सम्भवामि युगे युगे -57
वन में आगे बढ़ते हुए राम की एक आश्रम में सुतीच्छन ऋषि से भेंट होती है । सुतीच्छनजी अगस्त्य ऋषि के शिष्य हैं । भगवान से प्रेमाभक्ति ही चाही, सुतीक्ष्णजी ने । अपने गुरुजी से मिलाने के लिए सुतीक्ष्णजी भी साथ हो लिए । इस प्रकार विभिन्न ऋषियों से रास्ते में भेंट करते हुए भगवान अपनी भार्या और अनुज के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम जा पहुंचे । सुतीक्ष्णजी ने अन्दर प्रवेश कर अपने गुरु को प्रणाम किया और सूचना दी कि जगत् के आधार राम अपनी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ आपसे मिलने आए हैं । कुम्भज ऋषि देखते ही परमात्मा को पहचान गए ।
अगस्त्यजी का एक नाम कुम्भज भी है क्योंकि उनका जन्म घड़े से हुआ था । घड़े से जन्म ! है न आश्चर्य की बात । कई वर्षों पहले ऐसा होना आश्चर्य की बात मानी जाती थी परन्तु आज नहीं क्योंकि आज शरीर से बाहर भी निषेचन (fertilisation) होने लगे हैं । अतः यदि हम अगस्त्यजी को संसार के प्रथम परखनली शिशु (Test tube baby/ IVF Baby) भी कह दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
अगस्त्यजी की माता उर्वशी, स्वर्ग की अप्सरा थी । स्वर्ग की अप्सरा का चिरयौवना होना आवश्यक है । मित्र और वरुण नामक दो देवता, आसक्त हो गए उर्वशी पर । इधर दोनों देवता और उधर स्वर्ग की अप्सरा । मना भी नहीं कर सकती उनको और साथ ही यौवन भी सुरक्षित रखना था । इस द्वन्द्व में फँसी उर्वशी के सामने एक ही विकल्प बचा, घड़े को माध्यम बना लिया । दोनों देवताओं के स्खलित शुक्र (sperms) और उर्वशी के दो डिम्ब (ovum) एक घड़े में डालते हुए उसे प्रकृति द्वारा निर्धारित काल-क्रिया के लिए उपयुक्त वातावरण में रख दिया गया ।
परिणाम, दो शिशुओं का जन्म - अगस्त्यजी और वशिष्ठजी । वशिष्ठजी छोटे हैं, जो बड़े होकर अवध के राजगुरु बने । अगस्त्यजी बड़े हैं, उनका जन्म वशिष्ठजी से पहले हुआ, इसलिए वे ही कुम्भज कहलाए । वशिष्ठजी को अवध के राजगुरु होने का यह लाभ मिला कि उन्हें राम के दर्शन अपने अग्रज से पहले हुए । अगस्त्यजी तो ऋषि थे, बड़े होते ही वन में तपस्या करने चले गए । कथा के वर्तमान में वे दण्डकारण्य में भगवान की प्रतीक्षा कर रहे हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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