आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -51
हाय रे दुर्भाग्य ! आज तो पिंगला को मालदार तो क्या छोटा-मोटा ग्राहक तक भी नसीब नहीं हुआ । उसके नयन दुःख से झरने लगे । वह एक दृष्टि सूनी गली में डालती और दूसरी दृष्टि अपने बुढ़ाते जा रहे शरीर पर । वह समझ गई कि उसके शरीर की आकर्षण क्षमता चूक चुकी है । उसकी आशा की अंतिम किरण तब बुझ गई जब दूर कहीं पहरेदार की ‘जागते रहो’ की ध्वनि उसके कानों में पड़ी । पहरेदार की आवाज़ अर्धरात्रि हो जाने का संकेत दे रही थी ।
पिंगला ने अब सब आशाएं छोड़ दी और अटारी से उठ खड़ी हुई । अपने कमरे में जाकर दर्पण के सामने खड़ी हो गई । कहाँ गया वह रूप-लावण्य, जिसके कभी हज़ारों दीवाने हुआ करते थे ? कहाँ हैं वे ग्राहक जो उसके शरीर की केवल एक झलक पाने को अटारी के नीचे दोपहर से ही खड़े रहते थे ? आज दर्पण भी उसे चिढ़ा रहा था ।
दुःख में डूबी पिंगला ने सत्य को स्वीकार किया । उसने जीवन में आगे अब और ग्राहक मिलने की आशा छोड़ दी और जाकर पलंग पर सो गई । सदैव रात भर जागने वाली को आज पलंग पर सोते ही नींद आ गई । उसकी इस सुखद नींद का कारण था - ‘समस्त आशाओं का त्याग’ । दत्तात्रेय महाराज कह रहे हैं - “राजन यदु ! आशा हि परमं दुःख़ं नैराश्यं परमं सुखम् ।” (11/8/44) आशा ही समस्त दुःखों का कारण है और आशा का त्याग कर देना परम सुख प्रदान करता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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