आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -32
सत्य का अनुभव हमें ज्ञान प्राप्त करने से ही हो सकता है । केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारना भी आवश्यक है । हमें इस जन्म में जो कुछ भी प्राप्त होना है, वह हमारे जन्म लेने से पूर्व ही निश्चित किया जा चूका है । उससे न तो रत्ती भर कम मिलना है और न ही अधिक । हमारे प्रत्येक शास्त्र में इसका स्पष्ट रूप से उल्लेख है । इस बात का ज्ञान हम सभी को है परन्तु जब तक इस ज्ञान को क्रियान्वित नहीं करेंगे, इस ज्ञान का जीवन में उपयोग नहीं करेंगे तब तक यह ज्ञान एक बोझ से अधिक कुछ भी नहीं है । इतने चिंतन के बाद यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि संतुष्ट जीवन तभी हो सकता है, जब हमें इस जीवन में जो कुछ भी हमारी सोच से अधिक या कम मिला है उसको ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करें और अपने मन को नियंत्रण में रखते हुए जीवन में संतुष्ट होने का प्रयास करें ।
बहुत समय पहले एक दरवेश (घुमक्कड़ मुसलिम फ़क़ीर) आरिफ सुभानी हुए थे । उन्हें संसार की मोह-माया छू तक नहीं गयी थी, इतने विरक्त महापुरुष थे । तन पर पहने हुए कपड़ों के अतिरिक्त उनके पास कुछ भी नहीं था । शांतिप्रिय और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले इस संत का स्वभाव दूसरों से मेल नहीं खाता था । आरिफ सुभानी मंदिर, मस्जिद और गिरिजा घर (Church) में भेद तक नहीं करते थे । अल्लाह के बन्दों को एक ही सीख देते थे कि मजहब के भेदभाव से ऊपर उठो ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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