Thursday, June 4, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -11

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -11

                      परमात्मा से अनुरक्ति के लिए मुख्य बात है, संसार से आसक्ति को छोड़ना । यह आसक्ति तभी छूट सकती है, जब हमारा मन पर नियंत्रण हो । केवल मन पर नियंत्रण कर लेने से ही हमारा समस्त इन्द्रियों पर नियंत्रण स्थापित हो जाता है । इस जड़ शरीर में, जो कि अपरा प्रकृति की देन है; पाँच भौतिक तत्वों के साथ-साथ मन, बुद्धि और अहंकार भी उपस्थित रहते हैं । भौतिक तत्वों से श्रेष्ठ मन है और मन से श्रेष्ठ बुद्धि है । 

       संसार के सभी भोग पदार्थ मिल भी जाए तो भी वे मन को संतुष्ट नहीं कर सकते । फिर भी हम विषय-भोगों से ही मन को सन्तुष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं । हमारी सोच ही ऐसी बन गई है कि भोग पदार्थों से मन को संतुष्ट कर, नियंत्रित किया जा सकता है । भौतिक तत्वों से मन को कभी भी संतुष्ट कर नियंत्रित नहीं किया जा सकता बल्कि बुद्धि से अवश्य ही इसको नियंत्रित किया जा सकता है ।

             उच्च पदस्थापित व्यक्ति अपने अधीनस्थ को नियंत्रित कर सकता है, अधीनस्थ अपने अधिकारी को नहीं । जब अधीनस्थ अपने उच्चाधिकारी को नियंत्रण में ले लेता है, तब उस अधिकारी और उसके विभाग का पतन होना निश्चित है । यही नियम इस शरीर पर भी लागू होता है । मन को अगर बुद्धि नियंत्रित कर लेती है तो हम आसक्त से अनासक्त अथवा विरक्त हो सकते हैं । अगर दुर्भाग्य वश मन बुद्धि को नियंत्रित कर लेता है तो फिर इस शरीर और उसके कार्यों में हमारी आसक्ति बढ़ने लगती है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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