Saturday, August 29, 2026

मौन -16

 मौन -16

       गीता में भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं - 

                   शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।

                   आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ।। 6/25 ।।

            धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे (संसार से) उपराम हो जाय और मन-बुद्धि को परमात्मस्वरूप में सम्यक् प्रकार से स्थापन करके फिर कुछ भी चिंतन न करे ।

              संसार परिवर्तनशील है । इसमें स्थिरता का न होना ही मनुष्य को दुःखी-सुखी करता है । मनुष्य चाहता है कि उसके जीवन में जो सुख आया है, वह टिके । वह यह भी जानता है कि सतत परिवर्तित होने वाला सदैव एक ही दशा में कैसे रह सकता है, फिर भी मनुष्य उसको पकड़े रखने का प्रयास करता है । ऐसे में संसार से उपराम कैसे हुआ जा सकता है ? भगवान कहते हैं - उपराम होने के लिए धैर्ययुक्त बुद्धि का होना आवश्यक है । बुद्धि को एक परमात्मा में बार-बार लगाते रहने से एक अवस्था ऐसी आती है, जब मनुष्य संसार से उपराम हो जाता है ।

        संसार से उपराम हो जाने पर मन-बुद्धि को परमात्मस्वरूप में सही रूप से स्थापित करना सरल हो जाता है । इस अवस्था में एक परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, इस बात का ज्ञान हो जाता है । इस अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् कुछ भी चिन्तन नहीं करना है । यह मौन की अवस्था है । फिर परमात्मा का चिन्तन भी नहीं होता । इसका अर्थ यह है कि फिर परमात्मा का चिन्तन करना नहीं पड़ता बल्कि सतत और स्वतः होता है, जिसका भान साधक को भी नहीं होता ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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