Monday, July 13, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -50

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -50

           भागवतजी में भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी को ज्ञान देते हुए वे अपने पूर्वज राजा यदु और दत्तात्रेयजी के मध्य हुए संवाद का वर्णन करते हैं । यह कथा भागवतजी के ग्यारहवें स्कन्ध के सातवें अध्याय से अवधूतोपाख्यान नाम से प्रारम्भ होती है । इसमें दत्तात्रेय जी कहते हैं कि हम प्रत्येक जीव से कुछ न कुछ सीख सकते हैं । जिस किसी से भी सीख के रूप में हमें ज्ञान मिलता है, वह हमारा गुरु है । दत्तात्रेय जी ने इस प्रकार अपने चौबीस गुरु बतलाए हैं । इनमें उनकी एक गुरु थी पिंगला नाम की वेश्या । एक वेश्या और गुरु ? सुनने में बड़ा अटपटा लग सकता है और स्वीकार करने में उतना ही कठिन । 

             कोई भी व्यक्ति सदैव के लिए बुरा नहीं हो सकता, उसमें भी कोई न कोई एक अच्छाई अवश्य ही छिपी रहती है । वह अच्छाई जब भी प्रकट होती है तब हमारा मार्गदर्शन कर देती है । हाँ, तो बात चल रही थी, पिंगला वेश्या की । जिस शहर में वह थी, वहां अपना शरीर बेचकर जीवनयापन कर रही थी । समय जब बीतता है तब केवल उम्र ही नहीं बीतती, साथ ही साथ शरीर भी बीतता जाता है । यह जीवन का स्याह पक्ष है क्योंकि कोई नहीं चाहता कि एक दिन उसका शरीर भी बीत जाय ।

                पिंगला का जीवन और शरीर भी बीतता जा रहा था । प्रतिदिन की तरह वह आज भी शाम होते ही सजधजकर अटारी पर आ खड़ी हुई और अपनी भाव-भंगिमाओं से राह चलते लोगों को आकर्षित करने का प्रयास करने लगी । आज भी उसे आशा थी कि कोई न कोई मालदार व्यक्ति उसके आकर्षण में फँसेगा । इंतज़ार की घड़ियाँ बढ़ती जा रही थी और रात भी धीरे-धीरे गहराने लगी थी ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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