आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -46
आत्मा सर्वोच्च है, उसके बाद बुद्धि का स्थान है और अंत में मन का । बुद्धि के अधीन मन है और आत्मा के अधीन बुद्धि । बुद्धि का कार्य है, ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त हुए ज्ञान का उपयोग करना । बुद्धि को अपने अधीनस्थ मन के साथ हो जाने के बजाय, अपने से उच्च, आत्मा के साथ ही बने रहना चाहिए । जब व्यक्ति की बुद्धि आत्मा के साथ रहती है और उसके अनुसार चलती है, तब उसका ज्ञान विवेक में परिवर्तित हो जाता है और जब बुद्धि अपने से निम्न, मन के साथ हो जाती है तब वही ज्ञान, अज्ञान बन जाता है ।
अज्ञान वह कथित ज्ञान है, जिसे मनुष्य मन के कहे अनुसार सत्य समझ लेता है जबकि विवेक वह ज्ञान है जो मनुष्य बुद्धि को आत्मा के साथ रखकर उसका अनुसरण करता है । शास्त्रों में इसी प्रक्रिया को ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ कहा गया है अर्थात हमें परमात्मा अज्ञान की तरफ नहीं बल्कि ज्ञान की तरफ ले जाए । अतः कामनाओं को नियंत्रित करने का यही एक मात्र उपाय है कि मनुष्य अपनी बुद्धि को आत्मा के साथ संलग्न कर ज्ञान का उपयोग करे न कि मन को बुद्धि पर प्रभावी बना कर अपने मन का कहना मानता रहे । इसी बात को स्पष्ट करते हुए गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं -
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ।। गीता-3/43 ।।
अर्थात बुद्धि से पर यानि सूक्ष्म, बलवान और अत्यंत श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! तू इस कामना रुपी शत्रु अर्थात इस दुर्जय शत्रु काम को मार डाल ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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