Friday, June 19, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर - 1से26

 आसक्ति/अनुरक्ति 

                परमात्मा ने इस जगत् (प्रकृति) का निर्माण करते हुए इसमें गुणों से युक्त विभिन्न प्रकार के पदार्थ बनाए हैं । इन पदार्थों से जुड़कर जीव सुख- दुःख का अनुभव करता है । जगत् भी परमात्मा है और पदार्थ में उपस्थित गुण भी परमात्मा हैं । गुणों के कारण पदार्थ में हो रही क्रियाओं से परमात्मा को सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता क्योंकि उन्होंने गुणों से कोई सम्बन्ध नहीं रखा है । गुण उनके कारण हैं अवश्य, फिर भी वे गुणों में नहीं है और न ही गुण उनमें हैं । वे तो गुणातीत हैं ।

       भगवान कहते हैं कि ‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता - 15/7) - इस लोक में यह जीव बना हुआ आत्मा (जीवात्मा) मेरा ही सनातन अंश है । फिर यह विवेकवान जीव (मनुष्य) गुणों से मिल रहे सुख-दुःख के अनुभव को अपने में, अपने द्वारा और अपने लिए क्यों मानने लगा है ? सुख-दुःख का स्वयं में अनुभव करना, उसे परमात्मा का अंश होने से नीचे के स्तर पर ले आता है । इस पतन का कारण है, उसके द्वारा गुणों का संग कर लेना अर्थात् गुणों में आसक्त हो जाना । गुणों का संग कर लेने के कारण ही वह विभिन्न प्रकार की उच्च-निम्न योनियों में भटकता रहता है और परमात्मा का अंश होने के बावजूद भी जन्म-मरण से मुक्त होकर उन तक पहुँच नहीं पाता । 

       परमात्मा ने तो प्रकृति का निर्माण कर उसमें गुणों को डालते हुए स्वयं को इनसे अलग कर लिया परन्तु यह जीवात्मा उनका अंश होते हुए भी प्रकृति के गुणों से स्वयं को अलग क्यों नहीं कर पा रहा है ? इसका उत्तर है - उसका गुणों के प्रति आसक्ति-भाव । इस आसक्ति से दूर हटने का भी क्या कोई रास्ता है ? हाँ है - परमात्मा में अनुरक्ति अर्थात् गुणों में आसक्ति को छोड़ने के लिए आवश्यक है कि हमारी परमात्मा में अनुरक्ति हो । आइए ! इसी विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाते हैं और चलते हैं -‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ ।

            आसक्ति और अनुरक्ति, दो शब्द, एक अर्थ परन्तु भावार्थ भिन्न भिन्न । आसक्त वह है जो अपने स्वार्थ के कारण किसी के साथ जुड़ा है, जबकि अनुरक्ति का स्वार्थ से कोई सम्बन्ध ही नहीं है । आसक्ति कामना को जन्म देती है जबकि अनुरक्ति में व्यक्ति निष्काम (कामना रहित) हो जाता है । आसक्ति का सम्बन्ध मोह और वासना से है जबकि अनुरक्ति में प्रेम और त्याग का महत्व है । आसक्त और अनुरक्त, दोनों ही व्यक्ति प्रेम की बात करते हैं । आसक्ति में प्रेम केवल दिखावा बन जाता है, उसमें प्रेम का मात्र प्रदर्शन है जबकि अनुरक्ति में निःस्वार्थ प्रेम होता है । 

           आसक्ति सांसारिक बन्धन है जबकि अनुरक्ति आपको संसार से मुक्त करती है । आसक्ति आपको जीवनभर अशान्त और दुःखी बनाए रखती है जबकि अनुरक्ति आपको मुक्त करते हुए परमात्मा के द्वार तक ले जाती है । सबसे बड़ी बात - आसक्ति में सदैव दो की उपस्थिति बनी रहती है जबकि अनुरक्ति में दोनों एक दूसरे में खो जाते हैं और केवल एक ही शेष रहता है । संसार से प्रेम करना आसक्ति है जबकि परमात्मा से प्रेम करना अनुरक्ति ।

           आसक्ति से मुक्त व्यक्ति विरक्त कहलाता है । आसक्त का अर्थ है, उस व्यक्ति का किसी न किसी में राग है और वह राग होता है अपने द्वारा निर्मित संसार के पदार्थों के साथ, जिससे उसे सुख मिलने की आशा रहती है । 

          विरक्त का अर्थ है बिना राग के अर्थात् जिस व्यक्ति का संसार और उसके पदार्थों से वैराग्य हो गया हो । एक विरक्त व्यक्ति पुनः संसार की आसक्ति में कभी भी फँस सकता है । जैसे एक दोलक (Pendulum) जब बाईं ओर की उच्च अवस्था तक पहुँच जाता है तब वह वहाँ ठहर नहीं सकता । गति करते हुए वह दाईं ओर जाता है और वहाँ भी उच्चतम स्तर को छूकर पुनः बाईं ओर गति करता है । यही स्थिति आसक्ति और विरक्ति की है । आसक्त व्यक्ति कभी भी विरक्त हो सकता है और विरक्त कभी भी आसक्ति की ओर लौट सकता है । विरक्ति में आसक्ति का भी थोड़ा अंश छिपा रहता है और आसक्ति में विरक्ति का । बस, केवल परिस्थिति बदलने की देर है कि आसक्ति विरक्ति में बदल जाती है और विरक्ति आसक्ति में ।

          आसक्ति और विरक्ति के मध्य भी एक स्थिति बन सकती है - अनासक्ति की । दोलक दोलन करते हुए कभी बाईं ओर जाता है और कभी दाईं ओर । दोनों ही स्थितियों में सर्वोच्च स्तर पर जाकर वह कुछ क्षण के लिये रूकता है लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वह स्थाई रूप से वहां रूक नहीं सकता । दोनों ओर की ऊँचाइयों के बिलकुल मध्यम में भी एक स्थिति आती है, जहां पर वह स्थाई रूप से ठहर सकता है । इसी प्रकार आसक्ति और विरक्ति के एकदम मध्यम में भी एक स्थित बनती है और उस स्थिति का नाम है - अनासक्ति अर्थात् न तो आसक्ति और न ही विरक्ति । अनासक्ति को वीतरागिता भी कहते हैं अर्थात् न किसी में राग और न किसी से द्वेष । भगवान श्री कृष्ण न रागी थे और न ही वैरागी बल्कि वे वीतरागी थे, अनासक्त थे ।

              एक गृहस्थ का जीवन भी आसक्ति और विरक्ति के मध्य डोलता रहता है । आसक्ति और विरक्ति दोनों के ही अस्थाई होने के कारण वह कभी भी मुक्त नहीं हो पाता । इसलिए मुक्त होने के लिए आवश्यक है कि वह अनुरक्त हो जाए । अनुरक्ति में अनुराग होता है अर्थात् अनुरक्त वह है जिसमें आसक्ति तो है परंतु उसकी आसक्ति संसार में न होकर परमात्मा में है । अनुरक्ति में संसार से सम्बन्ध तो रहता है परन्तु वह संबंध मोह, ममता से रहित निःस्वार्थ होता है, साथ ही परमात्मा से सम्बन्ध श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का होता है । 

            आसक्ति को अनुरक्ति में परिवर्तित करने का रास्ता अनासक्ति से होकर गुजरता है । सर्वप्रथम आसक्त को अनासक्त होना होगा । फिर अनासक्ति को अनुरक्ति में परिवर्तित होते देर नहीं लगेगी । 

          यह अनासक्ति कैसे हमें परमात्मा के द्वार तक ले जाती है ? कैसे यह सांसारिक प्रेम को पारमात्मिक प्रेम में बदल देती है ? जानने के लिए सबसे पहले अनासक्ति क्या है ? यह जानना होगा । तो चलिए ! आसक्ति से अनुरक्ति की ओर बढ़ते हुए अनासक्त होने का प्रयास करते हैं । सबसे पहले एक दृष्टान्त के माध्यम से जानने का प्रयास करते हैं कि अनासक्ति क्या है ? 

            एक बार तीन बौद्ध भिक्षु भिक्षा लेने के लिए पास के ही गांव की ओर जा रहे थे । गांव पहुंचने के लिए रास्ते मे एक नदी को पैदल ही पार करना पड़ता था । नाव का कोई साधन नहीं था । जब तीनों भिक्षु नदी किनारे पहुंचते हैं तो देखते हैं कि एक षोडशी नदी के उस पार जाने के लिए पहले से ही खड़ी है । उसकी हिम्मत नदी के प्रवाह में उतरने की नहीं हो रही थी । उसने सबसे आगे चल रहे पहले भिक्षु को हाथ पकड़ कर नदी पार कराने को कहा । उस भिक्षु का उस कन्या की ओर ध्यान ही नहीं गया । कन्या ने पीछे चल रहे दूसरे भिक्षु से हाथ पकड़कर नदी पार कराने को कहा । भिक्षु ने इस प्रकार एक कन्या को हाथ पकड़कर नदी पार कराने को एक साधु के लिए अनुचित मानते हुए इनकार कर दिया । लाचार युवती ने अंतिम प्रयास करते हुए तीसरे युवा भिक्षु से सहायता मांगी । तुरंत ही उस युवक भिक्षु ने युवती का हाथ पकड़ा और सहारा देते हुए नदी पार करा दी । पार पहुंचकर युवती ने उस भिक्षु का बड़ा आभार माना और अपने रास्ते चल दी ।

                तीनो भिक्षु गांव में प्रवेश कर रहे हैं । पहला भिक्षु निर्विकार भाव से सबसे आगे अपने रास्ते पर चल रहा है । दूसरा भिक्षु बार बार तीसरे भिक्षु को उस युवती का हाथ पकड़कर नदी पार कराने को अनुचित बतला रहा है । साथ ही वह उस युवा भिक्षु की शिकायत भगवान बुद्ध से करने की धमकी भी दे रहा है । आख़िरकार तीसरे भिक्षु से रहा नहीं गया, उसे दूसरे भिक्षु को उत्तर देना ही पड़ा । तीसरे युवा भिक्षु ने उस दूसरे भिक्षु को कहा कि मैंने तो उस युवती का हाथ नदी पार कराते ही छोड़ दिया था परंतु आप तो अभी तक उस युवती को मन ही मन पकड़े हुए हैं ।

            पहला भिक्षु जो कि निर्विकार भाव से अपने रास्ते चल रहा है, वह विरक्त है । दूसरा भिक्षु, जिसने युवती को नदी पार कराने से इनकार कर दिया, उसके मन में अभी भी वह स्त्री बसी हुई है । वह भिक्षु उस युवती के प्रति आसक्त है । तीसरा युवा भिक्षु अनासक्त है, उसने युवती की सहायता करने को उसका हाथ पकड़ा था परंतु उसके मन ने स्त्री को नहीं पकड़ा था । विरक्ति, आसक्ति और अनासक्ति में यही मूलभूत अंतर है । 

           अनासक्ति का अर्थ है, न तो विरक्ति और न ही आसक्ति, एक दम मध्य में रहना । भगवान बुद्ध ने इस साम्य अवस्था प्राप्त कर लेने को मंझिम निकाय कहा है । मंझिम निकाय अर्थात् मध्य में रहना । एक गृहस्थ के लिए अनासक्त होना ही सर्वोत्तम मार्ग है ।

           इस कहानी से ही अनासक्ति (Detachment) की बात को आगे लिए चलते हैं । ऐसा नहीं है कि हम अनासक्त भाव को बड़ी सुगमता से और जीवन में कभी भी पकड़ सकते हैं । बड़ा ही कठिन है, अनासक्त होना । आसक्त होने में कुछ भी नहीं लगता, विरक्त होने की नौटंकी भी की जा सकती है परन्तु अनासक्त होने का तो नाटक भी नहीं किया जा सकता । भगवान बुद्ध का मंझिम निकाय का एक ही अर्थ है, मध्य में रहना । एक दोलक (Pendulum) जब गति करता है तो पहले बांयी तरफ जाता है और फिर उतनी ही तेज़ गति के साथ दायीं ओर चला जाता है, मध्य में वह ठहर ही नहीं सकता । हाँ, केवल एक परिस्थिति में वह मध्य में ठहरता है जब गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव उसे वहाँ ठहरने को मजबूर कर दे । 

              दोलक का बांयी और जाना आसक्ति है और दायीं और जाना विरक्ति । अनासक्ति है, दोलक का मध्य में ठहर जाना । आसक्ति जितनी अधिक तीव्र होगी, विरक्ति भी उतनी ही तेज़ होगी । विरक्ति के नाटक से जब व्यक्ति उब जाता है, तब वह पुनः आसक्ति की और लौट आता है, मध्य में एक पल के लिए भी नहीं ठहरता । आसक्ति से जब मोह भंग होता है, वह पुनः विरक्ति की ओर चल देता है, मध्य में एक क्षण के लिये भी नहीं ठहरता ।

         एक दोलक की भांति सदैव दोलन (Oscillation) करते रहना व्यक्ति की नियति (Destiny) बन चूका है । अगर आप किसी अति आसक्त व्यक्ति (Attached person) को विरक्त होते हुए देखो तो कभी भी यह मत समझना कि वह सदैव के लिए विरक्त हो चूका है । वह कभी भी पुनः उतना ही अधिक तेजी के साथ आसक्त भी हो सकता है । सब कुछ मन का खेल है और मन ही उसे आसक्ति और विरक्ति के मध्य भटकाता रहता है, अनासक्त होने ही नहीं देता । आज जो हमारा सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति है, वह एक दिन भी अगर हमारा कहना नहीं माने तो हम तत्काल उससे दूरी बना लेते हैं । उस व्यक्ति से हमारी अधिक समीपता उसके प्रति रहे हमारे आसक्त भाव को बतलाती है और तत्काल होने वाली उससे दूरी हमारी विरक्ति को प्रदर्शित करती है । वास्तव में देखा जाये तो यह हमारा मन ही है, जो हमें आसक्ति और विरक्ति के मध्य में झुला रहा है और मध्य में ठहरने का अवसर ही नहीं देता ।

      हमारा मन ही दोलन करता रहता है और आसक्ति और विरक्ति के मध्य झुलाता रहता है । मन पर नियंत्रण स्थापित कर लेना ही अनासक्त हो जाना है । दोलक गति करता है क्योंकि गति उसे आप स्वयं देते हो अन्यथा दोलक तो मध्य में ठहरा हुआ ही था । दोलक में दोलन उसके एक तरफ ऊपर ले जाने से होता है और फिर उसको छोड़ देने से वह स्वतः ही एक से दूसरी तरफ और दूसरी से पहली तरफ, दोलन करता रहता है । उसका यह दोलन करना तभी रुकता है, जब गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसकी गति निरंतर और धीरे-धीरे कम होती जाती है और एक अवस्था ऐसी आती है जब वह मध्य में आकर ठहर जाता है । 

            हमारी जिंदगी में भी इस दोलन की तरह गति होती रहती है, कभी इधर कभी उधर । मध्य में ठहराव कहीं और कभी भी दिखलाई नहीं पड़ता । जब अवस्था ढल रही होती है, हम असहाय नज़र आने लगते हैं, तब मजबूरी में बाहर से लगभग ठहर से जाते हैं परन्तु भीतर मन का दोलन करना नहीं रुकता । इस प्रकार जीवन भर हम आसक्ति और विरक्ति के मध्य सदैव झूलते ही रहते हैं, अनासक्त कभी हो ही नहीं पाते ।            

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -8 

          अब प्रश्न यह उठता है कि आसक्ति और विरक्ति के बीच झूलते जीवन में मध्य में ठहर कर अनासक्त कैसे हुआ जा सकता है ? कोई भी उपाय नहीं है अनासक्ति को उपलब्ध होने का, सिवाय स्वयं के मन पर नियंत्रण करने के । इससे पहले कि इस शरीर का जीवन समाप्ति की ओर चला जाये, हमें स्वयं के मन पर नियंत्रण साधना होगा । आसक्ति हमें उस ओर खींचती है, जिसके प्रति हम आसक्त हैं । जब उससे उब जाते है अथवा आसक्ति को जब कोई गहरी चोट पहुँचती है तब हम विरक्त होने का मार्ग पकड़ लेते है । 

        परन्तु हमारा दुर्भाग्य, हम सही मायने में विरक्त भी तो नहीं हो पाते हैं । वास्तविक विरक्ति है, आसक्ति की ओर फिर कभी भी न लौटना । हम विरक्त कभी भी नहीं होते बल्कि विरक्त होने का नाटक भर करते हैं । यह बात सदैव ध्यान में रखें कि नाटक सदैव हमारा मन करता है हमारी आत्मा अर्थात् हम स्वयं नहीं । आत्मा तो जानती है कि हम जो विरक्ति का नाटक कर रहे हैं वह वास्तव में आसक्ति को और अधिक मजबूत करने का एक उपाय भर है । तभी तो हम विरक्त न रहकर पुनः आसक्त हो जाते हैं ।

         मेरे एक मित्र है, बड़े ही सरल ह्रदय व्यक्ति है । जब से मैं उनके संपर्क में आया हूँ तब से उन्हें तम्बाकू का विभिन्न रूपों में सेवन करते हुए देख रहा हूँ, कम से कम 45-50 वर्ष तो हो ही गए होंगे । मेरे आग्रह पर उन्होंने तम्बाकू का सेवन करना कोई 20 बार छोड़ दिया है परन्तु प्रत्येक बार कुछ समय बाद पुनः उसका सेवन प्रारम्भ कर देते हैं । वास्तव में देखा जाये तो उन्होंने कभी तम्बाकू के सेवन को मन से त्यागा भी नहीं था । 20 बार उन्होंने तम्बाकू की आसक्ति त्यागकर उससे विरक्त होने का प्रयास तो किया परन्तु यह उनकी तम्बाकू से पूर्ण विरक्ति नहीं थी बल्कि उससे विरक्त होने का नाटक भर था । अगर वास्तव में वे विरक्त हुए होते तो पुनः तम्बाकू का सेवन करना प्रारम्भ ही नहीं करते । 

           यह तो एक प्रकार का दोलन करना था आसक्ति और विरक्ति के मध्य । वास्तव में तो उनकी तम्बाकू के प्रति आसक्ति कभी विरक्ति में परिवर्तित हुई ही नहीं थी । आज भी वे मुझसे छिपकर तम्बाकू का सेवन करते हैं और स्वीकार भी करते हैं कि जब 20 बार के प्रयास से भी आदत नहीं छूटी तो अब छूट भी नहीं सकती । अब उन्होंने तम्बाकू को छोड़ने का संकल्प करना भी छोड़ दिया है । 

                      परमात्मा से अनुरक्ति के लिए मुख्य बात है, संसार से आसक्ति को छोड़ना । यह आसक्ति तभी छूट सकती है, जब हमारा मन पर नियंत्रण हो । केवल मन पर नियंत्रण कर लेने से ही हमारा समस्त इन्द्रियों पर नियंत्रण स्थापित हो जाता है । इस जड़ शरीर में, जो कि अपरा प्रकृति की देन है; पाँच भौतिक तत्वों के साथ-साथ मन, बुद्धि और अहंकार भी उपस्थित रहते हैं । भौतिक तत्वों से श्रेष्ठ मन है और मन से श्रेष्ठ बुद्धि है । 

       संसार के सभी भोग पदार्थ मिल भी जाए तो भी वे मन को संतुष्ट नहीं कर सकते । फिर भी हम विषय-भोगों से ही मन को सन्तुष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं । हमारी सोच ही ऐसी बन गई है कि भोग पदार्थों से मन को संतुष्ट कर, नियंत्रित किया जा सकता है । भौतिक तत्वों से मन को कभी भी संतुष्ट कर नियंत्रित नहीं किया जा सकता बल्कि बुद्धि से अवश्य ही इसको नियंत्रित किया जा सकता है ।

             उच्च पदस्थापित व्यक्ति अपने अधीनस्थ को नियंत्रित कर सकता है, अधीनस्थ अपने अधिकारी को नहीं । जब अधीनस्थ अपने उच्चाधिकारी को नियंत्रण में ले लेता है, तब उस अधिकारी और उसके विभाग का पतन होना निश्चित है । यही नियम इस शरीर पर भी लागू होता है । मन को अगर बुद्धि नियंत्रित कर लेती है तो हम आसक्त से अनासक्त अथवा विरक्त हो सकते हैं । अगर दुर्भाग्य वश मन बुद्धि को नियंत्रित कर लेता है तो फिर इस शरीर और उसके कार्यों में हमारी आसक्ति बढ़ने लगती है ।

       आसक्ति वास्तव में जड़ तत्वों और इन्द्रिय सुखों के प्रति व्यक्ति का लगाव ही है । मन भौतिक सुखों के प्रति आसक्त हो जाता है और फिर बुद्धि को भी समझा बुझाकर अपने साथ कर लेता है । बुद्धि से श्रेष्ठ अहं है अर्थात् हमारा अहंकार और उससे श्रेष्ठ और सर्वोच्च है वह मूल और शुद्ध अहम् अर्थात् आत्मा है, जोकि हम स्वयं हैं । अगर अहम् (आत्मा) भौतिक सुखों के प्रति आसक्ति को स्वीकार नहीं करे और साथ ही भीतर अहंकार भी न रहे तो हमारी बुद्धि मन को पुनः अपने नियंत्रण में ले लेती है । 

          हाँ, यह शतप्रतिशत सत्य है कि हमारी आत्मा प्रत्येक अनुचित आचरण का प्रारम्भ में विरोध करती है जिसका अनुभव आप सभी को अपने जीवन में कभी न कभी अवश्य ही हुआ होगा परन्तु जब अनुचित आचरण से आपके मन को सुख मिलता प्रतीत होता है तो बुद्धि भी आत्मा से विपरीत दिशा पकड़ कर मन के साथ हो जाती है । ऐसी स्थिति में आत्मा असहाय हो जाती है और मन अपना खेल खेलने लगता है । इसीलिए संत-जन आत्म-जागरण की बात करते हैं, भगवान बुद्ध भी आत्म-बोध को महत्वपूर्ण बतलाते हैं ।

           वास्तव में देखा जाये तो मन भी तो किसी न किसी कारण से ऐसा व्यवहार करता होगा । मन के ऐसे आसक्ति पूर्ण व्यवहार के पीछे मुख्य रूप से हमारी कामनाएं ही है । कामनाओं को पूरा करने के लिए हम कर्म करते हैं और कर्म से हमें फल मिलता है और हमारी इच्छा (Desire) के अनुसार फल प्राप्त होने से हमारा मन उस कर्म के प्रति झुक जाता है । 

             मन का एक निश्चित कर्म फल (भोग) और कर्म (भोग प्राप्ति के लिए) की तरफ झुक जाना ही आसक्ति है । कर्म फल में आसक्त होने से हमारी कामनाएं और अधिक बढ़ती हैं, कामनाएं अपेक्षा (Expectations) को जन्म देती है और फिर अपेक्षा आप से अथवा आपकी कामनाओं की पूर्ति जिनसे होनी है, उन सभी के प्रति आपको आसक्त (Attach) कर देती है । अगर हम किसी भी प्रकार के कर्म के फल (भोग) की आशा मन में न संजोयें, तो हमारा मन न तो किसी कर्म फल (भोग) में आसक्त होगा और न ही इस शरीर को किसी विशेष कर्म को करने के लिए प्रेरित करेगा ।

         बार-बार मन के अनुसार कर्म के लिए प्रेरित करने से शरीर भी मन के अनुसार अपने आपको ढाल लेता है । जब एक बार मन के अनुसार शरीर ढल जाता है तो फिर बुद्धि द्वारा मन को नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है । इसलिए प्रारम्भिक स्तर पर ही बुद्धि से मन को नियंत्रित कर लेना अधिक सुगम रहता है । प्रारम्भिक अवस्था में बुद्धि आत्मा (आप स्वयं) के अनुसार कार्य करती है और मन को अपने अधीन बनाये रख सकती है परन्तु जब शरीर एक बार मन के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है, तो फिर बुद्धि का मन पर से नियंत्रण लगभग समाप्त हो जाता है । मन के अनुसार कर्म करना आसक्ति पैदा करता है जबकि बुद्धि के अनुसार कर्म करना आपको अनासक्ति की ओर ले जाता है ।

             इतने विवेचन से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मन की ही ये तीन अवस्थाएं है, आसक्ति, अनासक्ति और विरक्ति । मन को नियंत्रित करना अर्थात आसक्त मन को अनासक्त अथवा विरक्त मन में परिवर्तित करना कैसे संभव हो सकता है, यह मुख्य प्रश्न है । मन को हमारा शरीर (इंद्रियाँ) नियंत्रण में तभी ले पाता है, जब हम कोई कर्म इस शरीर से करते हैं । अतः मन को नियंत्रण में लेने के लिए कर्म के स्वरूप को परिवर्तित करना होगा । 

           आइये, एक बार पुनः तथागत की ओर चलते हैं । एक बार भगवान बुद्ध के पास एक व्यथित व्यक्ति आया । अपने वर्तमान जीवन से वह बड़ा ही क्षुब्ध था । कभी वह अपनी पत्नी की शिकायत कर रहा था और कभी वह अपने पुत्रों के द्वारा आदेश की अवहेलना करने की बात कह रहा था ।    

                 आस-पास के लोगों और रिश्तेदारों से उसका सम्बन्ध मधुर नहीं है, जिससे वह बड़ा व्यथित था । उसने अपने मन की व्यथा भगवान बुद्ध के सामने प्रकट की और कहा कि वह जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं कर पा रहा है । वह चाहता था कि भगवान बुद्ध उसे कोई ऐसा सूत्र दे जिसको जीवन में उतार कर वह इस दुविधा से बाहर निकल सके । भगवान बुद्ध ने कहा - “मेरे पास तो ऐसा कोई सूत्र नहीं है । हाँ, पास में ही एक वैश्य है - तुलाधार; उसके पास इसका एक सूत्र अवश्य है । आप चाहें तो उसके पास जाकर वह सूत्र प्राप्त कर सकते है और अपने जीवन में खुशियां भर सकते हैं ।”

           तुरंत ही वह व्यक्ति वहां से निकलकर सीधा तुलाधार के पास जा पहुंचा । तुलाधार एक व्यवसायी था । वह बड़ा ही प्रसन्न नज़र आ रहा था और अपने पास आये ग्राहकों को तौल-तौल कर सामान दे रहा था । उस व्यक्ति ने तुलाधार को अपने आने का प्रयोजन बताया और कहा कि तथागत ने आपसे वह सूत्र प्राप्त करने को कहा है, जिसको पाकर आप आनंदित अवस्था को उपलब्ध हुए हैं । तुलाधार ने उसे प्रेम पूर्वक अपने पास बैठाया और एक ग्राहक के लिए सामान तौलते हुए कहा कि ‘इस तराजू के कांटे की ओर देखो । इसे सदैव मध्य में बनाये रखने से ही ग्राहक और व्यवसायी के मध्य सामंजस्य बैठ पाता है और दोनों खुश रह सकते हैं अन्यथा नहीं । मैंने तो तराजू के इसी कांटे से सीख ली है कि सदैव मध्य में रहने से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामंजस्य बिठाया जा सकता है । इस प्रकार मध्य में रहने से ही हम परम आनंद की अवस्था को उपलब्ध हो सकते हैं ।’

           तुलाधार की बातों का उस व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ा, कह नहीं सकता परन्तु बड़ी मार्मिक बात कही थी, तुलाधार ने । तराजू का कांटा सामान और उसको तौलने वाले बाट के मध्य एक प्रकार की साम्यता निश्चित करता है । न कम और न ही अधिक, यही समता है । जहां न तो आसक्ति है और न ही विरक्ति, वहीं समता है । समता ही अनासक्ति है । तुलाधार के मन में धन के प्रति आसक्ति भाव होता तो तराजू का कांटा कभी भी मध्य में नहीं रहता, कांटा सदैव एक ओर ही झुका रहता ।

             तुलाधार वैश्य के इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का प्रथम सूत्र निकलकर सामने आता है – ‘निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म करना’ । निष्ठा पूर्वक कर्म करते रहना ही अनासक्ति है । हमारा कर्म क्या है, यह पूर्वजन्म के पुरुषार्थ (प्रारब्ध) के द्वारा पहले से ही निश्चित किया जा चुका है । उसी के अनुसार हम अपना जीवन प्रारम्भ करते है और जीवन में कर्मों का प्रारम्भ भी इसी प्रारब्ध को अभिव्यक्त करने के लिए होता है । पूर्वजन्म के पुरुषार्थ के कारण ही आज मैं एक चिकित्सक हूँ, इसका अर्थ यह है कि रुग्ण व्यक्तियों की चिकित्सा करना मेरा कर्तव्य कर्म है । मुझे अपना निर्धारित कर्तव्य कर्म निष्ठा पूर्वक करते रहना चाहिए, तभी मैं अनासक्त हो सकता हूँ । 

            मेरी निष्ठा (Loyalty) में रही कोई कमी, धन, जन, मान-सम्मान आदि के प्रति मेरी आसक्ति को ही प्रदर्शित करेगी । जब आप निष्ठा पूर्वक कर्म करेंगे तो फिर न तो आप अपने कर्म के प्रति आसक्त हो सकते हैं और न ही उस कर्म से विरक्त । फिर प्रत्येक रुग्ण व्यक्ति का मन लगाकर उपचार करना ही जीवन का एक मात्र उद्देश्य बन जायेगा और प्रत्येक स्थिति में मैं अपने आपको खुश रख सकूंगा ।

           किसी भी क्षेत्र में कर्म करने के प्रारम्भिक काल में हमारी निष्ठा में कभी कोई कमी नहीं रहती है परन्तु प्रारब्ध (Destiny) के फलस्वरूप मिलने वाले कर्म-भोग के प्रति बनता हुआ आसक्ति भाव हमारी निष्ठा को धीरे-धीरे कमजोर करता जाता है । जब यह निष्ठा, लोभ (Greed) में परिवर्तित हो जाती है तब अनासक्ति आसक्ति में परिवर्तित हो जाती है । एक चिकित्सक की आसक्ति कई क्षेत्रों में हो सकती है जिसमें धन, मान-सम्मान की चाहना आदि प्रमुख हैं । हमें इन सब बातों को एक ओर रखकर अपने क्षेत्र के कार्य को कर्तव्य कर्म समझकर सम्पादित करना होगा तभी हम स्वयं को प्रत्येक प्रकार की आसक्ति से मुक्त रख पाएंगे । 

            विरक्ति में तो कर्तव्य-कर्म का भी त्याग करना पड़ता है जबकि अनासक्ति में केवल आसक्ति को त्यागना होता है, कर्तव्य-कर्म को नहीं । अतः निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म करते रहना ही अनासक्त होना है । भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते भी हैं कि-

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: ।

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: ।। गीता – 3/8 ।।

अर्थात हे अर्जुन, तू नियत कर्तव्य कर्म कर; क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी संभव नहीं होगा ।

          विरक्ति में तो मनुष्य कर्तव्य कर्म का भी त्याग कर देता है । ऐसे में शरीर निर्वाह होना भी कैसे संभव होगा ? एक गृहस्थ का इस प्रकार सोचना उचित ही है । अतः एक गृहस्थ के लिए कर्तव्य कर्म के त्याग के साथ - साथ नियत कर्म करते रहना अधिक उचित है । इस प्रकार यह समझा जा सकता है कि एक गृहस्थ के लिए विरक्त होने के स्थान पर अनासक्त होना अधिक सहज है । 

          प्राचीन समय की बात है । एक सूफी संत नित्य सुबह की नमाज अता करने के लिए घर से थोड़ी दूर स्थित एक मस्जिद में जाया करते थे । उनका प्रतिदिन का यह एक नियम बन गया था । उनको प्रतिदिन इस प्रकार मस्जिद जाते हुए देखकर उनका छोटा पुत्र भी कभी- कभी उनके साथ हो जाया करता था । धीरे-धीरे उनके पुत्र की भी यह एक आदत हो गयी । संत उसे अपने साथ ले जाते और रास्ते में चलते हुए अपने पुत्र को ज्ञान की बातें बताते रहते । पुत्र भी उनकी बातें सुनकर बड़ा प्रसन्न होता और प्रदत्त ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करता । 

            सर्दियों के दिन थे । जब संत और उनका पुत्र, दोनों प्रतिदिन सुबह की नमाज के लिए मस्जिद जा रहे होते तब प्रायः देखते कि लोग उस समय तक गहरी नींद में ही सोये रहते । उनके पुत्र को यह बड़ा बुरा लगता । आखिर एक दिन उनके पुत्र से रहा नहीं गया । वह अपने पिता से बोल पड़ा - ‘कितने काफ़िर हैं ये लोग, जो सुबह उठकर नमाज तक नहीं पढ़ सकते । खुदा अवश्य ही उन्हें दोजख में भेजेगा ।’

        अपने पुत्र के मुंह से दूसरे की निंदा सुनकर संत बड़े आहत हुए । सूफी संत ने अपने पुत्र से कहा -“ बेटा, इन सोये हुए लोगों की इस प्रकार आलोचना करने से बेहतर था कि तुम भी इनकी तरह सोये हुए ही रहते, कम से कम तुम्हें किसी का दोष तो दिखलाई नहीं पड़ता ।”  इतना कहकर वे चुप हो गए और परमात्मा के नाम का स्मरण करते हुए मस्जिद की तरफ बढ़ने लगे । सूफी संत ने अपने पुत्र से सत्य ही कहा था । अगर उनका पुत्र भी नींद में सोया रहता तो कम से कम उसे किसी व्यक्ति में दोष तो दिखलाई नहीं पड़ता । 

          हम चाहे कितनी भी ईश्वर से प्रार्थना कर लें, अगर हमारा मन निर्मल नहीं है तो हमारी वह प्रार्थना ईश्वर तक पहुँच ही नहीं सकती । हम ईश्वर की प्रार्थना करते हुए स्वयं को अन्य लोगों से ऊँचा समझने लगते हैं और दूसरे व्यक्तियों में दोष ढूँढने लगते हैं । वास्तव में किसी भी व्यक्ति में केवल दोष ही दोष नहीं होते बल्कि साथ में कुछ गुण भी होते हैं । भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार कहते हैं कि किसी को बुरा न समझें । दूसरे को बुरा समझेंगे तो आप में वह बुराई पहले ही आ जाएगी ।

          आध्यात्मिक पथ पर चल रहे व्यक्ति भी अपने आपको दूसरे से आगे होने का भ्रम पाले रहते हैं । दूसरों से स्वयं को श्रेष्ठ समझना भी एक विकार है । इस विकार को साथ रखकर परमात्मा के मार्ग पर आगे बढ़ते रहने के स्थान पर आप भटक सकते हैं, इस बात को सदैव स्मृति में रखना होगा ।

            सूफी संत के इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का दूसरा सूत्र निकल कर हमारे सामने आता है - ‘किसी भी व्यक्ति में दोष न देखना’।  जब हम किसी अन्य व्यक्ति में दोष देखने लगते हैं तो दूसरे कोण अर्थात् परोक्ष रूप से हम स्वयं की प्रशंसा कर रहे होते है । स्वयं की प्रशंसा करना अपने लिए पतन की राह को प्रशस्त करना है । अपने आपको दूसरे से उच्च समझना ही स्वयं के प्रति आसक्त होना प्रदर्शित करता है । परम पिता कहते हैं कि इस संसार में सभी एक समान है, तो फिर स्वयं को अन्य से अलग समझना हमारी सबसे बड़ी भूल है ।

          दूसरे में दोष ढूँढना, स्वयं को श्रेष्ठ बताना है । स्वयं में श्रेष्ठता देखना और दूसरों में दोष ढूंढना, व्यक्ति में अहंकार की भावना पोषित करता है । इस प्रकार की आसक्ति ही अहंकार की जननी है । मनुष्य अपने जीवन में सबसे बड़ी भूल यही करता है कि वह अपने क्षेत्र में अन्य लोगों से स्वयं को बेहतर समझता है । मैं अपने चिकित्सा क्षेत्र में अन्य क्षेत्र के व्यक्तियों से श्रेष्ठ तो हो सकता हूँ परन्तु अपने चिकित्सा क्षेत्र के ही किसी अन्य साथी से नहीं । सभी व्यक्तियों में कोई न कोई एक विशेषता अवश्य होती है । उस विशेषता के कारण वह अवश्य ही श्रेष्ठ हो सकता है । इसलिए किसी व्यक्ति के एक क्षेत्र में दोष हो सकता है परन्तु वह किसी अन्य किसी न किसी क्षेत्र में पारंगत अवश्य ही होगा । जब हम इस बात को स्वीकार कर लेते हैं तो फिर हमें अभिमान छू नहीं सकता ।

                प्रत्येक क्षेत्र में स्पर्धा है, यह हम सभी जानते हैं और सभी इस दौड़ में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हुए हैं । जीवन का दूसरा नाम ही स्पर्धा है, स्पर्धा नहीं हो तो जीवन में रस समाप्त हो जाता है । परन्तु इस स्पर्धा में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान बैठना और दूसरों को हेय समझ लेना स्वयं के प्रति आसक्त होना है । अनासक्त कभी भी किसी में कोई कमी नहीं देखता बल्कि कमी अगर है भी तो उसको शालीनता के साथ दूर करने का प्रयास करता है ।

          सांसारिक व्यक्तियों में ऐसा आसक्ति भाव देखने को प्रायः मिल जाता है । आध्यात्मिकता में आसक्ति का कोई स्थान नहीं है । जब से धर्म के नाम पर विभिन्न प्रकार के आश्रम और अखाड़े अस्तित्व में आये है, तब से स्वयं की संस्था के प्रति तीव्र आसक्ति दृष्टिगोचर होने लगी है और किसी दूसरे के आश्रम में दोष । कुम्भ के मेले के दौरान अखाड़ों में जो टकराव देखने को मिलता है, वह अपने संगठन के प्रति आसक्ति का प्रदर्शन भर ही तो है, यह दिखाने के लिए कि हमारा अखाड़ा और हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं । केवल अखाड़े ही नहीं बल्कि आज के संत तक किसी सम्मेलन में ऊँचे आसन के लिए आपस में लड़ते दिखलाई पड रहे हैं । जब आप अपने अखाड़े अथवा आश्रम में रहकर उनके प्रति इतने आसक्त हैं तो फिर घर-गृहस्थी क्या बुरी थी ? जब भीतर इतनी आसक्ति है तो फिर घर और आश्रम में अंतर ही कहां रहा ? 

                अहंकार पूर्ण जीवन आपकी स्वयं के प्रति आसक्ति को ही व्यक्त करता है । किसी में जरा सा भी दोष देखना ही अपने अहं को पोषित करना है । किसी में दोष देखने की भावना रखना ही अहंकार है, जिसके कारण ही व्यक्ति सदैव अपने अतिरिक्त सभी में दोष देखता रहता है और स्वयं को श्रेष्ठ समझता है । इस दुष्चक्र से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है - ‘किसी में भी दोष न देखना’ । निश्चित ही यह सूत्र आपको अनासक्ति की ओर ले जा सकता है ।

        अभी कुछ दिनों पहले एक बड़ी ही प्यारी ज्ञानवर्धक कहानी आचार्यजी से सुनने को मिली थी । दो सगे भाइयों में बड़ा ही अटूट प्रेम था । दोनों भाई विवाहित थे । दोनों की पत्नियाँ भी उनके मनोनुकूल मिली थी । दोनों भाई एक दूसरे से अलग रहने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे । दोनों के एक-एक पुत्र था । दोनों ही बच्चों पर प्रत्येक भाई का इतना अधिक स्नेह था कि देखने वाले को प्रतीत ही नहीं होता था कि कौन सा बालक किस भाई का पुत्र है ? प्रातः दोनों भाई काम पर जाने के लिए घर छोड़ देते और पीछे से दोनों की पत्नियाँ आपस में मिलजुलकर घर का सारा कार्य निपटाती । सायं दोनों घर लौटकर साथ-साथ ही भोजन करते और विश्राम करने चले जाते । दोनों में सम्पति, घर आदि को लेकर आपस में किसी भी प्रकार का कोई विवाद नहीं था ।

          एक दिन सायंकाल बड़ा भाई दो आम लेकर घर लौटा । छोटा भाई उससे पूर्व ही घर लौट आया था और आँगन में हाथ-मुंह धो रहा था । बड़े भाई ने आँगन में प्रवेश करते ही दोनों बच्चों को आवाज लगाई । दोनों बालक तुरंत उनके पास पहुंचे । बड़े भाई ने थैले में से दो आम निकले । उनमें से एक थोड़ा बड़ा आम देखकर अपने पुत्र को दे दिया और दूसरा जरा सा छोटा आम अपने भाई के पुत्र को दे दिया । आज से पूर्व दोनों में से किसी भी भाई ने इस प्रकार का कोई भेदभाव वाला कार्य नहीं किया था । छोटा भाई सब कुछ देख रहा था । वह अपने बड़े भाई के पास पहुंचा और बोला कि भैया, अब हमें अलग हो जाना चाहिए । बड़े भाई ने पूछा - ‘क्यों’ ? छोटा बोला - ‘क्योंकि अब आपके भीतर ‘मैं और मेरा’ की भावना ने जन्म ले लिया है ।’ 

         बात यह नहीं है कि जरा सा कम अथवा अधिक बड़ा आम खा लेने से किसी बच्चे पर क्या प्रभाव पड जाता ? मुख्य बात यह है कि आज और अभी ही इस ‘मैं और मेरा’ की भावना ने किसी एक व्यक्ति के मन में जन्म लिया है और भविष्य में इस भावना का अन्य व्यक्तियों और क्षेत्रों में भी विस्तार होना निश्चित है । 

       जहां ‘मैं मेरा’ होगा वहाँ ‘तू तेरा’ भी रहेगा । इस प्रकार बनी स्थिति पारमार्थिक मार्ग में बाधा बनती है । इसलिए आसक्ति के त्याग के लिए हमें ‘मैं मेरा’ से दूरी बनानी होगी । तभी हमारा अनासक्त होना संभव होगा । इस दृष्टान्त से हमारे समक्ष अनासक्ति का तीसरा सूत्र प्रकट होता है – “मैं और मेरा” की भावना का त्याग ।

          ‘मैं और मेरा’ का जन्म तभी होता है, जब हमारे मन में स्वयं और अपने परिवार के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है । हम सभी जीवन में बार-बार कहते रहते हैं कि अपना, अपना होता है और पराया, पराया । जबकि वास्तविकता यह है कि इस संसार में कोई भी न तो कभी अपना हुआ है और न ही कभी पराया । हम सभी एक अनवरत चल रही यात्रा पर हैं और संयोगवश कभी-कभी किसी एक जीवन में आकर एक स्थान पर मिल जाते हैं । हम सब एक दूसरे से कुछ प्राप्त करने अथवा किसी को कुछ प्रदान करने के लिए पत्नी/पति, पुत्र, बंधु, मित्र अथवा आत्मीय-जन बनकर एक स्थान पर इस जन्म में मिले हैं । हम सब एक दूसरे का हिसाब-किताब चूकता कर अगले जन्म में पुनः एक दूसरे से दूर हो जायेंगे । इस बात को आत्मसात कर लेने से हमारा किसी भी व्यक्ति में आसक्ति भाव पैदा हो ही नहीं सकता । कबीर इस बात को अपने ही अंदाज में कहते हैं -

पत्ता टूटा डारि से ले गयी पवन उड़ाय ।

अबके बिछुड़े कब मिलें, दूर पड़ेंगे जाय ।।

      इसका भावार्थ यही है कि किसी संयोग से हमारा इस जीवन में साथ बना है, जो एक दिन इस शरीर की समाप्ति के साथ ही अस्थाई अथवा स्थाई रूप से समाप्त हो जाना है । सदैव के लिए साथ न तो किसी को मिला है और न ही भविष्य में कभी मिलने वाला है । इसलिए किसको तो आप अपना मान सकते हैं और किस को पराया ? सब कुछ मन का खेल है, जिसके कारण हम भीतर ही भीतर ‘अपने-पराये’ की आसक्ति को पाल बैठे हैं ।

          अपने परिवार अथवा पुत्र में आसक्ति रखना कोई बड़ी बात नहीं है । आज के युग में जब से हम छोटे परिवार को अधिक महत्त्व देने लगे हैं तब से अपने पुत्र और परिवार के प्रति आसक्ति का स्तर बढ़ने लगा है । इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिक पुत्र होने से आसक्ति कम हो जाती है । आसक्ति चाहे कम हो अथवा अधिक, इसका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ना अवश्यम्भावी है । राजा दशरथ के चार पुत्र थे । वह जानते थे कि राम साक्षात् ब्रह्म का अवतार है फिर भी वे उन्हें अपना सांसारिक पुत्र मानते हुए उनमें आसक्त हो गए थे ।

          एक सांसारिक मनुष्य राम के प्रति उनकी आसक्ति के स्थान पर अगर ब्रह्म के अवतार राम के प्रति उनका प्रेम होता, अनुरक्ति होती तो वे कभी के जीवन मुक्त हो गए होते । राम के प्रति उनकी आसक्ति जग जाहिर थी, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे राम के स्थान पर भरत को वन में भेजने के लिए सहमत हो जाते । वे भरत को भी वनवास नहीं दे सकते थे । अपने बड़े पुत्र राम के प्रति इसी आसक्त-भाव ने उनको मृत्यु के द्वार तक भी पहुंचा दिया । इसलिए सदैव याद रखें कि किसी भी वस्तु, जन, धन, कर्म व भोग आदि में आसक्ति ही दुःख का कारण बनती है । किसी के प्रति अधिक आसक्ति होना ही दुःख को घना और लम्बा कर देती है ।

          अपने पुत्र से, परिवार से प्रेम करना अलग बात है और उनमें आसक्त हो जाना अलग । प्रेम आप संसार के प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक प्राणी से करें परन्तु किसी के प्रति आसक्त न हो । एक मृग छौने में आसक्ति के कारण ही राजा भरत का पुनर्जन्म एक मृग के रूप में हो चूका है । आसक्ति में प्रियजन से बिछड़ना एक बड़े दुःख का कारण बनता है । जीव का इस संसार में आना- जाना लगा रहता है । यहाँ जन्म भी है और मृत्यु भी । भला, आने-जाने वालों के प्रति आसक्त क्यों हो ? यह आसक्ति ही तो हमें संसार से मुक्त नहीं होने देती ।

         आइये, एक क्षण के लिए हम कल्पना करें कि अगर भविष्य में वैज्ञानिकों ने स्वाभाविक मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली तो क्या होगा ? प्रथम बात तो यह है कि परमात्मा का विधान ही कुछ ऐसा है कि स्वाभाविक मृत्यु पर विजय पाई ही नहीं जा सकती फिर भी कल्पना करने में क्या जाता है ? कुछ समय के लिए मान लेते हैं कि यदि ऐसा हो भी जाता है तो फिर क्या होगा ? ऐसा सम्भव हो जाता है तो केवल एक ही प्रकार की स्थिति की कल्पना की का सकती है । इस संसार में, इस पृथ्वी पर इतने अधिक प्राणी हो जायेंगे कि आपस में ही एक दूसरे को समाप्त करने की सोचेंगे, चाहे वह स्वयं का पुत्र ही क्यों न हो । फिर स्वाभाविक मृत्यु नहीं होगी बल्कि अपनी शारीरिक सुरक्षा के लिए मार-काट मचेगी । इस पृथ्वी पर स्थान तो सीमित हैं और संसाधन भी सीमित हैं । जनसंख्या विस्फोट के कारण भी एक दिन ऐसी स्थिति आने की कल्पना की जा सकती है । मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जहाँ बात उसके अपने अस्तित्व पर आती है, वह केवल स्वयं के बारे में ही सोचता है, अपने प्रियजनों के बारे में नहीं । 

क्रमशः

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