Saturday, July 25, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -62

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -62 

         भीतर काम-भोग का भाव जीवित है और ऊपर से दिखावा कर रहे हैं, काम को जीत लेने का । देव ऋषि नारद ने भी एक बार काम को जीत लिया था परन्तु उस काम विजय का उन्हें अभिमान हो गया था । परमात्मा की इच्छा नहीं थी कि उनका भक्त पतन की राह पर अग्रसर हो । उन्होंने देवर्षि को पतन से बचाने के लिए कुछ लीला की । देवर्षि नारद के समक्ष काम-भोग की परिस्थितियाँ बनते ही भीतर दबा काम-भाव पुनः सतह पर आ गया । हम तो साधारण मानव है, हमें कौन रोकेगा ? इस पतन से । हमारे समक्ष एक ही रास्ता है, आसक्ति से बचें और अनासक्त हो जाएँ । इसलिए अनासक्ति के प्रत्येक सूत्र पर चलते हुए बिना किसी अहंकार के साक्षी-भाव को उपलब्ध हो जाएँगे, तभी अनासक्त हो पाएंगे अन्यथा नहीं ।

         अब प्रश्न यही उठता है कि अनासक्ति और विरक्ति दोनों में से कौन सी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण है अर्थात हमें विरक्त होना चाहिए अथवा अनासक्त ? विरक्ति और अनासक्ति दोनों ही महत्वपूर्ण है और दोनों ही आपके उत्थान में सहायक हैं । अगर मुझे इन दोनों में से किसी एक को चुनने का कहा जाये तो मैं अनासक्ति का चुनाव करूँगा  । क्यों ? क्योंकि ……,। आगे बढ़ने से पहले चलिए ! एक कहानी सुनिए । इस कहानी से इस ‘क्यों’ का उत्तर मिल जाएगा ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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