आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -12
आसक्ति वास्तव में जड़ तत्वों और इन्द्रिय सुखों के प्रति व्यक्ति का लगाव ही है । मन भौतिक सुखों के प्रति आसक्त हो जाता है और फिर बुद्धि को भी समझा बुझाकर अपने साथ कर लेता है । बुद्धि से श्रेष्ठ अहं है अर्थात् हमारा अहंकार और उससे श्रेष्ठ और सर्वोच्च है वह मूल और शुद्ध अहम् अर्थात् आत्मा है, जोकि हम स्वयं हैं । अगर अहम् (आत्मा) भौतिक सुखों के प्रति आसक्ति को स्वीकार नहीं करे और साथ ही भीतर अहंकार भी न रहे तो हमारी बुद्धि मन को पुनः अपने नियंत्रण में ले लेती है ।
हाँ, यह शतप्रतिशत सत्य है कि हमारी आत्मा प्रत्येक अनुचित आचरण का प्रारम्भ में विरोध करती है जिसका अनुभव आप सभी को अपने जीवन में कभी न कभी अवश्य ही हुआ होगा परन्तु जब अनुचित आचरण से आपके मन को सुख मिलता प्रतीत होता है तो बुद्धि भी आत्मा से विपरीत दिशा पकड़ कर मन के साथ हो जाती है । ऐसी स्थिति में आत्मा असहाय हो जाती है और मन अपना खेल खेलने लगता है । इसीलिए संत-जन आत्म-जागरण की बात करते हैं, भगवान बुद्ध भी आत्म-बोध को महत्वपूर्ण बतलाते हैं ।
वास्तव में देखा जाये तो मन भी तो किसी न किसी कारण से ऐसा व्यवहार करता होगा । मन के ऐसे आसक्ति पूर्ण व्यवहार के पीछे मुख्य रूप से हमारी कामनाएं ही है । कामनाओं को पूरा करने के लिए हम कर्म करते हैं और कर्म से हमें फल मिलता है और हमारी इच्छा (Desire) के अनुसार फल प्राप्त होने से हमारा मन उस कर्म के प्रति झुक जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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