Wednesday, July 29, 2026

गुरु -पूजा

 गुरु-पूजा

       ‘गुरु’ कोई व्यक्ति नहीं है, ‘गुरु’ वह है जिसमें गुरुत्व गुण हो अर्थात् आकर्षित करने का गुण । इस प्रकार ‘गुरु’ का अर्थ है, वह व्यक्ति जिसमें आकर्षित करने की क्षमता है । बहुत से लोग आत्मज्ञानी हुए है, परंतु सभी ‘गुरु’ नहीं हुए क्योंकि ‘गुरु’ में आत्मज्ञान होने के साथ-साथ और गुणों की भी आवश्यकता होती है ।आत्मज्ञान का संदेश दूसरे के भीतर तक पहुँचाने के लिए अभिव्यक्ति-कुशल होना आवश्यक है । जो मौन और निःशब्दता के अपने अनुभव को शब्दों में रूपांतरित कर दे, वही ‘गुरु’ हो सकता है । अनुभवी और शास्त्र-ज्ञान में कुशल व्यक्ति ही अपने शब्दों को तीर की भाँति किसी के भी हृदय में उतार सकता है । कोई स्वामीजी जैसा बिरला ही ‘अवर्णनीय का वर्णन’ कर सकता है । निःशब्दता को शब्द प्रदान करने की उच्च कला उनमें थी ।

          क्या आपको भी ऐसे ही किसी ‘गुरु’ की तलाश है ? उत्तर यदि ‘हाँ’ में है तो पहले आपको स्वयं एक आदर्श शिष्य बनना होगा । स्मरण रहे, केवल गुरु के कहे शब्द ही आपको आत्मज्ञान कराते हुए मुक्त नहीं कर सकते । आदर्श शिष्य वही है जो गुरु के शब्दों को सम्हाल सके । गुरु तो अपने अनुभव को शब्द दे सकता है परंतु आदर्श शिष्य वही है जो उनके कहे गए शब्दों को अपने भीतर ले जाकर उन्हें पुनः मौन और निःशब्दता में बदल दे । गुरु आपको अपने अधीन नहीं करता बल्कि सहारा देते हुए आपको अपने पैरों पर खड़ा करता है, फिर एक दिन वह सहारा भी आपसे छीन लेता है जिससे तुम स्वयं भी ‘गुरुत्व’ के गुणों से ओतप्रोत हो जाओ ।

         जीवन में जिनसे भी आपने ज्ञान लिया है, जिनके शब्दों ने आपको भीतर तक प्रभावित और परिवर्तित किया है, उन सभी को ‘गुरु’ कहा जा सकता हैं परंतु आदर्श ‘गुरु’ वही है जिनके शब्दों ने आपके भीतर की उठापटक को शांत करते हुए मौन और निःशब्दता में बदल दिया हो । मेरे जीवन में भी ऐसे ही एक व्यक्तित्व का परमात्मा की कृपा से पदार्पण हुआ जिसने मेरे भीतर की उठापटक को शांत करते हुए जीवन की दिशा को परिवर्तित किया है । मैं यह नहीं कहता कि मैं एक आदर्श शिष्य हूँ परंतु वे एक आदर्श ‘गुरु’ अवश्य हैं । जिसमें गुरुत्व का गुण होता है, ऐसे व्यक्ति स्वयं को कभी ‘गुरु’ कहलाना कभी पसंद भी नहीं करते । इसी गुण के कारण वे अधिक प्रचारित नहीं होते परंतु कोई न कोई तो उनको फिर भी पहचान लेता है ।

            आज गुरु-पूर्णिमा के पावन अवसर पर ऐसे ही एक व्यक्तित्व आचार्य श्री गोविंद राम जी शर्मा को मैं दण्डवत प्रणाम करता हूँ । उनकी पूजा के लिए उपरोक्त शब्दों के अतिरिक्त मेरे पास कुछ भी नहीं है और इन शब्दों को प्रकट कराने में उनकी परोक्ष भूमिका भी है । जीवन में सीखने और जानने योग्य जो भी है, इन्हीं के सानिध्य में रहकर सीखा और जाना है । 

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताय ।।

आपको एक बार पुनः प्रणाम ।

।। हरिः शरणम् ।।

डॉ. प्रकाश काछवाल

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