आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -35
दरवेश आरिफ सुभानी के इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का एक और सूत्र हमारे हाथ लगता है - ‘सहिष्णु बनो, विरोध को भी सहना सीखो ।’ आरिफ सुभानी दरवेश ने उस व्यक्ति को यही सीख दी थी कि किसी भी एक धर्म का पालन करने वाला किसी दूसरे धर्म के पालन करने वाले के मध्य कभी भी बाधक नहीं बन सकता । सभी धर्मों की एक समान शिक्षा है ।
कुटिलता तो हमारे भीतर (मन में) होती है कि हम अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे धर्म को तुच्छ समझते हैं । संसार के समस्त धर्म अच्छे हैं परन्तु जब हम एक धर्म के प्रति आसक्त हो जाते हैं, तब दूसरा धर्म हमें निम्न स्तर का प्रतीत होने लगता है । वास्तविकता यह है कि सभी धर्म हमें परमात्मा की ओर ले जाते हैं और आपस में प्रेम करने और प्रेम से रहने की शिक्षा देते हैं । एक धर्म के प्रति हमारी आसक्ति ही साम्प्रदायिक तनाव का कारण बनती है । धर्म में आसक्ति और धर्म से विरक्ति, दोनों ही अनुचित है । अतः अनासक्त होकर प्रत्येक को स्व-धर्म का पालन करते रहना चाहिए ।
यही नियम इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति, समूह और समाज पर लागू होता है । हम अलग-अलग समाज और जातियों में इस प्रकार बंटे हुए हैं कि हमें हमारा देश, देश में भी हमारा प्रान्त, प्रान्त में भी हमारा क्षेत्र, फिर समाज, अपनी जाति और अंत में परिवार ही सर्वोच्च नज़र आता है । जिस दिन हमारे भीतर अनासक्ति पैदा हो जाएगी ‘वसुधेव कुटुम्बकम्’ की भावना को स्वीकार कर लेने में तनिक सी भी देर नहीं लगेगी ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
No comments:
Post a Comment