मौन -15
भारतीय दर्शन में मौन को एक गहन साधना माना गया है । उपनिषदों में मौन के बारे में कहा गया है कि सत्य का अनुभव साधक को मौन और निःशब्द कर देता है । सत्य का अनुभव कभी शब्दों के माध्यम से न तो किया जा सकता है और न ही व्यक्त किया जा सकता है । जितना उसे व्यक्त करने का प्रयास किया है, वह केवल उस सत्य की ओर किया गया संकेत मात्र है, सत्य का वर्णन नहीं है । सत्य तो अनुभवगम्य और अवर्णनीय है । सत्य का अनुभव तो केवल मौन और प्रत्यक्ष अनुभूति से होता है । फिर जो वाक् मौन जैसा घटित होता है, वह वास्तव में सुषुप्ति मौन ही है ।
अब बात करते हैं, मूक सत्संग की । मूक सत्संग का अर्थ है, मौन के माध्यम से सत्य का संग । ऐसा सत्संग जिसमें शब्दों की अपेक्षा मौन को अधिक महत्व दिया जाता है । भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में कई संतों ने मौन को ही सर्वोच्च साधना माना है । रमण महर्षि ने अपने जीवन में मूक-सत्संग को विशेष महत्व दिया था । उनके अनुसार मौन अपने आप में सबसे गहरा उपदेश है क्योंकि सत्य का अनुभव शब्दों से परे है ।
सनातन धर्म में माना जाता है कि जब मन पूर्णतया शान्त होता है, तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के सर्वाधिक निकट होता है । इसे गीता में ध्यान-योग कहा गया है । ध्यान में व्यक्ति अपने भीतर की ओर केन्द्रित होता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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