Saturday, July 18, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -55

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -55

     इस दृष्टान्त के अनुसार शिष्य गाय से मिलने वाले दूध आदि से जो सुख अनुभव कर रहा था, उसके अब न मिलने पर उसका वह सुख ही दुःख में परिवर्तित हो रहा था । वह सोचता था कि गाय से हमें अब तक दूध आदि मिलता था, वह अब नहीं मिल पायेगा । यह शिष्य की दुग्ध-भोग (रस) के प्रति आसक्ति थी, जो उसे उस व्यक्ति के प्रति उद्वेलित कर रही थी । जबकि दूसरी तरफ संत के मन में गाय के आने और वापिस लौट जाने, दोनों अवस्थाओं के कारण विचार तक पैदा नहीं हुआ था क्योंकि वे अनासक्त थे । उनके इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा था कि सदैव मिलने वाला दूध-दही अब नहीं मिल पायेगा । गाय आई है तो अच्छा है; दूध-दही खाने को मिलेगा, चली गई तो भी अच्छा हुआ, गोबर उठाने से मुक्ति मिली । उनमें ऐसी अनासक्ति आई है, साक्षी-भाव के कारण ।

             शिष्य गाय में सुख देख रहा था अर्थात किसी अन्य से स्वयं को सुख मिलता देख रहा था जबकि संत जानते थे कि वास्तविक सुख तो स्वयं के भीतर है, स्वयं से बाहर तो केवल परमात्मा की लीला है । संसार का दृश्य हमें अपने में लीन करने का प्रयास करता है, अपने साथ लपेट लेना चाहता है । हमें अपनी क्षमता इस प्रकार विकसित करनी होगी कि संसार की कोई बात/वस्तु हमें प्रभावित न कर सके । हमें केवल उस लीला का साक्षी बने रहना है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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