आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -53
आइए ! आगे बढ़ते हैं, अनासक्त होने के एक और सूत्र की ओर । एक संत घने जंगल में कुटिया बनाकर अपने शिष्य के साथ साधना किया करते थे । पास में स्थित गाँव वाले अपनी-अपनी श्रद्धानुसार उनके खाने-पीने आदि का प्रबंध कर दिया करते थे । संत बड़े ही आत्म-रत प्रवृति के थे, उन्हें अपने शरीर, दीन-दुनिया आदि की कोई चिंता नहीं रहती थी । परन्तु शिष्य कई बार भोजन, कपड़ों और आजीविका आदि की चिन्ता कर लिया करता था । संत उसे बहुत समझाते, परन्तु शिष्य फिर भी कभी-कभी उनसे मिले ज्ञान को विस्मृत कर देता था ।
एक बार गाँव का एक व्यक्ति एक दुधारू गाय को लेकर संत की कुटिया में आया । संत को गाय सौंपते हुए संत उसने कहा कि ‘मैं गाँव छोड़कर जा रहा हूँ । न जाने वापिस लौटकर कभी आ पाऊंगा अथवा नहीं । इस गाय को आपके सिवाय किसी अन्य के पास छोड़ना मेरे को उचित नहीं लगा । अतः यह गाय आपको देकर जा रहा हूँ । आप इसकी सुगमता से देखभाल भी कर सकते हैं ।’ संत ने उस व्यक्ति को कुटिया के खुले भाग में गाय को बांधने का कह दिया । व्यक्ति ने संत को प्रणाम किया और दूसरे गाँव जाने के लिए यात्रा पर निकल गया ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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