सम्भवामि युगे युगे -58
आज सुतीक्ष्ण जी को अवसर मिला है, गुरु-ऋण उतारने का । गुरु का दिया ज्ञान शिष्य पर ऋण होता है । जो शिष्य गुरु की कही गई बात को जीवन में उतार ले तो वह ऋण मुक्त हो जाता है । अगस्त्य जी के ज्ञान की अनुपालना से सुतीक्ष्ण जी को राम मिले । अब सुतीक्ष्णजी अपने गुरु से राम को मिलाकर ऋण उतारने जा रहे हैं ।
शिष्य सुतीच्छन ने भगवान को अपने गुरु की वन में उपस्थिति का संकेत भी कर दिया है । अगस्त्य ऋषि भविष्यदृष्टा भी हैं । राम,सीता, लखन की भावी-यात्रा को देखकर अगस्त्यजी समझ जाते हैं कि आगे क्या होने वाला है । सीता-हरण, फिर उनकी खोज, दुष्ट राक्षसों का वध, शबरी से भेंट,बाली का उद्धार आदि । सेतु निर्माण की ओर दृष्टि जाते ही उनको हंसी आ गई । वाह प्रभु ! किसी काम का अपने भक्त को श्रेय देना कोई आपसे सीखे । काम आप करते हो और नाम हमारा हो जाता है । शाप को आशीर्वाद में बदलना केवल आपके ही वश में है । मैंने तो दो नटखट बालकों को शाप दिया था । उस समय मैं नहीं जानता था कि वह शाप न होकर वरदान है । उन्हीं दो नादान बालकों को मैं सेतु निर्माण करते देख रहा हूँ ।
अगस्त्यजी कुटिया से बाहर आकर भगवान राम से भेंट करते हैं । भगवान के दर्शन करते ही अगस्त्यजी के नेत्रों में जल भर आया । दोनों भाई (राम और लक्ष्मण) मुनि के चरण कमलों में गिर पड़े । ऋषि ने उठाकर दोनों को हृदय से लगा लिया । कुशलक्षेम पूछकर आसन पर बैठाया और स्तुति करने लगे । ऋषि कहते हैं कि आज मेरे समान भाग्यवान कोई नहीं है । आश्रम में रहने वाले अन्य मुनिगण श्री राम के दर्शन कर धन्य हो गए ।
राम कह रहे हैं - ‘ मुनि ! आप से क्या छिपाव, आप सबकुछ जानते ही हैं कि मैं यहां क्यों आया हूँ ? आप मुझे वही सलाह दीजिए जिससे मैं त्रसित मुनियों को राक्षसों के भय से मुक्त कर सकूं ।’ भगवान अगस्त्यजी से रहने के लिए उचित स्थान पूछते हैं । ऋषि सब समझते हैं, भविष्यदृष्टा जो हैं । बोले - ‘हे नाथ ! आपने क्या सोचकर मुझसे सलाह मांगी है ? आप समस्त लोकों के स्वामी हैं, फिर भी मुझसे पूछते हैं । आपने मुझसे एक मनुष्य की तरह प्रश्न किया है, तो मैं कहता हूँ कि आप सीताजी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए । मुझे अनन्य प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य और आपके चरण कमलों में अटूट प्रेम प्राप्त हो । आप अपने भक्तों को सदैव ही बड़ाई दिया करते हैं, इसी से आपने मुझसे ऐसा प्रश्न किया है ।’
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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