Monday, July 27, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -64

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -64

               इन्द्रियां दबती नहीं है । इनको चाहे जितना दबा लो, हमसे ये दबेगी भी नहीं । ऐसे में विरक्त होना छोड़ कर इन्द्रियों का समुचित उपयोग (कर्म) करते हुए संसार की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने में लग जाओ, अनासक्ति स्वयं ही आ जाएगी । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में यही बात कहते हैं कि कर्म न करने से; कर्म करना उचित है (गीता-3/8) । एक मनुष्य के लिए विरक्त होने से अच्छा है कि वह संसार की सेवा करने के लिए अनासक्त होकर कर्म करे ।

            आसक्ति का कैसा प्रभाव होता है, यह आप स्वयं ही देख लीजिये । ‘आसक्ति से अनुरक्ति’ की राह में चलते हुए ‘अनासक्ति’ विषय पर ही आकर अटक गया हूँ । लिखने की मेरी आसक्ति इतनी अधिक प्रबल हो गयी है, जो एक छोटे से लेकिन महत्वपूर्ण विषय को स्पष्ट करने के लिए इतना अधिक विस्तार दे दिया है । इसी प्रकार जब हम किसी भोग को एक बार भोग लेते हैं, तब उसको बार-बार भोगने की इच्छा जाग्रत होकर बढ़ती जाती है । यह बार-बार भोग प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कर्म करने को विवश होना ही आसक्ति है । एक बार त्याग पूर्वक भोगना अर्थात मन में बार-बार भोगने की इच्छा नहीं रखना ही हमें आसक्ति से दूर रख सकता है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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