Tuesday, January 7, 2014

प्रेम की पराकाष्ठा |(Height of the love)

                     प्रेम का प्रारम्भ मन की सुंदरता निखरने के साथ होता है |उसके बाद भावनात्मकता का प्रवेश होता है |भावुकता के दौर में अपने प्रेम और प्रेमी के खोने का डर,एक दूसरे से दूर होने का डर और बिछोह का संदेह बना रहता है |हालाँकि इस अवस्था में समर्पण की भावना जरूर रहती है परन्तु प्रेम के लिए दो का खो जाना आवश्यक होता है ,वह भावुकता की सीढ़ी पर खड़े रहने से संभव नहीं होगा |उससे आगे बढ़ने पर भावुकता खो जाती है और प्रेम प्रकट हो जाता है |जब प्रेम में दो प्रेमी की जगह मात्र एक ही रह जाता है तब यह भावुकता वास्तविक प्रेम में परिवर्तित हो जाती है |
                       यहाँ से प्रेम की प्रगाढता का आरम्भ हो जाता है |धीरे धीरे प्रेम अपने रंग में इन्हें पूर्णतया रंग लेता है |   जब यह रंग और गहराता है तब एक अवसर आता है जब प्रेम ही अदृश्य हो जाता है |अदृश्य होने से अर्थ यह नहीं है कि प्रेम खो जाता है बल्कि आशय यह है कि प्रेम का पता नहीं चलता,प्रेम को मापने का कोई पैमाना नहीं रहता |इसी को प्रेम का अदृश्य हो जाना कहते है |कितना सच है यह कहना --
                                   प्रेम नहीं प्रेमी नहीं,किसका कौन प्रमेय |
                                 स्मरण भूल कैसी कहाँ,ज्ञाता ज्ञान न ज्ञेय ||
                  प्रेम की प्रगाढता को जानने के लिए इससे अधिक सुन्दर पंक्तियाँ हो ही नहीं सकती |जब प्रेम अपनी उच्चत्तम अवस्था में होता है तब न तो कही प्रेम नजर आता है ,न ही कोई प्रेमी और यहाँ तक कि प्रेम मापने का पैमाना (प्रमेय)भी अदृश्य हो जाता है |ऐसी अवस्था में किस को याद करना और किसको भूल जाना ?न तो किसी का ज्ञान रहता है ,न कोई ज्ञानवाला ,जानने वाला और न ही वह जिसे जाना जा सके (ज्ञेय)|सब कुछ अदृश्यमान हो जाना ही प्रेम की पराकाष्ठा है|इसको अधिक समझने के लिए एक कहानी याद आ रही है |
                    एक प्रेमिका अपने प्रेमी से मिलने के लिए बड़ी तेजी से जा रही थी|रास्ते में एक व्यक्ति मगरिब की नमाज अता कर रहा था |उसके सामने बिछे वस्त्र पर से वह लड़की  पाँव रखती हुई तेजी से अपने रास्ते पर निकल गयी ,जहाँ आगे उसका प्रेमी इंतज़ार कर रहा था | अपने प्रेमी से मिलकर जब वह वापिस लौटी तो वही नमाज़ पढ़ रहा व्यक्ति वहीँ बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था |उसने लड़की को कहा-"मैं खुदा की इबादत कर रहा था,और तू कितनी पागल थी,किसके लिए अंधी हो गयी थी  कि मेरे वस्त्र पर से पांव धरकर चली गयी |उसे  अपवित्र कर दिया |कहाँ खोई थी इतनी कि तुम्हे इस बात का ख्याल ही नहीं रहा कि मैं खुदा की इबादत कर रहा था?"उस लड़की ने बड़ा ही अच्छा जवाब दिया |वह बोली-"मैं तो अपने प्रेम में सब कुछ भूल बैठी थी,मेरे लिए सब अदृश्य हो गया था |मुझे कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था |परन्तु आप तो खुदा से प्रेम करते हो,उसकी  बंदगी करते हो फिर आपको खुदा के सिवाय यह सब कैसे नज़र आ रहा था ?यह आपका खुदा के प्रति कैसा प्रेम है जो आपको अपना वस्त्र मेरे पैरों से अपवित्र होता नज़र आ गया ?"  यह सुनकर वह नमाज़ी निरुत्तर हो गया |
                            इसको कहते हैं -प्रेम की प्रगाढ़ता|ऐसी प्रगाढता अगर परमात्मा के प्रति हो जाये तो फिर कहना ही क्या ?तभी कहते हैं कि प्रेम ही परमात्मा है |
                             लाली तेरे लाल  की,जित देखूं तित लाल |
                             लाली मैं देखन चली,हो गई लालम लाल ||
       जहाँ आपस में प्रेम इतना बढ़ जाये कि प्रेम करने वाला स्वयं को खो बैठे ,जब प्रेम करने वाला और प्रेम पाने वाला दोनों खो जाएँ ,दोनों एक दूसरे के रंग में रंग जाये,दो के स्थान पर एक रह ही जाये ,तब होती है प्रेम की उच्चत्तम अवस्था |इसी को कहते हैं -प्रेम की पराकाष्ठा |
                                        || हरिः शरणम् ||

Monday, January 6, 2014

प्रेम और भक्ति |

                                        प्रेम ही परमात्मा है|जिसका ह्रदय प्रेमपूर्ण होता है वही सब जगह,सभी में परमात्मा के दर्शन करता है |हम जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जिसने इस संसार में जन्म लिया है ,परमात्मा को प्राप्त करने की कोशिश करता है |परमात्मा को प्राप्त करने के मार्ग अलग अलग हो सकते हैं,परमात्मा के बारे में अलग अलग धारणाएं हो सकती है |परन्तु सबका लक्ष्य एक ही होता है-परमात्म-दर्शन |परमात्मा को पाने के लिए जिन रास्तों की चर्चा सबसे ज्यादा होती है ,उनमे सबसे अधिक लोकप्रिय भक्ति-मार्ग है |भक्त का शाब्दिक अर्थ ही एकाकार होना है-परमात्मा के साथ |भक्त वही जिसे विभक्त नहीं किया जा सके |और जहाँ दो नहीं हो,एक ही रह जाये- वह प्रेम कहलाता है,वही भक्ति कहलाती है |भक्ति में भक्त परमात्मा के साथ योग करके परमात्मा ही हो जाता है |यह सब भक्ति के कारण ही संभव है |भक्ति और प्रेम शब्द भले ही दो नज़र आते हों परन्तु दोनों समानार्थी कहे जा सकते हैं |
                      गीता के बारहवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण से अर्जुन पूछते हैं कि जो भक्त आपको सगुण और साकार रूप में भजते हैं और अन्य भक्त जो निराकार ब्रह्म को अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं उन दोनों में अतिउत्तम कौन है ?यहाँ अर्जुन ने दोनों को उत्तम ही बताया है,फिर भी उसकी शंका है कि दोनों में अतिउत्तम कौन है?श्रीकृष्ण ने उत्तर में सगुण-साकार की भक्ति करने वाले को दोनों में श्रेष्ठ बताया और कहा कि सगुणरूप परमेश्वर को भजने वाले योगियों में अतिउत्तम योगी कहे जाते हैं |निराकार की भक्ति करने वालों के बारे में वे कहते हैं -
                        क्लेशोSधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् |
                       अव्यक्ता      हि    गतिर्दु:खं  देहवद्भिरवाप्यते || गीता १२/५||
अर्थात्,उस निराकार ब्रह्म में आसक्ति चित्त वाले पुरुषों के साधन में अधिक परिश्रम है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्त अर्थात निराकार को दुःख पूर्वक ही प्राप्त किया जा सकता है |
        यहाँ भगवान स्पष्ट रूप से कहते हैं कि निराकार रूप में भजने वाले अपनी देह का अभिमान रखते हैं |इसका अर्थ यह है कि परमात्मा निराकार है और इसे मानव देह से ही साधना करके पाया जा सकता है |यही द्वैतवाद है |परमात्मा और हम दोनों को अलग अलग माना जाता है |जहाँ दों है ,वहाँ प्रेम हो ही नहीं सकता |इसीकारण से ऐसे व्यक्तियों में अपनी मानव देह के बारे में अभिमान होता है |ऐसे व्यक्ति निराकार की प्राप्ति के लिए जो भी साधन करते है , सभी कष्ट देने वाले होते हैं |इस प्रकार स्पष्ट है कि इस मानव देह अतिशय दुःख देकर ही निराकार को प्राप्त किया जा सकता है |द्वैतवाद में दो होते हैं इसलिए एक को कष्ट देकर ही दूसरे को पाना ही लक्ष्य होता है |जब दो के स्थान पर एक हो तो फिर किसको कष्ट देना और किसके लिए देना ?
                            ऐसा क्यों होता है कि साकार रूप की उपासना ,सगुण की आराधना का मार्ग तो आसान है और निराकार की साधना का मार्ग अति कठिन ?इसका एक मात्र उत्तर है-प्रेम|आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि साकार और निराकार की भक्ति के बीच यह प्रेम कहाँ से आ गया ?परन्तु यह शत-प्रतिशत सत्य है |प्रेम के लिए सौंदर्य आवश्यक है |और सौंदर्य व्यक्त में ही होता है साकार में ही होता है,अव्यक्त या निराकार में नहीं |आपको प्रकृति में सुंदरता नज़र आती है,आपको वृक्षों में सुंदरता नज़र आती है,आप समंदर को देखकर उसकी सुंदरता की गहराई में डूब जाते हो,आप सूर्योदय की लालिमा देखकर अभिभूत हो जाते हो ,आप किसी कलाकार की कलाकृति देखकर वाह वाह करते हो-क्यों?क्या आप बिना किसी दृश्य के किसी भी प्रकार की सुंदरता की कल्पना कर सकते हो ?नहीं,बिलकुल नहीं|और बिना सौंदर्य के प्रेम की भी कल्पना नहीं की जा सकती |सचमुच में बिना सौंदर्य के प्रेम होता भी कहाँ है ?यह साकार के सौंदर्य से अभिभूत होकर ही आपमें प्रेम का झरना फूट पड़ता है और यही प्रेम आपको परमात्मा तक ले जाता है |
                         निराकार की भक्ति करना रेगिस्तानी क्षेत्र में यात्रा करने के समान है |बिलकुल रूखा,सूखा मार्ग |किसी से भी निराकार के बारे में चर्चा करो तो बहुत कम लोगों को रूचिकर लगेगी |परमात्म-दर्शन में मैंने लिखा था कि भगवान कभी भी आपको अपनी कल्पना के आधार पर चतुर्भुज रूप में दर्शन नहीं देने वाले |इस प्रकार कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं था कि साकार भक्ति गलत है |अगर मेरे उन शब्दों से किसी की भावना को ठेस पहुंची हो तो मैं क्षमा चाहता हूँ|मेरा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं था |साकार भक्ति प्रेम पैदा करती है और प्रेम ही परमात्मा है |परमात्मा साकार है या निराकार,यह एक बहस का विषय हो सकता है |परन्तु प्रेम ही परमात्मा है ,यह बहस का विषय हो ही नहीं सकता |
                               हम सब भलीभांति जानते हैं कि परमात्मा वास्तव में निराकार ही है और समय समय पर वह साकार रूप में प्रकट होता रहता है |अंतिम सत्य तो निराकार ही है परन्तु उसको प्राप्त करने  के लिए आपको साकार की भक्ति के मार्ग से ही गुजरना होगा |क्योंकि आप साकार में ही सौंदर्य देख सकते हैं ,साकार से ही प्रेम कर सकते हैं ,निराकार से नहीं |जब आप साकार भक्ति से परमात्मा के साथ एकता स्थापित कर लेते हैं तो निराकार की अनुभूति अपने आप ही हो जाती है |यह ध्रुव सत्य है कि बिना प्रेम के परमात्मा है ही कहाँ ?निराकार परमात्मा को भी प्रेम पाने के लिए साकार यानि व्यक्त होना ही होता है |साकार रूप में वह प्रेम कर भी सकता है और प्रेम पा भी सकता है |
                           || हरिः शरणम् ||
                    

Sunday, January 5, 2014

प्रेम की परीक्षा |

                                          देखा जाये तो प्रेम शब्द इतनी विशालता लिए हुए होता है कि इसकी सीमा को जानना और पहचानना लगभग असंभव है |प्रेम ,इस संसार में प्रत्येक से किया जा सकता है ,चाहे वो आपका शत्रु ही क्यों न है |प्रेम करने वाले का कोई शत्रु नहीं होता परन्तु कोई अन्य व्यक्ति प्रेम करनेवाले से तो वैमनस्य रख ही सकता है ,इससे इन्कार नहीं किया जा सकता |ऐसी स्थिति में गीता स्पष्ट रूप से सन्देश देती है कि प्रत्येक से प्रेम करो,अपने शत्रु से भी परन्तु जो आपका मित्र हो उससे अतिशय प्रेम करो |भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मुझे भक्त अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिए भी भजते हैं ,दुःख पाने वाले और जिज्ञासु भी मुझे भजते है ,वे सभी मुझे प्रिय है |परन्तु सबसे प्रिय मुझे ज्ञानी भक्त है,जो जानते हैं कि प्रेम ही परमात्मा है और वो मुझे बिना किसी आकांक्षा के प्रेमपूर्वक भजते हैं |श्रीकृष्ण प्रेम के बारे में एकदम स्पष्ट है-संसार में सबसे प्रेम करो और अपने प्रेमी से अतिशय प्रेम करो |यह आपका भेदभाव बिलकुल भी नहीं है |
                                       जब आपको कोई प्रेम करता है तो वह आपको वास्तव में पूरी समग्रता के साथ प्रेम करता है |जीवन में ऐसे प्रेमी की कभी भी परीक्षा लेने की मत सोचना |अपने प्रिय की कही हुई प्रत्येक बात को आँख मूँद कर सही मान लेना,उस पर कभी भी अविश्वास नहीं करना |नहीं तो परिणाम भयावह होते हैं |एक बार एक पति ने अपनी पत्नी की इसी प्रकार प्रेम की परीक्षा लेनी चाही |उसने अपने कार्यालय से किसी अन्य व्यक्ति से फोन करवाया कि उसके पति की कार रास्ते में दुर्घटनाग्रस्त हो गई है और उस दुर्घटना में उनके पति की मृत्यु हो गयी है |फोन करवाने के बाद पति अपनी पत्नी की प्रतिक्रिया जानने के लिए घर गया तो देखा कि पत्नी फाँसी के फंदे पर झूल रही है और टेबिल पर नोट लिखा पड़ा था "मैं  अपने पति का वियोग सहन नहीं कर सकती ,अतः उनके पास ही जा रही हूँ | "कितना दुखद था -पति का अपनी पत्नी के प्रेम की परीक्षा लेना |
                                       इसी प्रकार का एक प्रसंग रामचरितमानस में शिव-सती से सम्बंधित आता है | एक बार शिव और सती संसार में भ्रमण को निकले |यह त्रेता युग की बात है |आकाश मार्ग से जब वे एक जंगल के ऊपर से जा रहे थे तो दोनों देखते हैं कि राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ सीते सीते नाम का विलाप करते हुए जा रहे थे |उस वक्त रावण ने सीता -हरण कर लिया था |शिव-सती विलाप सुनकर जंगल में उतरे|और राम-लक्ष्मण की तरफ बढे |राम ने शिव को देखकर प्रणाम किया |शंकर ने भी प्रत्युतर में प्रणाम किया |सती ने पूछा कि ये कौन हैं ?शंकर ने कहा कि ये साक्षात् परमात्मा है |सती ने शंका की कि परमात्मा होकर भी अपनी पत्नी के वियोग में इतना विलाप कैसे कर रहे हैं ?इसके लिए इनकी परीक्षा लेनी चाहिए |शंकर ने उन्हें समझाया कि परमात्मा की यह सब लीला है |परीक्षा लेने की सोचना भी मत |सती उनके साथ आगे चल पड़ी |परन्तु उनके मन में अभी भी शंका थी |आगे जाकर सती बोली-"भगवन!आप आगे चले,मैं भी परमात्मा को प्रणाम करके वापिस आपके पास आती हूँ |"शिव उनके मन की बात जान चुके थे |वे सती से बोले-"दैवी!सिर्फ प्रणाम करके लौट आना |परीक्षा लेने की कोशिश मत करना |वे परमात्मा है और परमात्मा की और प्रेम की कभी भी परीक्षा नहीं ली जाती है |"सती ने उनको "हाँ "कह दिया और तुरंत ही वहाँ से निकल पड़ी|रास्ते में शंका ने फिर अपना सर उठा लिया |अंततः सती ने उनकी परीक्षा लेने की ठान ही ली |उसने सीता का वेश बनाया और राम-लक्ष्मण की तरफ चली |राम उन्हें देखकर समझ गए कि यह सीता के वेश में माता सती ही है |उन्होंने उन्हें देखकर प्रणाम किया और बोले-"माते!मेरे ईश्वर कहाँ रह गए?आप अकेले इस वन में कैसे घूम रही है ?"अब सती को काटो तो खून नहीं|उसने तुरंत ही राम को प्रणाम किया और शिव के पास लौट आयी |शिव ने उसे पूछा कि उनकी परीक्षा तो नहीं ली थी ?सती ने झूठ बोलदिया |कहा -"नहीं|मैं तो उनको सिर्फ प्रणाम कर लौट आयी |"शंकर तो सर्वज्ञ हैं |वे सब जान गए |वे तत्काल कैलाश लौट आये |आते ही उन्होंने सती को कहा कि जो अपने प्रिय का कहना नहीं मानता और परमात्मा की परीक्षा लेता है ,उसे मैं बिल्कुल भी पसंद नहीं करता |अतः मैं आज तुम्हारा त्याग करता हूँ |"और इतना कहकर वे समाधिस्थ हो गए |
                                    समाधि से जागने के बाद भी शिव ने सती के साथ प्रिय जैसा व्यवहार कभी भी नहीं किया |एक लंबे समय उपरांत सती अपनी देह अपने पिता दक्ष के घर में त्यागती है औरपार्वती के रूप में  पुनर्जन्म लेकर एक लंबी साधना के बाद शिव को पुनः प्राप्त करती है |
                              ऐसी कहनियाँ हमें सावधान करने के लिए होती है |जिंदगी में कभी भी अपने प्रिय,प्रेम और परमात्मा की परीक्षा लेने का विचार भी नहीं करना चाहिए |
                                    || हरिः शरणम् ||
 

Saturday, January 4, 2014

प्रेम और परमात्मा |

                               कितने आश्चर्य की बात है कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा को पाना तो चाहता है,परन्तु उसको जानना बिलकुल भी नहीं चाहता |परमात्मा एक व्यक्ति के रूप में आपके पास आये और आपके गले लग जाये या आपको गले लगा ले,क्या ऐसा होना संभव है ?इस संसार में असंभव कुछ भी नहीं है |जो इस संसार का सूत्रधार है वह कहीं न कहीं तो होगा ही |और अगर ऐसा है तो फिर उसको प्राप्त करना हो भी सकता है |गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मेरे भक्त के लिए इस संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं है |आवश्यकता है,एक प्रेमी भक्त बनने की,ज्ञानी भक्त बनने की |
                                                    संसार  की प्रत्येक भौतिक वस्तु आपको प्राप्त हो सकती है-अपनी मेहनत से,अपनी चालबाजी से,चोरी से ,छीनाझपटी से ,असत्य बोलकर,लालच देकर,किसी को धोखा देकर आदि आदि विभिन्न प्रकार के प्रयासों से |परन्तु आप परमात्मा को इनमे से किसी भी तरीके से प्राप्त नहीं कर सकते |अगर इन तरीकों से परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता तो ऐसे सभी प्रयास तो कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले दुर्योधन ने आजमाए ही थे |फिर भी कृष्ण को अपने वश में नहीं कर सका था |
                       फिर  परमात्मा में ऐसा क्या है कि उनको उपरोक्त वर्णित सब प्रयासों से भी जाल में फंसाया नहीं जा सकता ?इसके लिए परमात्मा की प्रकृति को जानना आवश्यक है |जब शिशु इस संसार में आता है तब वह परमात्म स्वरुप ही होता है |उसकी प्रकृति और परमात्मा की प्रकृति में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं होता है |इसी कारण से हमें शिशु की हरकतें मोहक लगती है |उसका मन इतना निर्मल होता है कि हमें उसी में परमात्म-दर्शन होते हैं |ज्यों ज्यों शिशु बड़ा होता है ,सांसारिक गतिविधियां उस पर हावी होती जाती है,और वह अपने बाल-सुलभ स्वभाव से दूर होता चला जाता है |यही विकृति उसे परमात्मा से दूर करती चली जाती है |
                       निर्मल मन प्रेम का अथाह भंडार होता है |इसी कारण से शिशु सबको प्रिय होता है और शिशु को भी सभी प्रिय लगते हैं |तभी तो शिशु का संसार से अपना पहला संबंध मुस्कान के साथ ही स्थापित करता है |हमारी भाषा में इसे सामाजिक मुस्कान (Social smile)कहा जाता है |शिशु इस अवस्था में न तो यह जानता है कि दिल से उसको कौन प्रेम करता है और कौन उसके पास वैमनस्य भाव से आया है |वह तो सबका स्वागत अपनी प्यारी सी मुस्कान से करता है |इससे अधिक प्रेम परिपूर्णता का दूसरा उदहारण इस भौतिक संसार में हो ही नहीं सकता |एकदम यही स्वभाव ,यही प्रकृति परमात्मा की होती है |परमात्मा भी सबको समान दृष्टि से देखता है |हाँ,यह बात जरूर है कि उसे प्रेम से पूर्ण व्यक्ति सबसे प्रिय होते हैं|और प्रेम से परिपूर्ण होने वाले व्यक्ति ही परमात्मा के मित्र हो सकते हैं |अर्जुन इसी कारण से कृष्ण को मित्र रूप में पा सके थे |
                                प्रेम से परिपूर्ण होने के लिए आपको सिर्फ इतना ही करना होगा कि बालसुलभ स्वभाव बनाये रखें ,मन में किसीभी प्रकार की सांसारिक विकृति को प्रवेश न करने दें|जब आपका मन निर्मल हो जायेगा ,संसार में सभी समान नज़र आने लगेंगे तब आप सबमे परमात्मा के ही दर्शन करेंगे |आपमें उपस्थित प्रेम ही परमात्मा है ,इसके लिए आपको कहीं भी प्रेम पाने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा,कही भी परमात्मा को ढूँढने नहीं जाना होगा |स्वामी रामसुख दास जी कहा करते थे-
                         बात बड़ी है अटपटी,झटपट लखे न कोय |
                        ज्यों मन की खटपट मिटे,तो चटपट दर्शन होय ||
        मन कि खटपट यह ईर्ष्या,वैमनस्य,लालच,आकांक्षाये,कामनाये आदि विकार ही है |ज्यों ही ये सब मन से बाहर कर दिए जायेंगे फिर जो शेष बचेगा वह है-प्रेम |और प्रेम ही परमात्मा है |गोस्वामी तुलसीदासजी रामचरितमानस में लिखते हैं-
              " हरि व्यापक सर्वत्र समाना |प्रेम से प्रकट होइ मैं जाना ||"
                                                  || हरिः शरणम् ||

Friday, January 3, 2014

ये तो प्रेम की बात है......


स्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दूसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण ,प्रसन्नचित सी राधा...

कृष्ण सकपकाए, राधा मुस्काई
इससे पहले कि कृष्ण कुछ कहते राधा बोल उठी

कैसे हो द्वारकाधीश ?

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन
कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया
फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया

और बोले राधा से .........
मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ कुछ तुम अपनी कहो

सच कहूँ राधा जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बूंदे निकल आती थी

बोली राधा ,मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते

इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे

प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?

कुछ कडवे सच ,प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की
और समन्दर के खारे पानी तक पहुच गए ?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर
भरोसा कर लिया और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ
कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं
कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता

आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया
सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
अपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे

आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं
प्रेम वाले कान्हा पर ही भरोसा करते हैं
गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है
पर आज भी लोग उसके समापन पर

" राधे राधे" करते है......

---------------------------------------- यही है प्रेम की पहचान |
                           || हरिः शरणम् ||
                                                                                                             - भूपेंद्र मंगल्यारा के फेसबुक पेज से साभार 

Thursday, January 2, 2014

प्रेम और अवतार |

                                  प्रेम की चर्चा अधूरी रहेगी अगर हम परमात्मा के अवतारों की चर्चा न करें|जितने भी ईश्वरीय अवतार इस संसार में आये है,वे सभी प्रेम से परिपूर्ण थे |उन्होंने इस धरा पर प्रेम के पदचिन्ह छोड़े हैं जिनका अनुगमन कर मनुष्य प्रेम को प्राप्त कर सकता है |
                                 सबसे पहले मैं उदहारण देना चहुँगा ईसाई धर्म के प्रवर्तक प्रभु ईशु का |जिनका सम्पूर्ण जीवन प्रेम करने में ही व्यतीत हुआ |उनमे क्षमा भाव उनकी रग रग में समाया हुआ था |वे असहायों की सेवा करने में सदैव तत्पर रहा करते थे |कभी भी अपने से विरोधी व्यक्ति से उन्होंने ईर्ष्या नहीं की,वैमनस्य की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती |जब जीवन के अंतिम समय पर उन्हें सलीब पर लटकाया जा रहा था ,तब भी उन्होंने अपना क्षमाभाव नहीं त्यागा |उस वक्त उनके मुंह से निकले शब्द थे-"हे ईश्वर!इन्हें क्षमा करना,क्योंकि ये लोग यह नहीं जानते कि ये कर क्या रहे हैं?" अंत समय में भी ऐसा क्षमा भाव किसी फ़रिश्ते में ही हो सकता है |आज इस धर्म के अनुयाइयों में मदर टेरेसा को साक्षात् प्रेम की मूर्ति माना जा सकता है |
                               इस्लाम धर्म के संस्थापक मोहम्मद साहब इसी तरह ही प्रेम के एक सटीक उदहारण हैं|एक साधारण घर में पैदा हुए मोहम्मद साहब ने अपनी सम्पूर्ण जिन्दगी एक साधारण मनुष्य की तरह ही गुजारी|दीन-दुखियों की सेवा के लिए वे सदैव ही तत्पर रहते थे |उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी |उनके साथ कोई अगर दुर्व्यवहार करता था तो वे सहजभाव से उसे क्षमा कर दिया करते थे |इस बारे में एक घटना उनके जीवन से सम्बन्धित है जो बहुत प्रसिद्द है |मोहम्मद साहब जब घर से बाहर जाने के लिए वस्त्रादि पहन कर निकलते थे तो रास्ते में पड़ने वाले घर से एक महिला उनपर रोजाना कचरा फैक दिया करती थी |मोहम्मद साहब अपने कपड़ों से कचरा झाडकर मुस्कुराते हुए आगे निकल जाया करते थे |यह रोजाना का एक क्रम बन गया था |एक बार ३-४ दिनों तक लगातार महिला ने  उनपर कचरा नहीं फैंका |मोहम्मद साहब को बड़ा अचरज हुआ |पांचवें दिन भी जब ऐसा हुआ तो मोहम्मद साहब उसके घर गए और देखा कि महिला बुखार में तप रही है |उन्होंने उसकी लगातार कई दिनों तक तीमारदारी की |वे उसके घर तब तक जाते रहे जब तक कि वह महिला पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं हो गयी|महिला अब अपने किये पर शर्मिंदा थी |उसने मोहम्मद साहब से माफ़ी मांगी |ऐसा था मोहम्मद साहब में क्षमाभाव |
                              सनातन धर्म में श्रीकृष्ण पूर्णावतार कहे जाते हैं |उनको पूर्णावतार कहा ही इसीलिए जाता है क्यंकि वे प्रेम से परिपूर्ण थे | उनके द्वारा की गयी रास-लीला ,प्रेम के प्रकटीकरण का सबसे उत्तम उदाहरण है |रास-लीला में वे गोपियों के साथ नृत्य किया करते थे |प्रत्येक गोपिका को ऐसा आभास होता था मानो श्रीकृष्ण उसी  के साथ नृत्य कर रहे हों|इससे अच्छा सबके साथ एक जैसे प्रेम का उदाहरण संसार में अन्य मिलना मुश्किल है |जब श्रीकृष्ण बाल्यावस्था में थे तब उन्होंने जो लीलाएं अपनी माँ यशोदा के साथ की ,गोपियों का माखन चुरा कर खाना,उनकी दूध से भरी मटकियां फोड देना,अपने बाल सखाओं के साथ क्रीडा करना आदि सब प्रेम के उदाहरण ही तो है|एक ईश्वरीय अवतार होते हुए अर्जुन के सारथी बन जाना क्या बिना प्रेम के संभव था ?बरसाने की रहने वाली राधा के साथ उनका प्रेम तो इतनी उच्च कोटि का था कि आज मंदिर में कृष्ण के साथ राधा की मूर्ति होती है,और मंदिर भी राधाकृष्ण मंदिर कहलाता है |कहते हैं कि राधा और कृष्ण में इतना प्रेम था कि दोनों दो न होकर एक ही हो गए थे |जब लोग राधा को उसका नाम पूछते थे तो वह अपना नाम कृष्ण बताया करती थी |इसी प्रकार जब कृष्ण को उनका नाम पूछा जाता था तो वे अपना नाम राधा बताया करते थे |आज भी सनातन धर्म में यह किवदंती है कि श्री कृष्ण को पाना हो तो राधे-राधे बोलना चाहिए |कृष्ण इस नाम को सुनकर खींचे चले आयेंगे|
                              ये अवतार थे इस कारण से उनका व्यवहार प्रेमपूर्ण था या ये प्रेम से परिपूर्ण थे इसलिए अवतार कहलाये | इस विषय में वाद-विवाद हो सकता है |परन्तु मैं दोनों बातों को ही सही ठहराता हूँ |मेरे मत में प्रेमपूर्ण व्यवहार किसी को भी अवतार होने की योग्यता दिला सकता है |और ऐसा समग्रता के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार किसी अवतार का ही हो सकता है |आप चाहे इसे किसी भी प्रकार लें,दोनों ही परिस्थितियों में प्रेम का होना ही महत्वपूर्ण है |
                                 || हरिः शरणम् ||

Wednesday, January 1, 2014

प्रेम-एक आराधना|

Bye bye 2013
Thanks to those,who hated me,they made me a stronger person.
Thanks to those who loved me,they made my heart bigger.
Thanks to those who were worried about me,they let me know that they actually cared.
Thanks to those who left me,they made me realize that nothing lasts forever.
Thanks to those who entered my life,they made me who I am today .
Just want to THANKS all for being there in my life.
                HAPPY NEW YEAR 2014
             
                                                   प्रेम-देखने में,पढने में एक छोटा सा शब्द |परन्तु कितनी गहराई लिए हुए है यह शब्द |इस शब्द की जितनी भी व्याख्या की जाये ,वह कम ही है |कबीर ने कह तो दिया कि "ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय|"परन्तु क्या इस शब्द को ,इस प्रेम को पढना इतना आसान है,जैसा कि यह प्रतीत होता है |नहीं,बिलकुल नहीं |प्रेम को पढ़ा नहीं जाता ,प्रेम किया नहीं जाता बल्कि प्रेम को तो जीया जाता है |इस प्रेम को जीने को ही कबीर ने पढना कहा है |कबीर के अनुसार जो व्यक्ति प्रेम को ही, प्रेम में ही और प्रेम के लिए ही जीता है वास्तव में वही प्रेम को पढ पाता है |वही प्रेम का असली अर्थ जानकर पंडित हो जाता है |
                                                प्रेम कोई करने या होने का कार्य नहीं है |प्रेम तो एक साधना है |प्रेम को जानने और समझने के लिए वर्षों लग जाते हैं ,जब तक आप इस शब्द को साहित्य या शब्दकोष में ढूँढते हो,हो सकता है आप इसको फिर भी समझ न पायें |आप तत्काल भी प्रेम को उपलब्ध हो सकते हैं |आवश्यकता है आपकी लगन की,आपकी साधना के प्रति लगन की |
                                  कबीर कहते हैं-
                                          मन ऐसा निर्मल भया , जैसे गंगा नीर |
                                          पाछे पाछे हरि फिरे , कहत कबीर कबीर ||
             अपना मन इतना पवित्र कर लीजिए कि उसमे प्रेम के सिवाय कुछ भी नहीं रहे |ईर्ष्या,वैमनस्य ,वासना,अधिकार की भावना,अहंकार,कामनाएं, इच्छाएं आदि सब बाहर निकल जाये और सम्पूर्ण मन प्रेम से भीग जाये यह स्थिति एक निर्मल मन की स्थिति होती है |ऐसे मन को फिर परमात्मा को ढूँढने की आवश्यकता नहीं रहती,स्वयं परमात्मा ऐसे मन ,ऐसे सुन्दर मन वाले को ढूंढ ही लेते हैं |
                         परन्तु क्या मन को इतना निर्मल,इतना पवित्र और इतना खूबसूरत कर लेना इतना ही आसान है ?इस भौतिक संसार में सभी व्यक्ति पवित्र मन लेकर ही आते हैं |ज्यों ज्यों संसार सागर की गहराई में  उतरते जाते हैं ,मन इन सब विकारों को ग्रहण करता चला जाता है |प्रेम पाने के लिए वह दर दर भटकता है परन्तु ऐसे मन में प्रेम का अंकुर भी कैसे फूटेगा?यह वह नहीं समझ पाता है |इसके लिए उसे आराधना की आवश्यकता होती है |आराधना,जिसमे सब कुछ भूलकर ,इन सब विकारों से मन को साफ कर केवल अपने साध्य की ,अपने प्रेमी की पूजा ,बंदगी करनी होती है |तभी प्रेम को पाया जा सकता है |
                                   || हरिः शरणम् ||