Wednesday, August 26, 2026

मौन -13

 मौन -13

      भगवान कहते हैं कि सांसारिक मनुष्य सूर्योदय होने पर जागता है और दिन भर सांसारिक भोगों में रत तथा भविष्य को सुरक्षित करने के लिए संग्रह करने में लगा रहता है, एक मुनि की दृष्टि में ऐसा दिन भी रात के समान है । भोग और संग्रह की कामना मन में उत्पन्न होती है । मुनि के मन में ऐसी कोई कामना नहीं उठती । उसका मन सदैव उसके वश में रहता है । मुनि के लिए मन की चंचलता कोई महत्व नहीं रखती । 

          जब आप चंचल मन की चंचलता के साथ चंचल नहीं होंगे तो मन की चंचलता स्वतः ही शान्त हो जाएगी । हमें मन को न तो एकाग्र करना है और न ही मन को मारने का प्रयास करना है बल्कि मन की चंचलता की ओर से उदासीन हो जाना है । मन में चंचलता के कारण उसमें विचार आयेंगे ही, यह निश्चित है । अतः इनको रोकने का प्रयास न करें । विचारों को आने से रोकने का जितना प्रयास करेंगे, उतनी ही उनकी तीव्रता बढ़ती जाएगी । 

          स्वामीजी कहते हैं कि ये मन में उठ रहे विचार गली के कुत्ते की तरह हैं । ज़रा सी खिड़की खुली हुई दिखी कि तत्काल ही कुत्ता घर में घुस आता है । भीतर आए कुत्ते की तरफ़ ध्यान नहीं देंगे तो वह घूम फिर कर अपने आप उसी खिड़की से बाहर चला जाएगा । जितना उस कुत्ते को भगाने का प्रयास करेंगे, वह घर के एक कोने से दूसरे कोने में दौड़ता रहेगा, बाहर नहीं निकलेगा । यही हाल मन में उठने वाले विचारों का है । जितना विचारों को बाहर निकालने का प्रयास करेंगे उतनी ही उनकी तादाद और तीव्रता बढ़ती जाएगी । यदि हम उन विचारों पर ध्यान नहीं देंगे तो स्वतः ही वे धीरे-धीरे कम होते जाएँगे । अंततः एक स्थिति ऐसी आयेगी जब मन विचार-शून्य हो जाएगा । यही ध्यान की सर्वोच्च अवस्था है जिसे विचारशून्यता (thoughtlessness) की अवस्था भी कहा जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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