आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -49
कहने का अर्थ है कि मनुष्य की कामनाएं इतनी सुगमता से नष्ट नहीं हो सकती । तपस्वी के तप के बाद भी उसके भीतर काम-भाव ऐसी स्थिति में बना रहा, जैसे राख के ढेर में दबी एक चिंगारी । जरा सा इंद्र ने उसे क्या कुरेदा कि राख हटते ही चिंगारी भभक उठी । इसीलिए सदैव यही कहा जाता है कि कामनाओं को नष्ट करना आसान नहीं है । इन्हें तो अनासक्त होकर ही नियंत्रण में रखा जा सकता है ।
हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा एक संत की बात बताते हैं कि वे (उन संत का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा है) कहा करते हैं कि अगर हरिद्वार से लाहौर तक के मार्ग को स्वर्ण मुद्राओं से पाट भी दिया जाये और उस मार्ग पर मुझे चलने को कहा जाये तो मेरा मन उस स्वर्ण मुद्राओं को देखकर जरा सा भी विचलित नहीं होगा । परन्तु मेरे सामने एक सुन्दर स्त्री के आ जाने पर मैं यह नहीं कह सकता कि मेरा मन उसकी उपस्थिति से तनिक सा भी विचलित नहीं होगा । हम सब के जीवन की यह एक कटु वास्तविकता है कि कामनाओं पर हमारा सदैव के लिए नियंत्रण नहीं रह पाता । उनको नष्ट करने के स्थान पर नियंत्रण करना अधिक उचित है अर्थात न आसक्ति, न विरक्ति; बल्कि अनासक्ति ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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