आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -54
उसके चले जाने के बाद शिष्य ने अपने गुरु से पूछा - ‘गाय को रखना भी बड़े झंझट का कार्य है । इस गाय का हम क्या करेंगे ? इस के चारा-पानी की व्यवस्था कहाँ से होगी ?’ संत ने निर्विकार भाव से कहा - ‘पुत्र, इस जंगल में परमात्मा ने सभी प्राणियों के भोजन की व्यवस्था की है । जब हमारे खाने-पीने की व्यवस्था भी होती है, तो फिर इस मूक प्राणी की व्यवस्था भी परमात्मा करेगा । अच्छा है, हमें भी इस गाय का दूध पीने को मिलेगा । परमात्मा सब-कुछ अच्छा ही करते हैं ।’
गुरु-शिष्य दोनों मिलकर गाय की सेवा करते और जंगल में चरने के लिए छोड़ देते । सुबह-शाम गाय के दूध- दही का सेवन कर लिया करते । अब शिष्य को गाय बोझ नहीं लग रही थी । वह बड़े मन से गाय को जंगल में जाकर चरा लाता । सुबह शाम उसको दुह लेता, दूध से दही और मक्खन आदि बना लेता और अपने गुरु के साथ सुखपूर्वक उनका सेवन करता ।
कुछ दिनों बाद वही व्यक्ति जो गाय को आश्रम में छोड़ कर गया था, वापिस लौट आया । उसने आते ही संत से अपनी गाय वापिस मांगी । संत ने निर्विकार भाव से कहा कि ‘जहां बांधकर गए थे, वहीं से खोलकर वापिस ले जाओ ।’ वह व्यक्ति गाय को खोलकर वापिस ले गया । यह सब देख-सुनकर शिष्य बड़ा उद्वेलित हुआ । उस व्यक्ति के जाने के बाद पीछे से शिष्य उसको भला-बुरा कहने लगा । संत ने उसे समझाया कि ‘परमात्मा सब कुछ अच्छा ही करते हैं । अच्छा हुआ वह व्यक्ति गाय को वापिस ले गया । इससे हमें उस गाय को चराने, उसका गोबर उठाने आदि के झंझट से मुक्ति मिली ।’ गुरु की बात सुनकर कुछ समय बाद शिष्य शांत हो गया ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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