Sunday, July 19, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -56

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -56 

               इसके लिए आवश्यक है कि हम संसार को देखें तो अवश्य परन्तु उसमें हस्तक्षेप न करें । देखने को हम रोक नहीं सकते क्योंकि नेत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय का यह स्वाभाविक कार्य है । परन्तु संसार में लिप्त होना अथवा न होना हमारी क्षमता के भीतर है । हम चाहें तो संसार में डूब सकते हैं और चाहें तो संसार में रहते हुए उससे निर्लिप्त भी रह सकते हैं । अतः संसार में केवल साक्षी बनकर परमात्मा की लीला को देखते रहना ही उचित है । 

         इस प्रकार इस दृष्टान्त से हमें अनासक्त होने का अंतिम और महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगता है - ‘साक्षी-भाव’ । संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उन सब का केवल साक्षी होना । यहाँ सन्त का साक्षी-भाव है और शिष्य का आसक्ति-भाव । न्यायालय में साक्षी अर्थात गवाह का बड़ा महत्त्व है । जो किसी भी घटना में हस्तक्षेप नहीं करता वही वास्तव में सही साक्षी हो सकता है । जो कोई व्यक्ति एक पक्ष का साथ देता है वह भला साक्षी कैसे हो सकता है ?

       साक्षी होने का अर्थ है, निर्विकार भाव से घटित हो रहे को देखते रहना, प्रत्येक घटना को परमात्मा की लीला मात्र समझना, उसमें स्वयं को नहीं उलझाना । इस शरीर को मन सहित 11 इन्द्रियां परमात्मा ने दी है । पाँच ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग न करना परमात्मा के आशीर्वाद और उनकी आज्ञा का उल्लंघन है परन्तु पाँच कर्मेन्द्रियों और एक मन को नियंत्रण में रखना प्रत्येक व्यक्ति का निजी दायित्व है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।





णम् ।।

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