Wednesday, May 6, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....17

 ज्ञान उदय जब होत है …..17

          प्रारब्ध ही जन्म-मरण अर्थात् जीव द्वारा नए-नए शरीर धारण करने के लिए उत्तरदायी है । शरीरों का मिलना-बिछड़ना ही संसार-चक्र है, जिसमें घूमते हुए जीव सुखी-दुःखी होता रहता है । कोई भी जीव सदैव के लिए सुखी नहीं हो सकता और न ही दुःखी होता है । वैसे संसार में दुःख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । जिसे सुख कहा जाता है, वह दुःख की अपेक्षा से है अर्थात् दुःख की तीव्रता का कम हो जाना या उसको सहन कर लेने की क्षमता का बढ जाना ही सुख समझ लिया जाता है । 

        संसार परिवर्तनशील है, इसलिए यहां सुख दुःख में और दुःख सुख में परिवर्तित होता रहता है । हम अपने जीवन में कभी दुःखी नहीं होना चाहते परंतु फिर भी होते हैं क्योंकि संसार मिला ही दुःख के कारण है । दुःख का कारण था कामना का पूरा न हो पाना । हमारी सुख की इच्छा इस दुःख के मूल में है । शारीरिक सुख की इच्छा करना ही काम है । 

         काम से कामना उत्पन्न होती है और कामना से कर्म । कर्म से ही प्रारब्ध बनता है और प्रारब्ध के कारण संसार में जीव का आवागमन बना रहता है । जीव को जब मनुष्य शरीर मिलता है तब उसका उद्देश्य इस सांसारिक आवागमन के चक्र से बाहर निकलने का होना चाहिए न कि सांसारिक सुख-दुःख का भोग करने का । इस आवागमन को मिटाने के लिए एक मात्र उपाय है, प्रारब्ध को बनने से रोकना ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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