Thursday, August 27, 2026

मौन -14

 मौन -14

          जब विचारशून्यता की अवस्था को उपलब्ध हो जाएंगे, तब वास्तविक मौन घटित होता है अर्थात् बाहर और भीतर, दोनों तरफ़ से मौन हो जाना । यही सुषुप्ति मौन है, जिसमें आत्म-स्वरूप का अनुभव हो जाता है । यह अनुभव बड़ा विलक्षण है, जिसमें परमात्मा की अनुभूति होती है । मौन की अवस्था की राह पकड़ कर आत्मस्वरूप तक पहुंचने का प्रयास ही मौन-साधना है, चुप-साधन है और मौन की अवस्था में परमात्मा के संग का अनुभव करना मूक-सत्संग है ।

           मौन-साधना से हम मौन की अवस्था को उपलब्ध हो जाते हैं । यह साधना वाक्-मौन से प्रारम्भ होती है और अंततः सुषुप्ति मौन तक पहुँच जाती है । सुषुप्ति-मौन का अर्थ है- संसार की ओर से पूर्ण रूप से विमुख हो जाना । स्वामीजी कहते हैं कि संसार से विमुख हो जाएं अथवा परमात्मा के सम्मुख हो जाएं, दोनों एक ही बात है । संसार से विमुखता स्वतः ही आत्म-ज्ञान करा देती है ।

             इस प्रकार मौन साधना के तीन स्तर माने जा सकते हैं - वाचिक मौन, मानसिक मौन और आत्मिक मौन । वाचिक मौन में अनावश्यक बोलना का त्याग करना है । मानसिक मौन में इंद्रियों और उनके विषयों से उदासीन बने रहकर मन में उठने वाले विचारों का केवल साक्षी बनना है । धीरे-धीरे विचार स्वतः ही उठने बंद हो जाते है और मानसिक मौन घटित हो जाता है । आत्मिक- मौन में मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को अनुभव करता है । ऐसा अनुभव करना ही मौन-साधना का लक्ष्य है ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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