Monday, May 4, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....15

 ज्ञान उदय जब होत है …..15

            परिणाम मिलने के समय को लेकर कर्म तीन प्रकार के बताए गए हैं - क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध । क्रियमाण कर्म वे कर्म हैं जिनके करते ही तत्काल फल प्रकट हो जाता है । इन कर्मों के होने में तो पूर्व जीवन के प्रारब्ध की भी भूमिका रहती है । इसलिए ये कर्म शरीर के जन्म लेते ही होने प्रारम्भ हो जाते हैं और इनका फल भी तत्काल मिल जाता है । प्रारब्ध से होने वाले क्रियमाण कर्म अल्प प्रयास से ही अधिकतम परिणाम दे देते है क्योंकि उस कर्म का बहुत सा भाग पूर्वजन्म में संपन्न किया जा चुका होता है । इस प्रकार अल्प प्रयास से ही प्रारब्ध कर्म का फल मिल जाने के कारण उस फल और कर्म में आसक्ति पैदा हो जाती है । इन कर्मों के परिणाम में मनुष्य की आसक्ति पैदा होते ही कर्म के साथ कामना जुड़ जाती है और वह सकाम कर्म करने शुरू कर देता है । 

        पूर्व जीवन के प्रारब्ध कर्म इस जीवन में सकाम कर्म बनकर फल देते हैं क्योंकि पूर्व जीवन की अधूरी कामनाएं पूरी जो होनी है । सकाम कर्म ही क्रियमाण कर्म है जिनका परिणाम प्रायः उसी समय मिल जाता है । कभी-कभी कुछ कर्मों का परिणाम तत्काल नहीं मिल पाता, ऐसे कर्म मस्तिष्क में जाकर संचित हो जाते है । ये संचित कर्म समय पाकर परिपक्व होकर अपना परिणाम प्रायः उसी जीवन में भुगता देते हैं । फिर भी कुछ संचित कर्म उस एक शरीर के जीवन में परिणाम नहीं दे पाते, ऐसे संचित कर्म ही मनुष्य का प्रारब्ध बनाते है । फल न दे सकने वाले संचित कर्म प्रारब्ध कर्म बनकर नए शरीर में जाकर अपना परिणाम देते हैं । नए शरीर के जन्म लेते ही प्रारब्ध से क्रियमाण कर्म होने प्रारम्भ हो जाते हैं । इस प्रकार कर्म आधारित संसार-चक्र निर्बाध गति से चलता रहता है ।

           कर्म के साथ जब कामना जुड़ती है तब सकाम कर्म होते हैं और जब कामना नहीं जुड़ती तब वे निष्काम कर्म हैं । निष्काम कर्म से अकर्म की अवस्था को उपलब्ध हुआ जाता है । सकाम कर्म के साथ जब लिप्सा जुड़ जाती है तब व्यक्ति निषिद्ध कर्म (शास्त्र विरुद्ध) करने लगता है, तब वे विकर्म कहलाते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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