Saturday, July 11, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -48

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -48

           दूसरी शंका- ‘इस लेख के माध्यम से आप क्या संदेश देने की चेष्टा कर रहे है मेरी समझ से बहुत दूर हैं, क्योंकि तपस्वी ने जब तप प्रारंभ किया तब जो उद्देश्य था उस उद्देश्य से उस गांव की रूपवती कन्या के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखने और कन्या द्वारा स्वीकार करना पुनः अगले दिन अस्वीकार कर देना । क्या आगे की तपस्या उस कन्या के साथ विवाह कर गृहस्थी बसाने के लिए थी, जो ब्रह्म लोक की भी कामना नहीं रखी ?’  

            लेख का सन्देश स्पष्ट है- कामनाओं को नियंत्रण में रखना आसान कार्य नहीं है । तपस्वी ब्रह्म-लोक की प्राप्ति के लिए ही तप कर रहा था । तप में समस्त सांसारिक कामनाओं को नष्ट किया जाता है और परमात्मा की प्राप्ति की कामना को सर्वोपरि रखा जाता है । जितनी अधिक तीव्र आसक्ति होती है, मन भर जाने पर उस वस्तु/व्यक्ति/भोग से उतनी ही अधिक तीव्र विरक्ति भी हो जाती है । तपस्वी विरक्त तो था परन्तु काम से पूर्णतया मुक्त नहीं हुआ था । तभी उसने कन्या को सर्वप्रथम देखते ही विवाह का प्रस्ताव रख दिया क्योंकि इतने कठोर तप के बाद भी वैवाहिक सुख के प्रति उसकी कामना नष्ट नहीं हुई थी । उसकी आसक्ति एक स्त्री और काम-भोग के प्रति बनी रही । जब दूसरे दिन कन्या ने विवाह के लिए ना कर दी तब वही तीव्र आसक्ति, पुनः तीव्र विरक्ति में परिणत हो गयी, एक दोलक के दोलन की तरह; जो दोनों तरफ दोलन करता हुआ सर्वोच्च ऊँचाई को छूता है । विवाह न होने से आहत होकर वह पुनः तीव्र विरक्ति में चला गया और ब्रह्म-प्राप्ति के लिए तप में लग गया । जब इंद्र उसके सामने आया और मन में अन्य कोई इच्छा शेष रहने का पूछा तो उसका भीतर दबा हुआ काम-भाव पुनः सतह पर आ गया और उसने उसी कन्या को मांग लिया । 

 क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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