Thursday, June 11, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर - 18

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -18 

      विरक्ति में तो मनुष्य कर्तव्य कर्म का भी त्याग कर देता है । ऐसे में शरीर निर्वाह होना भी कैसे संभव होगा ? एक गृहस्थ का इस प्रकार सोचना उचित ही है । अतः एक गृहस्थ के लिए कर्तव्य कर्म के त्याग के साथ - साथ नियत कर्म करते रहना अधिक उचित है । इस प्रकार यह समझा जा सकता है कि एक गृहस्थ के लिए विरक्त होने के स्थान पर अनासक्त होना अधिक सहज है । 

          प्राचीन समय की बात है । एक सूफी संत नित्य सुबह की नमाज अता करने के लिए घर से थोड़ी दूर स्थित एक मस्जिद में जाया करते थे । उनका प्रतिदिन का यह एक नियम बन गया था । उनको प्रतिदिन इस प्रकार मस्जिद जाते हुए देखकर उनका छोटा पुत्र भी कभी- कभी उनके साथ हो जाया करता था । धीरे-धीरे उनके पुत्र की भी यह एक आदत हो गयी । संत उसे अपने साथ ले जाते और रास्ते में चलते हुए अपने पुत्र को ज्ञान की बातें बताते रहते । पुत्र भी उनकी बातें सुनकर बड़ा प्रसन्न होता और प्रदत्त ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करता । 

            सर्दियों के दिन थे । जब संत और उनका पुत्र, दोनों प्रतिदिन सुबह की नमाज के लिए मस्जिद जा रहे होते तब प्रायः देखते कि लोग उस समय तक गहरी नींद में ही सोये रहते । उनके पुत्र को यह बड़ा बुरा लगता । आखिर एक दिन उनके पुत्र से रहा नहीं गया । वह अपने पिता से बोल पड़ा - ‘कितने काफ़िर हैं ये लोग, जो सुबह उठकर नमाज तक नहीं पढ़ सकते । खुदा अवश्य ही उन्हें दोजख में भेजेगा ।’

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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