आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -15
तुरंत ही वह व्यक्ति वहां से निकलकर सीधा तुलाधार के पास जा पहुंचा । तुलाधार एक व्यवसायी था । वह बड़ा ही प्रसन्न नज़र आ रहा था और अपने पास आये ग्राहकों को तौल-तौल कर सामान दे रहा था । उस व्यक्ति ने तुलाधार को अपने आने का प्रयोजन बताया और कहा कि तथागत ने आपसे वह सूत्र प्राप्त करने को कहा है, जिसको पाकर आप आनंदित अवस्था को उपलब्ध हुए हैं । तुलाधार ने उसे प्रेम पूर्वक अपने पास बैठाया और एक ग्राहक के लिए सामान तौलते हुए कहा कि ‘इस तराजू के कांटे की ओर देखो । इसे सदैव मध्य में बनाये रखने से ही ग्राहक और व्यवसायी के मध्य सामंजस्य बैठ पाता है और दोनों खुश रह सकते हैं अन्यथा नहीं । मैंने तो तराजू के इसी कांटे से सीख ली है कि सदैव मध्य में रहने से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामंजस्य बिठाया जा सकता है । इस प्रकार मध्य में रहने से ही हम परम आनंद की अवस्था को उपलब्ध हो सकते हैं ।’
तुलाधार की बातों का उस व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ा, कह नहीं सकता परन्तु बड़ी मार्मिक बात कही थी, तुलाधार ने । तराजू का कांटा सामान और उसको तौलने वाले बाट के मध्य एक प्रकार की साम्यता निश्चित करता है । न कम और न ही अधिक, यही समता है । जहां न तो आसक्ति है और न ही विरक्ति, वहीं समता है । समता ही अनासक्ति है । तुलाधार के मन में धन के प्रति आसक्ति भाव होता तो तराजू का कांटा कभी भी मध्य में नहीं रहता, कांटा सदैव एक ओर ही झुका रहता ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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