आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -10
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिसे हम विरक्ति होना कहते हैं, वास्तव में वह आसक्ति का ही दूसरा नाम है अर्थात् एक ही सिक्के का दूसरा पहलू है । विरक्त होना तो बहुत ऊँची बात है और उस विरक्त होने के स्तर को छू लेना हमारे जैसे किसी भी साधारण व्यक्ति की पहुँच से बहुत दूर है । इसका अर्थ यह कदापि भी नहीं है कि विरक्त हुआ ही नहीं जा सकता । विरक्त होने के लिए गृहस्थ जीवन उपयुक्त नहीं है, उसके लिए तो पूर्वजन्म के संस्कार से मिले नए जीवन के प्रारम्भ में ही विरक्ति की नींव पड़ जाती है । गृहस्थ जीवन में तो हम विरक्ति के नाम पर कभी कम और कभी अधिक आसक्ति-भाव को प्राप्त होते रहते हैं । विरक्त होना एक गृहस्थ के लिए लगभग असंभव सी बात है ।
आसक्ति और विरक्ति के मध्य में जो स्थिति बन सकती है अथवा हम बना सकते हैं, उस अवस्था का नाम है अनासक्ति । अनासक्ति में हम न तो किसी के प्रति आसक्त होते हैं और न ही विरक्त । ऐसा हो गया तो अच्छा, वैसा नहीं हुआ तो भी अच्छा । अगर हम आसक्ति को त्यागकर केवल विरक्त होने का नाटक भर ही करते रहे तो जीवन में कभी भी अनासक्त नहीं हो सकते ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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