ज्ञान उदय जब होत है …..19
ज्ञान यह स्पष्ट कर देता है कि सारे कर्म प्रकृति के गुणों से होने वाली क्रिया मात्र है । परमात्मा भी क्रिया नहीं करते इसलिए अवतरित होने की अवस्था में वे भी क्रिया (कर्म) अर्थात् लीला करने के लिए अपनी प्रकृति की सहायता लेते हैं । त्रेता में परमात्मा का अवतार राम के रूप में हुआ था । उनके साथ ही प्रकृति ने भी सीता के रूप में शरीर धारण किया था । अध्यात्म-रामायण में सीताजी कहती हैं कि जितने भी कर्म आप राम द्वारा किया जाना मानते हैं, वास्तव में वे सब कर्म मेरे द्वारा ही किए हुए हैं ।
एवमादीनि कर्माणि मयैवाचरितान्यपि ।
आरोपयन्ति रामेऽस्मिन्निर्विकारेऽखिलात्मनि ।। बालकाण्ड - 1/42 ।।
सीताजी कह रही हैं कि राम के अवतार लेने से लेकर लंका विजय के पश्चात् हुए राज्याभिषेक तक के समस्त कर्म यद्यपि मेरे ही किए हुए हैं तो भी अज्ञानी लोग उन्हें निर्विकार सर्वात्मा भगवान राम में आरोपित करते हैं ।
कहने का अर्थ है कि सभी क्रियाएं प्रकृति के द्वारा ही होती है, मनुष्य तो उन क्रियाओं के साथ स्वार्थवश अपना सम्बन्ध बना लेता है । क्रियाओं से होनेवाली सुख-दुःख की अनुभूति से उदासीन रहे तो क्रिया से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं बनेगा और न ही क्रिया कर्म बनेगी । ज्ञान होने पर ही हम कर्म से पुनः क्रिया तक पहुंच सकते हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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