मौन -11
सुषुप्ति मौन में मन के सभी संकल्प-विकल्प शान्त हो जाते हैं, इंद्रियाँ विषयों की ओर नहीं दौड़ती और भीतर गहरी शान्ति और स्थिरता रहती है । इसे ध्यान और आत्मचिन्तन की सर्वोच्च अवस्था कहा जाता है । सुषुप्ति मौन में साधक सदैव जाग्रत रहता है, सोता नहीं है । भगवान गीता में कहते हैं -
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ।। गीता -2/69 )
संपूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मा से विमुखता) होती है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है और जिसमें सब प्राणी जागते है (भोग और संग्रह में लगे रहते हैं), वह (तत्व को जानने वाले) मुनि की दृष्टि में रात है ।
मनुष्य का बाहर से मौन होना अपेक्षाकृत सरल है । बाहर से मौन हो जाने से अर्थ है - वाक् मौन । मन की उठापटक वाक् मौन को भी दीर्घ अवधि तक स्थिर नहीं रहने देती । मन को मौन करना बड़ा कठिन है । जिसने मन पर विजय पा ली है उसके तीनों काष्ठ मौन (वाक्, इंद्रिय और काष्ठ) स्वतः सध जाते हैं । परन्तु मन को साधना बड़ा ही दुष्कर है ।
मन की उठापटक का कारण उसकी चंचलता है । मैं यह करूँ, वह करूँ; ऐसा करूँ वैसा न करूँ ; ऐसे संकल्प-विकल्प मन में सदैव चलते रहते हैं । मन की इस चंचलता के कारण ही व्यक्ति के जीवन में कभी शांति नहीं आ सकती । आप सब कुछ कर सकते हैं परंतु शांत नहीं हो सकते क्योंकि आपने मन को छूट दे रखी है । मन की चंचलता को आपने शह दी है, मन स्वतः कुछ नहीं कर सकता । इस प्रकार मन को खुला छोड़कर आप उसके वश में हो गए हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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