आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -47
अर्जुन को युद्धभूमि में मिले इस ज्ञान को हमें भी समझना चाहिए और कामनाओं को नियंत्रित करने के लिए मन को बुद्धि के अधीन रखते हुए अपने विवेकानुसार निर्णय करना चाहिए । बुद्धि से ज्ञान का समुचित उपयोग करके ही कामनाओं को बढ़ने से रोका जा सकता है अन्यथा मन के अनुसार चलने से तो कामनाओं का अंत आना असंभव ही है ।
पूर्व में वर्णित दृष्टान्त पर एक प्रबुद्ध पाठक ने कुछ शंकाएं प्रकट की है, उसका स्पष्टीकरण श्रृंखला के मध्य में ही कर देना चाहता हूँ । वे पूछते हैं कि वह कन्या उन तपस्वी की तपस्या में विघ्न नहीं हुई, अतः कृपया स्पष्ट करें कि दोनों में तुलना करनी हो तो हम कैसे करें ?
संत की तुलना में कन्या कामनाओं से बहुत दूर है । संत के मन में कामनाएं अभी भी शेष हैं । कन्या ने अपने जीवन में किसी तपस्वी से विवाह करने की कल्पना तक नहीं की थी । मन में भोग की कल्पनाएँ ही विभिन्न कामनाओं की जननी है । जब तपस्वी ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था, तब वह चौंक गयी थी और जल्दबाजी में उसने विवाह के लिए हाँ कर दी थी । परन्तु घर जाकर उसने विचार किया तब उसे लगा कि वह तपस्वी के तप में बाधक बन रही है । वह तपस्वी के तप में बाधक बनना नहीं चाहती थी । इसीलिए दूसरे दिन उसने विवाह करने से मना कर दिया था । अगर उसके मन में पहले से ही उस तपस्वी के साथ विवाह करने की कल्पना के कारण तीव्र कामना रही होती तो विवाह करने से इनकार कर ही नहीं सकती थी ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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