आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -34
सुभानी की बात सुनकर वह व्यक्ति हैरान रह गया । उसने पूछा - ‘आप यह क्या कह रहे हैं, इससे क्या होगा ?’ दरवेश ने कहा कि ‘तुम जिस धर्म को मानते हो, उससे दूर जो उस धर्म को नहीं मानता है, उसके पास चले जाओ । उससे भी ऐसा ही आग्रह करना, जैसा तुमने मुझसे किया था । वह तुम्हारे धर्म की निंदा अवश्य ही करेगा । तुम केवल सुनते रहना, अपने धर्म के बारे में कुछ भी नहीं कहना । धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर इतनी सहिष्णुता आ जाएगी कि विरोधियों की बातों का बुरा नहीं लगेगा और तुम्हें क्रोध पैदा नहीं होगा । ऐसी सहनशीलता आने पर ही तुम्हें सच्ची शान्ति मिलेगी और तुम खुदा के बन्दों में अपना स्थान बना लोगे ।’
बात तो सत्य कही थी, उस आरिफ सुभानी नामक दरवेश ने । हम किसी भी एक विचारधारा, व्यक्ति अथवा संप्रदाय आदि के प्रति इतने अधिक आसक्त हो जाते हैं कि उसके विरोध में उठता एक स्वर तक सुनना पसंद नहीं करते । यही कारण है कि आज ‘सर तन से जुदा’ जैसे आतंकित करने वाले नारे लगते हैं । खेल के मैदान तक में एक टीम के समर्थक दूसरी टीम के समर्थकों से खूनी संघर्ष तक कर लेते हैं, जबकि खेल में हार-जीत से उनका कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता । सहनशीलता हमें आसक्ति से मुक्त करती है और अनासक्त बनाती है । ऐसे में हम चाहे जिस टीम का समर्थन कर रहे हों, जो भी टीम जीते-हारे, हमारे ऊपर इस हार-जीत का प्रभाव नहीं होगा । अनासक्त रहकर टीमों का संघर्ष देखने से ही आपको उस खेल में आनंद आएगा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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