आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -67
हम आसक्ति को पीछे छोड़कर अनासक्ति की ओर आते हुए संक्षेप में अब तक हुए विवेचन से निकले सार को बताते चलते हैं । जितनी अधिक आसक्ति होती है, व्यक्ति व्यथित होकर उतनी ही अधिक विरक्ति की और चला जाता है । परन्तु यही विरक्ति जब व्यक्ति को स्वयं के अकेले पड़ जाने के रूप में खलती है, तब वह पुनः उतनी ही अधिक आसक्ति की ओर चला जाता है । यही मनुष्य के सुख-दुःख का कारण है । एक गृहस्थ जीवन भी इसी प्रकार आसक्ति और विरक्ति के मध्य एक दोलक की भांति दोलन करता रहता है, मध्य में रूक नहीं पाता । मध्य में रुकने के सूत्र जो इस श्रृंखला में मंथन के उपरांत निकल कर सामने आये हैं, वे हैं -
प्रथम सूत्र - निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म को करते रहना ।
दूसरा सूत्र - किसी में भी दोष न देखना ।
तीसरा सूत्र - ‘मैं और मेरा’ की भावना का त्याग ।
चौथा सूत्र - संतुष्टि पूर्ण जीवन ।
पांचवां सूत्र - सहिष्णुता, विरोध को सहन करना ।
छठा सूत्र - कामनाओं पर नियंत्रण रखना ।
सातवाँ सूत्र - किसी से कोई आशा/अपेक्षा न रखना ।
आठवाँ सूत्र -साक्षी-भाव ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
No comments:
Post a Comment