मौन -12
मन बड़ा चंचल है । अर्जुन कहते हैं कि इसको रोकना तेज वायु-प्रवाह को बाँधने की तरह ही बड़ा कठिन है । तब भगवान ने मन की चंचलता के निग्रह के दो उपाय बताए हैं - अभ्यास और वैराग्य । अभ्यास से आशय है कि मन जिन विषयों की ओर दौड़ता है, उसको बलपूर्वक वहाँ से हटाना । वैराग्य से आशय है, राग न रखना । मन के विषयों की ओर दौड़ने का प्रमुख कारण है - राग । किसी के प्रति मोह और आसक्ति का नाम ही राग है । राग मन के भीतर कामना को जन्म देता है और उस कामना को पूरा करने के लिए मन विषयों की और दौड़ पड़ता है ।
वैराग्यवान होने के लिए अनासक्त होना पड़ता है । अनासक्त व्यक्ति का मन अमन हो जाता है । इस प्रकार मन की चंचलता स्वतः ही मिट जाती है । फिर मन विषयों के बीच रहते हुए भी उदासीन बना रहता है । इससे मन मौन अवस्था में चला जाता है । इस स्थिति को मानस-मौन भी कहा जाता है । मानस-मौन की अवस्था ही सुषुप्ति-मौन की अवस्था है । भगवान ने (गीता -2/69) में स्पष्ट किया कि संसार में आसक्त मनुष्य की जब रात होती है, तब उस रात में भी संयमी मनुष्य जागता है । सांसारिक मनुष्य सोते हुए स्वप्नावस्था में भी संसार में रमण करता रहता है और परमात्मा से विमुख बना रहता है । संयमी मनुष्य (जिसने इंद्रिय-मौन को साध लिया है) रात को निद्रावस्था में भी अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखता है । संयमी मनुष्य सोते हुए भी होश खोता नहीं है बल्कि भीतर से जाग्रत बना रहता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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