आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -60
जब आप स्वयं को शरीर समझने लगते हो, समस्या तभी पैदा होती है अन्यथा आत्मा को इन सब से क्या प्रयोजन ? आप आत्मा हैं, शरीर नहीं हैं, इस बात को स्वीकार कर लेने से ही व्यक्ति में साक्षी-भाव आ सकता है अन्यथा नहीं । साक्षी-भाव के कारण न तो आप किसी भोग-कर्म के प्रति आसक्त हो सकते हो और न ही उससे विरक्त । जो न आसक्ति है और न ही विरक्ति, बल्कि इन दोनों के मध्य जो है, वही अनासक्ति है ।
आत्मा साक्षी है अर्थात् आप स्वयं जिसे ‘मैं’ कहते हैं, वह साक्षी है । साक्षी समस्त संसार और उसके कार्यकलापों को निरपेक्ष भाव से देखता है । साक्षी केवल स्वयं को नहीं देखता । जिस दिन वह स्वयं को भी देखने लग जायेगा उसे साक्षी से द्रष्टा होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी । आत्मा साक्षी है, परमात्मा दृष्टा है । साक्षी वह कलाकार है, जो अभिनय तो करता है परन्तु अभिनीत पात्र से उसका कोई सरोकार नहीं रहता । दृष्टा रंगमंच का निर्माण करने वाला है । उसने रंगमंच का निर्माण कर दिया और उस पर स्वयं ही विभिन्न रूप धर कलाकार बन कर अभिनय करने हेतु प्रस्तुत हो गया है, एकाकी अभिनय करने के लिए । कहने का अर्थ है कि वह स्वयं ही रंगमंच बन गया है और स्वयं ही कलाकार । इस प्रकार वह स्वयं को ही देख रहा है क्योंकि रंगमंच भी स्वयं का है और अभिनय करने वाला कलाकार भी वह स्वयं ही है । इसी कारण से उसे साक्षी न कहकर दृष्टा कहा जाता है अर्थात स्वयं को देखने वाला । अंततः मनुष्य का शरीर प्राप्त करने का हमारा उद्देश्य भी तो साक्षी से दृष्टा बनना है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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