Friday, July 24, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -61

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -61

           द्रष्टा बनने का प्रयास करने से पूर्व साक्षी बनना होगा । इस मनुष्य शरीर के रहते-रहते साक्षी बन गए तो भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी । परन्तु साक्षी होना अनासक्त होने के एक-एक सूत्र को समझकर अपनाने से ही संभव होगा । जिस दिन आप साक्षी-भाव में आ गए, समझ लो आप में अनासक्ति आ गयी और आप अनासक्त हो गए । 

             एक बार के लिए विरक्त हो जाना सबसे सरल है परन्तु सदैव के लिए विरक्त बने रहना सबसे कठिन है । आसक्ति की जब अति हो जाती है, तब व्यक्ति विरक्ति की तरफ मुड़ जाता है परन्तु यह विरक्ति इसलिए अस्थायी रहती है क्योंकि इन्द्रियों को बल पूर्वक दबाया गया है, सोच-समझ कर नियंत्रित नहीं किया गया है । अति आसक्ति जब दुखदायी हो जाती है, तब व्यक्ति अस्थायी रूप से विरक्ति की तरफ चला जाता है । प्रत्येक भोग प्रारम्भ में अमृत तुल्य प्रतीत होता है परन्तु अंत में दुःख देने वाला ही होता है । यह बात हम अल्प समय के लिए तो समझ लेते हैं परन्तु उसी भोग के पुनः सामने आते ही इस बात को विस्मृत कर बैठते हैं ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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