आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -63
विरक्ति और अनासक्ति दोनों में से अनासक्ति को ही क्यों चुनें ? स्पष्ट करने के लिए पहले एक कहानी सुनाता हूँ । एक विरक्त तपस्वी ने कई वर्षों तक तप किया, मोक्ष प्राप्ति के लिए । आखिर एक दिन उसका भौतिक शरीर छूटा और जीवात्मा पहुँच गया धर्मराज के यहाँ । धर्मराज ने उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखकर उसे स्वर्ग ले जाने का आदेश दिया । जीवात्मा तो मोक्ष चाहता था अतः उसने प्रतिवाद किया । जीवात्मा ने कहा कि ‘मैंने बहुत काल तक तप किया है, मैं तो मोक्ष का अधिकारी हूँ । मुझे स्वर्ग ही क्यों ?’
धर्मराज ने कहा, ‘बिलकुल सत्य है कि आपने कठोर तप किया है परन्तु केवल कठोर तप आपको मोक्ष नहीं दिलवा सकता । इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने और कर्म करने के स्थान पर आपने उनको दबाकर, उनका दमन करते हुए तप किया है । आपने स्वयं के लिए इतना सब कुछ किया है, जबकि यह शरीर परमात्मा ने आपको संसार की सेवा करने के लिए, परमार्थ के लिए दिया है, न कि केवल स्वयं की स्वार्थ-सिद्धि के लिए । अगर आपको मोक्ष ही प्राप्त करना है तो इसके लिए सर्वप्रथम आप स्वर्ग को भोगिये और फिर मनुष्य योनि प्राप्त कर संसार की सेवा कीजिये, तभी आप मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी बन पायेंगे ।’
अध्यात्म-पथ पर अग्रसर प्रत्येक व्यक्ति की ऐसी ही स्थिति है । संसार की सेवा करने का विचार त्यागकर केवल इन्द्रियों को दबाने में लगे हुए हैं और इन्द्रियां है कि दबती ही नहीं है । ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज साफ़-साफ़ कहा करते थे ‘संसार की सेवा करो और पिंड छुडाओ ।’ सुनने में बड़ी साधारण सी बात लगती है परन्तु बड़ा गूढ़ सार है उनकी कही इस बात में ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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