवन सुख, शांति व सफलता से परिपूर्ण होता जाएगा।
                                || हरिः शरणम् ||

Tuesday, April 1, 2014

अनंत इच्छाएं |

            मनुष्य जीवन भर अपनी इच्छाओं के पीछे भागता रहता है। जीवन में कुछ इच्छाओं की पूर्ति तो हो जाती है, पर ज्यादातर इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती। मनुष्य द्वारा मनवांछित इच्छाओं की जब पूर्ति हो जाती है, तब वह फूले नहीं समाता। उस कार्य की पूर्ति का सारा श्रेय वह स्वयं को देता है। जब इच्छा की पूर्ति नहीं हो पाती, तब वह ईश्वर को दोष देने लगता है और अपने भाग्य को दोष देने लगता है।
                     मनुष्य की इच्छाएं अनंत होती हैं। वे धारावाहिक रूप से एक के बाद एक आती और चली जाती हैं। एक इच्छा की पूर्ति के बाद दूसरी इच्छा मन में फिर उठने लगती है। इस प्रकार जीवन-पर्यन्त यही क्रम निरंतर चलता रहता है। इस वर्तमान भौतिक युग में लोग इच्छाओं से भी बड़ी महत्वाकांक्षाओं को मन में संजोने लगे हैं। ऐसी-ऐसी महत्वाकांक्षाएं संजोते हैं, जिनके बारे में स्वयं जानते हैं कि वे शायद ही कभी पूरी हो सकें। इस क्षणभंगुर संसार में सांसारिक सुख की प्राप्ति के लिए मनुष्य सदा प्रयत्‍‌नशील रहता है। इसके लिए वह सदैव कामना करता रहता है। वह नहीं जानता कि सुख स्वरूप तो वह स्वयं ही है। ये सांसारिक सुख तो क्षणभंगुर ही हैं। यह समाप्त होने वाला है, तब फिर संसार के इन सुखों की इच्छाओं के पीछे क्यों भागा जाए?
                   भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि रजोगुण से उत्पन्न हुई यह कामना बहुत खाने वाली है, जिसकी पूर्ति कभी नहीं होती। इसका पेट कभी नहीं भरता।
                  भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में उठने वाली कामना यदि पूरी हो जाती है, तो राग उत्पन्न हो जाता है और इच्छाओं की पूर्ति न होने पर मन में क्त्रोध जन्म ले लेता है। इस प्रकार दोनों ही स्थितियों में मनुष्य की हानि होनी तय है। संपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं हो पाती, जबकि इन इच्छाओं की पूर्ति करने में मनुष्य अपना सारा श्रम लगा देता है। मनुष्य को चाहिए कि वह इन इच्छाओं का दामन छोड़कर अपने नियमित कर्मो को आसक्तिरहित होकर करे। कर्मो के फलों को परमात्मा पर न्योछावर कर दे। व्यक्ति को इस जगत में निर्लिप्त होकर रहना चाहिए। तभी वह शाश्वत सुख व शांति प्राप्त कर सकेगा और वह इच्छाओं के जाल में नहीं फंसेगा।
                                 ॥ हरिः शरणम् ||