Wednesday, June 24, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -31

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -31 

         इस संसार को दुःख का सागर कहा जाता है और साथी ही इसे अशाश्वत भी कहा गया है । सब कुछ जानते हुए भी कोई भी मनुष्य इससे निवृत्ति नहीं चाहता । सत्यता तो यह है कि प्रतिपल इससे स्वतः ही निवृत्ति हो रही है । संसार का प्रत्येक भोग प्रारंभ में सुख का कारण बनता है और अंत में वह दुःख ही प्रदान करता है । इसी कारण से संसार को दुःख का सागर कहा जाता है । हम सब कुछ जानते हैं फिर भी इस आशा में प्रत्येक भोग के साथ चिपके रहते हैं कि कभी न कभी तो इनकी प्राप्ति के लिए कर्म करने से हमें वह भोग बार-बार मिलेगा और हमें शाश्वत सुख का अनुभव होगा । सारे प्रयासों के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता, हाथ रीते ही रह जाते हैं और अंततः हम दुःख को ही प्राप्त होते हैं । 

          संतुष्टि है - जो कुछ मिला है, उसमें खुश रहना । असंतुष्टि है - जो मिला है वह पर्याप्त नहीं है और यह आशा करना कि थोडा और अधिक मिले । यहीं आकर मनुष्य गलती कर बैठता है । ‘और अधिक मिलने’ की कामना करना ही ‘मिले हुए’ से असंतुष्ट होना है । ‘और अधिक प्राप्त करने की कामना’ का कभी अंत नहीं आ सकता । जितना कामनाओं को पूरा करने का प्रयास किया जाता है उतनी ही और नई कामनाओं का जन्म होता है । जब तक हम स्वयं अपने मन को नियंत्रित नहीं करेंगे, कामनाओं का जन्म नहीं रुकने वाला । मन को नियंत्रित करने का एक ही उपाय है : वास्तविकता अर्थात सत्य को स्वीकार करना ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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